सम्राट चौधरी का ‘रील कल्चर’ वाला तर्क: अपराध रोकने की जिम्मेदारी किसकी?
जमुई में कैमरा था, इसलिए अपराध दुनिया ने देखा. समस्तीपुर में कैमरा था इसलिए पुलिस तक बात पहुंची लेकिन बिहार की उन सड़कों का क्या जहां कोई कैमरा नहीं है? यही सवाल अब बिहार सरकार से पूछा जाना चाहिए.
19 सितंबर को जमुई में 10वीं कक्षा के दो छात्र-छात्रा कोचिंग से लौट रहे थे. मड़वा पहाड़ के पास कुछ युवकों ने उन्हें रोका. वीडियो सामने आया तो देश ने देखा कि किस तरह दोनों को घेरा गया. लड़के के साथ मारपीट हुई और नाबालिग लड़की के साथ सार्वजनिक रूप से बदसलूकी की गई.
पुलिस ने मामला दर्ज किया. एसआईटी बनाई और आरोपियों की गिरफ्तारी शुरू हुई. बाद में मुख्य आरोपी नंदन यादव पुलिस कार्रवाई में पैर में गोली लगने के बाद गिरफ्तार हुआ. पुलिस के मुताबिक मामले में कई आरोपी चिन्हित किए गए हैं.
24 सितंबर को समस्तीपुर के कर्पूरीग्राम थाना क्षेत्र के जगतसिंहपुर गांव से 56-58 सेकंड का एक वीडियो सामने आया. एक लड़की अपने दोस्त के साथ बाइक से जा रही थी. बूढ़ी गंडक के बांध के पास रुकने पर कुछ युवकों ने उसे घेर लिया.
वीडियो में लड़की के साथ बदसलूकी और छेड़खानी दिखाई देती है. पुलिस ने वीडियो सामने आने के बाद चार आरोपियों को गिरफ्तार किया.
इसी बीच मुजफ्फरपुर में भी एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़खानी और मारपीट का मामला सामने आया. पुलिस ने आरोपी ललित कुमार को गिरफ्तार किया. परिवार का आरोप है कि आरोपी पिछले कुछ समय से लड़कियों को परेशान कर रहा था.
तीन घटनाएं, तीन अलग-अलग जिले और लगभग एक जैसी कहानी. हर बार कार्रवाई हुई यह अच्छी बात है लेकिन असली सवाल यही है कि हर बार कैमरा क्यों चाहिए?
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने जमुई की घटना के बाद ‘रील कल्चर’ का जिक्र किया, लेकिन सरकार से जनता का सवाल रील से थोड़ा बड़ा है. अगर आरोपी ने रील नहीं बनाई होती, तो क्या पुलिस फिर भी उतनी ही तेजी से उस तक पहुंचती?
कानून-व्यवस्था का मतलब यह नहीं है कि अपराधी को पकड़ लिया जाए. कानून-व्यवस्था का मतलब यह भी है कि अपराधी को यह भरोसा न हो कि वह सड़क पर किसी लड़की को रोककर 15 मिनट तक उत्पीड़न या बदसलूकी कर सकता है और पुलिस को खबर भी नहीं होगी.
आंकड़े कहानी को और गंभीर बनाते हैं
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि बिहार में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों की संख्या पिछले कुछ सालों में लगातार बढ़ी है.
2020 में बिहार में महिलाओं के खिलाफ 15359 मामले दर्ज हुए थे. 2021 में यह संख्या 17950 हुई. 2022 में 20222, 2023 में 22952 और 2024 में 27359 मामले दर्ज हुए.
यानी 2020 से 2024 के बीच दर्ज मामलों में करीब 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई. अकेले 2023 से 2024 के बीच वृद्धि लगभग 19 प्रतिशत रही.
यहां एक सावधानी भी जरूरी है. एनसीआरबी का आंकड़ा अपराध की पूरी वास्तविकता नहीं है. यह दर्ज मामलों का आंकड़ा है.
ज्यादा एफआईआर का मतलब कुछ मामलों में बेहतर रिपोर्टिंग और पुलिस तक पहुंच भी हो सकता है, लेकिन यही तर्क लगातार बढ़ते आंकड़ों को नजरअंदाज करने का लाइसेंस भी नहीं बन सकता.
2024 में बिहार में महिलाओं के खिलाफ दर्ज 27359 मामलों में 12438 मामले महिलाओं को अपहरण, बहला-फुसलाकर ले जाने या शादी के लिए मजबूर करने से जुड़ी श्रेणी में थे.
1165 बलात्कार के मामले दर्ज हुए. 1078 दहेज हत्या के मामले दर्ज हुए. 225 मामले महिलाओं की गरिमा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल के थे और 62 यौन उत्पीड़न के मामले दर्ज हुए.
यानी बिहार की महिला सुरक्षा की समस्या को केवल रेप के आंकड़े से समझना गलत होगा. समस्या का दायरा कहीं अधिक व्यापक है जिसमें अपहरण, जबरन शादी, घरेलू हिंसा, दहेज, सार्वजनिक स्थानों पर यौन उत्पीड़न और बच्चों के खिलाफ अपराध तक है.
NFHS-5 का डेटा इस तस्वीर को और गहरा करता है
बिहार में 18-49 वर्ष की शादीशुदा महिलाओं में करीब 40 प्रतिशत ने जीवन में कभी न कभी पति की ओर से शारीरिक या यौन हिंसा का अनुभव होने की बात कही. NFHS-5 के विस्तृत बिहार आंकड़ों में 39.1 प्रतिशत महिलाओं ने कभी शारीरिक हिंसा और 7.9 प्रतिशत ने कभी यौन हिंसा का अनुभव बताया. कुल मिलाकर 40 प्रतिशत ने शारीरिक और यौन हिंसा का अनुभव बताया.
और शायद इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंसा होने के बाद मदद लेने की प्रवृत्ति बेहद सीमित है. NFHS-5 के बिहार आंकड़ों के अनुसार, ऐसी हिंसा झेलने वाली 82 प्रतिशत से अधिक महिलाओं ने न तो मदद मांगी और न ही किसी को बताया. केवल करीब 2 प्रतिशत ने पुलिस से मदद लेने की बात कही.
इसका मतलब साफ है कि थाने में दर्ज एफआईआर और जमीन पर मौजूद हिंसा के बीच एक बड़ा अंतर हो सकता है. इसलिए सरकार यदि केवल एफआईआर और गिरफ्तारी की संख्या बताकर महिला सुरक्षा की तस्वीर पेश करती है तो वह तस्वीर अधूरी होगी.
जिम्मेदारी किसकी?
जमुई की घटना पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा कि उनकी चिंता सुशासन है और अपराधी की कोई जाति नहीं होती. उन्होंने यह भी कहा कि अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा. इस कथन का पहला हिस्सा राजनीतिक रूप से सुविधाजनक जरूर है लेकिन असली सवाल इससे आगे है.
स्कूल-कॉलेज और कोचिंग जाने वाली छात्राओं के लिए सुरक्षित रास्तों की पहचान कौन करता है? संवेदनशील इलाकों की निगरानी कैसे होती है? रात में पेट्रोलिंग कहां होती है?
स्थानीय पुलिस को असामाजिक तत्वों की जानकारी कितनी थी? और अगर जानकारी थी तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? ये राजनीतिक आरोप नहीं प्रशासनिक सवाल हैं.
‘रील नहीं बनाता तो पकड़ा जाता क्या?’
सम्राट चौधरी का दूसरा बयान इससे भी ज्यादा चर्चा में आया. जमुई मामले पर उन्होंने ‘रील कल्चर’ का जिक्र करते हुए कहा कि अगर आरोपी ने रील नहीं बनाई होती तो क्या वह पकड़ा जाता? उन्होंने अपराधियों को चेतावनी देते हुए कहा कि अपराध करके कोई समाज का हीरो नहीं बन सकता.
रील बनाने और अपराध को रिकॉर्ड करने की समस्या वास्तविक है. आज अपराध का वीडियो पुलिस के लिए सबूत, पहचान और गिरफ्तारी का माध्यम बन सकता है. जमुई में भी वीडियो सामने आने के बाद पुलिस कार्रवाई तेज हुई लेकिन मुख्यमंत्री के बयान का दूसरा पहलू ज्यादा महत्वपूर्ण है.
अगर अपराधी ने रील नहीं बनाई होती तो? यही वह सवाल है जिसे सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए. क्योंकि बिहार में हर अपराध कैमरे पर रिकॉर्ड नहीं होता. हर गांव में सीसीटीवी नहीं है. हर सड़क पर मोबाइल कैमरा नहीं है. हर पीड़िता के पास घटना रिकॉर्ड करने का अवसर नहीं होता.
कानून-व्यवस्था का मॉडल ऐसा नहीं हो सकता जिसमें अपराधी खुद सबूत बनाकर दे तभी पुलिस उसे पकड़ पाए. पुलिस का काम अपराध होने के बाद वीडियो ढूंढना भर नहीं है.
अपराध रोकना, संवेदनशील इलाकों की निगरानी करना, शिकायत को गंभीरता से लेना और पीड़ित को सुरक्षित महसूस कराना भी उसी व्यवस्था का हिस्सा है.
सरकार को आगे की सोच रखनी होगी
जमुई की घटना पर मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि दुनिया अपराध से पूरी तरह मुक्त नहीं है और ऐसी छिटपुट घटनाएं तो होती रहती है. दूसरी ओर विपक्ष ने इसे महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का बड़ा सवाल बनाया. यहां भी दोनों राजनीतिक पक्षों से अलग एक तथ्य सामने है.
एक घटना को राज्य की पूरी कानून-व्यवस्था का अंतिम प्रमाण नहीं कहा जा सकता लेकिन लगातार सामने आने वाली घटनाओं को केवल एक घटना कहकर खारिज करना भी नीति-निर्माण का तरीका नहीं हो सकता.
सरकार को यह बताना चाहिए कि ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए उसकी रणनीति क्या है.
कितने थानों में महिला हेल्प डेस्क सक्रिय हैं? कितने संवेदनशील रास्तों की पहचान हुई है? स्कूल और कॉलेज रूट पर कितनी पेट्रोलिंग होती है? कितनी शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई हुई?
कितने मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई? कितने मामलों में ट्रायल पूरा हुआ? और कितने मामलों में सजा हुई?
इन सवालों के जवाब ‘जीरो टॉलरेंस’ से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. बिहार को अब गिरफ्तारी से आगे की कहानी चाहिए. बिहार की बेटियां सड़क पर निकलते समय पुलिस की ताकत नहीं देखना चाहतीं. वे यह देखना चाहती हैं कि सड़क सुरक्षित है.
वे यह नहीं जानना चाहतीं कि आरोपी ने वीडियो बनाया या नहीं. वे यह जानना चाहती हैं कि अगर उनके साथ कुछ हुआ तो पुलिस बिना कैमरे के भी उनके साथ खड़ी होगी.
और शायद यही वह सवाल है जिसका जवाब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और उनकी सरकार को अब आंकड़ों, गिरफ्तारी और बयान से आगे जाकर देना होगा.
क्योंकि कानून-व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा उस घटना के बाद नहीं होती, जिसका वीडियो वायरल हो जाए. असली परीक्षा उस घटना से पहले होती है, जिसका कोई वीडियो कभी सामने नहीं आता.