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भारत में चुनाव की बात होते ही सबसे पहले विधायक और सांसद का नाम आता है, लेकिन हाल के दिनों में MLC शब्द भी काफी चर्चा में बना हुआ है, जो राज्यों की विधान परिषद के लिए चुने जाते हैं उन्हें MLC कहा जाता है. MLC बनने का रास्ता विधानसभा चुनाव से बिल्कुल अलग है. यहां कहीं विधायक वोट डालते हैं, कहीं ग्रेजुएट और शिक्षक, तो कुछ सदस्यों को राज्यपाल मनोनीत करते हैं. आखिर MLC बनने की योग्यता क्या है, विधान परिषद की सीटों का बंटवारा कैसे होता है और इसके पास कितने अधिकार हैं?
विधान परिषद किसी राज्य की विधायिका का उच्च सदन होता है. मतलब जिस तरह केंद्र में लोकसभा निचला सदन होती है और राज्यसभा उच्च सदन. ठीक उसी तरह राज्य के अंदर विधानसभा निचला जबकि विधान परिषद उच्च सदन होता है. विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में आम जनता वोट करती है, जबकि राज्यसभा और विधान परिषद में आम लोग वोट नहीं करते हैं. विधान परिषद में सदस्य अलग-अलग तरीकों से चुने जाते हैं या मनोनीत किए जाते हैं. हालांकि, विधान परिषद देश के सभी राज्यों में मौजूद नहीं है. यह सिर्फ 6 राज्यों में है. इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं.
विधान परिषद का सदस्य बनने के लिए कम से कम 30 साल उम्र होनी लाजमी है. इसके अलावा कुछ और जरूरी शर्तें भी हैं, जैसे- उस उम्मीदवार का नाम राज्य की विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र की वोटर लिस्ट में होना जरूरी है.
MLC चुनकर विधान परिषद में जाने वाले उम्मीदवारों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है. विधान परिषद के लगभग एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में रिटायर हो जाते हैं, उनकी जगह नए सदस्य चुने जाते हैं या संबंधित सीटों को भरने की संवैधानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है.

अब अगर बात करें कि विधान परिषद को बनाने या फिर खत्म कैसे किया जा सकता है, तो यह भी काफी दिलचस्प है. इसको लेकर संविधान के अनुच्छेद 169 में जिक्र है. संविधान हर राज्य को विधान परिषद रखने के लिए बाध्य नहीं करता. राज्य चाहें तो एक सदन यानी विधानसभा के साथ काम कर सकते हैं.
विधान परिषद की सीटें विधानसभा के मुकाबले कम होती हैं. इसमें किस तरह से सीटें तय की जाती हैं, इसको लेकर संविधान के अनच्छेद 171 में बताया गया है. इसके दो मुख्य नियम हैं:

विधान परिषद के चुनाव को समझना भी थोड़ा पेचीदा काम है. इन चुनावों को 5 प्रमुख तरीकों से समझ सकते है.
विधायक: राज्य के विधायक मिलकर MLC चुनते हैं. इसमें आम जनता सीधे वोट नहीं देती.
स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि चुनते हैं: नगर निगम के पार्षद, नगरपालिका और जिला परिषद जैसे निर्धारित स्थानीय निकायों के सदस्य वोट देते हैं. आम नागरिक सीधे इस चुनाव में वोट नहीं डाल सकता.
ग्रेजुएट वोटर्स: जिन लोगों ने ग्रेजुएशन की निर्धारित योग्यता और अन्य शर्तें पूरी की हैं और जिनका नाम ग्रेजुएट निर्वाचन क्षेत्र की वोटर लिस्ट में है, वे अपने MLC को चुनते हैं.
शिक्षक वोटर्स: तय योग्यता और टीचिंग एक्सपीरियंस रखने वाले पात्र शिक्षक, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से MLC चुनते हैं.
राज्यपाल मनोनीत करते हैं: कुछ सदस्यों को राज्यपाल साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या अनुभव रखने वाले लोगों में से मनोनीत करते हैं.
शिक्षक-ग्रेजुएट निकार्वाचन क्षेत्र चुनने की वजह की बात करें तो इसका मकसद एजुकेटेड लोगों को अपने मुद्दों पर प्रतिनिधि चुनने का मौका देना है. रोजगार, शिक्षा, भर्ती और युवाओं से जुड़े विषय इसके चुनावी मुद्दे हो सकते हैं.

विधान परिषद के काम काज की बात करें, तो इसका काम सरकार के कामकाज पर सवाल उठाना होता है. कानूनों में कमियां तलाशकर बदलाव का सुझाव देना होता है. विधान परिषद के पास यह अधिकार होता है कि जब सरकार कोई नया कानून ला रही हो, तो वो उस पर चर्चा कर सकती है. विधान परिषद के सदस्य यानी MLC सरकार के मंत्रियों से सवाल पूछ सकते हैं? शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, किसानों और दूसरे मुद्दों पर सरकार का ध्यान खींच सकते हैं. विधान परिषद राज्य के बजट पर चर्चा कर सकती है, लेकिन बजट को पास करने में विधानसभा की निर्णायक भूमिका होती है.