आरक्षण का वर्गीकरण, जातीय सर्वे और अब सवर्ण आयोग: एक बार फिर देश की सियासत की दिशा तय कर रहा है बिहार
यह पहली बार नहीं है कि बिहार ने पूरे देश को दिशा दिखाई हो. बात चाहे पंचायतों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का हो, हर घर नल योजना हो, लड़कियों के लिए साइकिल योजना की हो, कई बार बिहार ने पहले सोचा और अमल किया और देश या कई राज्यों ने उसको फॉलो किया.
साल की शुरुआत में यूजीसी की नई गाइडलाइंस क्या जारी हुई, देश की राजनीति में भूचाल आ गया. कॉलेज और विश्वविद्यालयों के कैंपस के लिए जारी की गई इस गाइडलाइंस ने पूरे देश में एक अंडर करंट पैदा कर दिया और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे. जी न्यूज ने अपने डीएनए शो में इस मामले को सबसे पहले प्रमुखता से उठाया था और उसके बाद यह सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनता चला गया था. मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और वहां से इस गाइडलाइंस पर स्टे लग गया. उसके बाद से सवर्णों में इस बात को लेकर नाराजगी है. अब बीजेपी के कुछ सवर्ण सांसदों ने मोदी सरकार से मांग की है कि सवर्णों की नाराजगी दूर करने के लिए बिहार की तर्ज पर सवर्ण आयोग बनाया जाए. उनका कहना है कि जब अनुसूचित जाति और जनताति आयोग बन सकता है, पिछड़ा वर्ग आयोग बन सकता है, तो फिर सवर्ण आयोग क्यों नहीं बनाया जा सकता? अगर मोदी सरकार अपने सवर्ण सांसदों की मांग मान लेती है और सवर्ण आयोग का गठन कर देती है तो यह एक और मौका होगा, जब बिहार सरकार के फैसले की बुनियाद पर देश की सियासत की दशा और दिशा तय होगी.
क्या है भाजपा सांसदों की मुख्य मांगें?
भाजपा सांसदों का कहना है कि देश में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के हितों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय आयोग बनाए गए हैं, तो सामान्य वर्ग के अधिकारों की रक्षा के लिए कोई तंत्र क्यों नहीं हो सकते?
सांसदों का यह भी कहना है कि सवर्ण समाज की भी एक बड़ी आबादी ऐसी है, जो गरीबी रेखा के नीचे या आर्थिक तंगी में गुजर-बसर कर रही है. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए जो 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है, उसका लाभ सही व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं, उसकी निगरानी के लिए एक डेडिकेटेड संस्था का होना जरूरी है.
भाजपा सांसदों ने अपने मांग के समर्थन में बिहार का उदाहरण दिया है. सांसदों की ओर से कहा गया है कि बिहार जैसे राजनीतिक रूप से जटिल राज्य में सवर्ण आयोग सफलतापूर्वक काम कर रहा है तो यह पूरे देश में क्यों नहीं लागू हो सकता.
पथ प्रदर्शक की भूमिका निभा चुका है बिहार
2011 में नीतीश कुमार की तत्कालीन सरकार ने सबसे पहले सवर्ण आयोग का गठन किया था, जिसका मकसद अगड़ी जातियों के भीतर शैक्षणिक और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की स्थिति का अध्ययन कर सिफारिशें देना था.
पिछले साल यानी 2025 में बिहार सरकार ने सवर्ण आयोग का पुनर्गठन किया था और पूर्व एमएलसी महाचंद्र प्रसाद सिंह को अध्यक्ष और राजीव रंजन प्रसाद को उपाध्यक्ष बनाया था. इसका मकसद जमीनी स्तर पर अगड़ी जातियों की शिकायतों का समाधान करना था.
अभी हाल ही में सवर्ण आयोग ने बिहार के सभी 38 जिलों में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की है, ताकि गरीब सवर्ण छात्रों को कोचिंग, हॉस्टल और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने में परेशानी न हो.
क्या राष्ट्रीय प्रयोगशाला बन रहा है बिहार?
पिछले कुछ फैसलों का अध्ययन करें तो यह साफ दिखता है कि बिहार जो आज करता है, देश कल उसी दिशा में आगे बढ़ता है.
सबसे पहले बात करते हैं जाति गणना यानी सर्वे की. 2023 में राज्य सरकार ने जाति गणना के आंकड़ों को सार्वजनिक किया था. आज पूरे देश में जाति जनगणना राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ चुकी है.
आरक्षण के उप-वर्गीकरण की बात करें तो तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने 1978 में बिहार में सबसे पहले ओबीसी और ईबीसी का विभाजन किया था. अब सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश में इसको मान्यता दे दी है.
तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में 2011 में सवर्ण आयोग का गठन किया था और 2025 में इसका पुनर्गठन भी किया था. अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के कुछ सांसदों ने इसी मॉडल को आधार बनाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर सवर्ण आयोग बनाने की मांग कर दी है.
सवर्ण आयोग के गठन से जुड़े कानूनी दांवपेंच
अगर मोदी सरकार अपने कुछ सांसदों की मांग पर विचार करती है और सवर्ण आयोग के गठन की दिशा में आगे बढ़ती है तो उसके साथ कुछ चुनौतियां भी होंगी.
अनुसूचित जाति आयोग को अनुच्छेद 338 और अनुसूचिज जनताति आयोग को 338ए के अलावा ओबीसी आयोग को 338बी के तहत संवैधानिक दर्जा हासिल है. इनके पास सिविल कोर्ट जैसी जांच शक्तियां शामिल हैं.
दूसरी ओर, बिहार का सवर्ण आयोग केवल एक राज्य कार्यकारी निकाय के रूप में काम करता है. अगर केंद्र सरकार सवर्ण आयोग बनाती है तो क्या बाकी आयोगों की तरह इसे संवैधानिक दर्जा हासिल हो पाएगा या फिर यह एक सलाहकार समिति के रूप में ही काम करेगी.
बिहार में हर घर नल और देश में जल जीवन मिशन
ऐसा नहीं है कि केवल नीतिगत मसलों पर ही बिहार देश को या अन्य राज्यों को दिशा दिखाने का काम करता है. लोक कल्याणकारी योजनाओं को लॉन्च करने में भी यह आगे रहा है. सितंबर, 2016 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सात निश्चय पार्ट 1 के तहत हर घर नल योजना का शुभारंभ किया था. इसका मकसद राज्य के सभी शहरी और ग्रामीण परिवारों को पीने का शुद्ध पानी मुहैया कराना था. पीएम नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2019 को लाल किले के प्राचीर से जल जीवन मिशन की शुरुआत की थी. जब केंद्र सरकार की ओर से जल जीवन मिशन के तहत बिहार को सेंट्रल फंड की पेशकश की गई तो तत्कालीन नीतीश कुमार की सरकार ने यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि राज्य ने अपने आंतरिक संसाधनों से इस योजना का बड़ा हिस्सा पहले ही पूरा कर लिया है.
हर घर नल योजना के अलावा तत्कालीन सीएम नीतीश कुमार ने 2006 में मुख्यमंत्री साइकिल योजना शुरू की थी. बाद में, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम की राज्य सरकारों ने इस योजना को आधार मानते हुए अपने यहां भी इसे लागू किया था. इस योजना को पूरे देश में ही नहीं, बल्कि यूनेस्को में भी सराहा गया था.
इसके अलावा, पूरे देश में बिहार पहला राज्य था, जिसने पंचायतों में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण 2006 में लागू किया था. बाद में देश के करीब 20 राज्यों ने नीतीश सरकार के इस मॉडल को अपनाया था. इसके अलावा स्थानीय स्व-शासन में भी महिलाओं को 33 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व महिलाओं को देने वाला बिहार पहला राज्य बना था.
तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2006 में स्वयं सहायता समूहों की शुरुआत की थी, जिसके बिना पर पूरे देश में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की शुरुआत की गई थी. बिहार सरकार के इस मॉडल को विश्व बैंक ने न केवल सराहा, बल्कि केंद्र सरकार के साथ मिलकर राष्ट्रीय आजीविकास मिशन के ढांचे के लिए आधार तैयार किया.
बिहार के रास्ते पर देश
सवर्ण, भारतीय जनता पार्टी के कोर वोटर रहे हैं. अगर वे महसूस करते हैं कि कल्याणकारी योजनाओं में उनकी उपेक्षा हो रही है तो उनकी चिंता वाजिब है. राष्ट्रीय सवर्ण आयोग बनाकर भारतीय जनता पार्टी अपने कोर वोटरों को एक बड़ा राजनीतिक और वैचारिक हथियार उपलब्ध करा सकती है. और अगर ऐसा होता है तो यह फिर से स्पष्ट हो जाएगा कि देश की राजनीति की दशा और दिशा तय करने में बिहार अग्रणी भूमिका निभा रहा है. इससे यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि सामाजिक कल्याण और जातियों के संस्थागत प्रतिनिधित्व देने के मामले में देश बिहार के पदचिह्नों पर चल रहा है.