'मैडम, हमहू जोड़बय...', कंचे चुराने से लेकर जमीन पर गणित का जादू सीखने तक, सुपौल की शिक्षिका मनु कुमारी ने बदल दी क्लास की तस्वीर
बचपन की सबसे बड़ी चोरी क्या होती है? स्कूल के पीछे छुपकर कंचे (गुल्ली) खेलना और सबसे बड़ा डर? जब टीचर रंगे हाथों न पकड़ लें. सुपौल के एक सरकारी स्कूल में बिल्कुल ऐसा ही हुआ, लेकिन मैडम के पकड़ने के बाद जो हुआ, उसने बच्चों का डर तो खत्म किया ही. साथ ही गणित को उनका सबसे पसंदीदा खेल भी बना दिया.
बचपन की सबसे बड़ी चोरी क्या होती है? स्कूल के पीछे छुपकर कंचे (गुल्ली) खेलना और सबसे बड़ा डर? जब टीचर रंगे हाथों न पकड़ लें. सुपौल के एक सरकारी स्कूल में बिल्कुल ऐसा ही हुआ, लेकिन मैडम के पकड़ने के बाद जो हुआ, उसने बच्चों का डर तो खत्म किया ही. साथ ही गणित को उनका सबसे पसंदीदा खेल भी बना दिया.
मैडम जी लाय लेतौ, और डर से भागते बच्चे
सुपौल के राघोपुर स्थित प्राथमिक विद्यालय, दीपनगर बिचारी में लंच का समय था. कुछ बच्चे स्कूल के पीछे सड़क किनारे कंचे खेल रहे थे. तभी एक छात्र ने जाकर विशिष्ट शिक्षिका मनु कुमारी से शिकायत कर दी. मैडम जी अमर, सुमित, कृष्णा रोड के उस पार गुल्ली खेल रहे हैं.
जैसे ही मैडम वहां पहुंचीं, शिवम और अमर डर के मारे तेजी से भागने लगे. उन्हें लगा कि आज तो पक्का पिटाई होगी. शिक्षिका ने अपनी स्थानीय भाषा, मैथली में प्यार से आवाज दी- रूक रूक नुनु एतय या, नय मारबो इसका मतलब है कि रुको बेटा, इधर आओ, नहीं मारूंगी. डरे-सहमे बच्चे पास आए तो मैडम ने पूछा कि जेब में कितनी गुल्ली है? बच्चों ने सहमते हुए बताया कि तीनों के मिलाकर कुल 70 गो हैं.
सजा की जगह मैडम ने सिखाया
बच्चों को लग रहा था कि अब उनके सारे कंचे छिन जाएंगे. अमर ने धीरे से अपने दोस्त से फुसफुसाया, रे सुमित, नय दही, मैडम जी लाय लेतौ, लेकिन कृष्णा ने भरोसा जताते हुए कहा कि दही नय सुमित, मैडम जी देखतय गुल्ली, नय कुछौ कहतौ. शिवम ने भी हामी भरी- सब गुल्ली मैडम जी कय दाय दही.
तभी शिक्षिका ने मुस्कुराते हुए कहा कि मुझे भी गुल्ली बहुत अच्छी लगती है, मुझे भी देखने के लिए दोगे? तुम लोग मुझे अपना तरीका सिखाओ, मैं तुम्हें अपने तरीके से हिसाब करना सिखाऊंगी.
बच्चों के चेहरों पर तुरंत मुस्कान लौट आई. अमर बोला कि जी मैडम, बहुते मजा आबय छै खेलय में, हम तय गुल्ली खेलय में पचास गो जीतलियै गुल्ली. घर पर ढेरिके राखल छै, ऐ ठिना कनियै गो आनलियै. इसके बाद बच्चों ने आपसी सहमति से खुशी-खुशी सारे कंचे मैडम को सौंप दिए.
ब्लैकबोर्ड नहीं, जमीन पर चला गणित का जादू
क्लास में लौटकर कोई किताब नहीं खुली. शिक्षिका ने चाक से सीधे जमीन पर चार खाने बनाए और उन पर लिखा कि इकाई, दहाई, सैकड़ा और हजार. दूसरी ओर भी बिल्कुल वैसे ही चार कॉलम बनाए गए.
उन्होंने एक छोटे बच्चे से कंचों को हाथ में भंजाकर जमीन पर इस तरह सरकाने को कहा कि वो सभी खानों में थोड़ा-थोड़ा बिखर जाएं. फिर दूसरे बच्चों से कहा गया कि जिस खाने में जितने कंचे गए हैं, उन्हें गिनकर लिखो. खेल-खेल में शाबरीन नाम की बच्ची ने गिनती की और बोली कि मैडम जी, हजार की जगह 1 है, तो 1000, सैकड़ा की जगह 5 है, तो 500, दहाई की जगह 6 है तो 60, इकाई की जगह 5 है तो 5 और सब मिलाकर 1565 हुआ.
मैडम जी, हमहूं जोरबै
शिक्षिका ने उन्हें खेल-खेल में ही समझा दिया कि कैसे इकाई का मान एक गुना, दहाई उससे दस गुना और सैकड़ा उससे भी दस गुना बड़ा होता है. जो बच्चे थोड़ी देर पहले मैडम से डरकर भाग रहे थे, वे अब इतने उत्साहित थे मानो उनके हाथ कोई जादू की छड़ी लग गई हो. क्लास में हर तरफ से चहकती हुई आवाजें आने लगी कि मैडम जी, हमहूं जोरबै, मैडम जी, हम्मे जोरबै इसका मतलब हुआ कि मैडम मैं भी जोड़ूंगा.
मैडम ने भी प्यार से कहा कि सबकय मौका मिलतौ. सब कौय बनेभी इ हिसाब. और एकरा खाली अंके में नय, दोसर दिन शब्दो में लिखेबउ इसका अर्थ हुआ कि सबको मौका मिलेगा, कल इसे शब्दों में भी लिखेंगे. अंत में पूरी क्लास ने खुशी से तालियां बजाईं.
शिक्षिका मनु कुमारी का यह प्रयोग साबित करता है कि जब सीखने की विधि खेल हो, तो गणित जैसा विषय भी बच्चों के लिए सरल, रुचिकर और मजेदार जादू बन जाता है.
रिपोर्ट: सुभाष चंद्रा
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