रामधारी सिंह दिनकर: आज भी क्यों धधक रही है राष्ट्रकवि की कविता?
रामधारी सिंह दिनकर की रचनाएं आज भी पढ़ी जा रही हैं, उद्धृत की जा रही हैं और नई पीढ़ियां उनसे अपने समय के सवाल जोड़ रही हैं. यही उनकी सबसे बड़ी सफलता है.
आखिर किसी कविता की उम्र कितनी होती है? एक साल, एक सदी या फिर उतनी ही देर, जितनी देर तक कोई उसे पढ़कर भूल न जाए? शायद कविता की उम्र कैलेंडर के पन्नों से नहीं, यादों की गहराई से तय होती है. कुछ कविताएं वक्त के साथ धुंधली पड़ जाती हैं, लेकिन कुछ ऐसी होती हैं जो समय की धूल झाड़कर हर नए दौर में फिर हमारे सामने खड़ी हो जाती हैं. उनके शब्द वही रहते हैं, मगर उनके अर्थ बदलते रहते हैं. हर पीढ़ी उनमें अपने सवाल, अपना दर्द और अपने समय की तस्वीर खोज लेती है. यही वह क्षण है जब कविता सिर्फ कविता नहीं रहती, वह समय की आवाज बन जाती है.
रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविता ऐसी ही कविता है. जब वे लिखते हैं-
'याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा.'
तो यह सिर्फ शब्दों की ललकार नहीं लगती. इसमें किसी ऐसे व्यक्ति की आवाज सुनाई देती है जिसने जीवन को बहुत करीब से संघर्ष करते देखा हो. जिसने अभाव झेला हो, सत्ता का दबाव देखा हो और फिर भी शब्दों को कमजोर पड़ने नहीं दिया हो.
23 सितंबर 1908 को बिहार के सिमरिया गांव में जन्मे रामधारी सिंह 'दिनकर' का जीवन इसी संघर्ष की जमीन से निकला था. आज उनकी जयंती पर जब उन्हें 'राष्ट्रकवि' कहकर याद किया जाता है, तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि दिनकर ने क्या लिखा.
बड़ा सवाल यह है कि आखिर उनकी लिखी पंक्तियां एक सदी बाद भी लोगों की जुबान पर क्यों हैं? इसका जवाब शायद उनकी कविता में कम और उनके जीवन में ज्यादा छिपा है.
संघर्ष ने गढ़ी कविता की आवाज
दिनकर का बचपन किसी सुविधासंपन्न परिवार में नहीं बीता था. वे किसान परिवार में पैदा हुए. जब वे महज दो साल के थे, उनके पिता का निधन हो गया. मां ने कठिन परिस्थितियों में बच्चों का पालन-पोषण किया. गरीबी उनके लिए सिर्फ किताबों में पढ़ा हुआ शब्द नहीं थी बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी.
गांव से पढ़ाई के लिए निकलने वाला वह लड़का आगे चलकर हिंदी साहित्य का ऐसा नाम बनेगा, यह शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा लेकिन दिनकर की कहानी में संघर्ष कोई छोटा अध्याय नहीं था.
वही संघर्ष धीरे-धीरे उनकी भाषा का स्वभाव बन गया. उनकी कविता में जो ओज दिखाई देता है, उसके पीछे जीवन की वही तपिश थी.
उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से शिक्षा हासिल की. इतिहास, राजनीति और दर्शन उनके प्रिय विषय थे. साथ ही उन्होंने संस्कृत, हिंदी, उर्दू, बंगाली और अंग्रेजी साहित्य का अध्ययन किया.
अलग-अलग भाषाओं और विचारधाराओं से परिचय ने उनके भीतर एक ऐसी दृष्टि विकसित की, जिसमें परंपरा और आधुनिकता दोनों के लिए जगह थी. शायद यही वजह है कि दिनकर को सिर्फ राष्ट्रवादी कवि कहकर समझना उनके साहित्य को छोटा कर देना होगा.
दिनकर का नाम आते ही अक्सर वीर रस, राष्ट्रवाद और ओजपूर्ण पंक्तियां याद आती हैं. 'रश्मिरथी', 'कुरुक्षेत्र', 'हुंकार', 'रेणुका' और 'परशुराम की प्रतीक्षा' जैसी रचनाएं उनकी इसी पहचान को मजबूत करती हैं. लेकिन दिनकर की दुनिया सिर्फ युद्ध और वीरता की दुनिया नहीं थी.
उर्वशी को पढ़ने पर वही कवि प्रेम, सौंदर्य, देह, मन और मानवीय आकांक्षाओं की जटिलताओं में उतरता दिखाई देता है.
ज्ञानपीठ की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक दिनकर ने 50 से अधिक कृतियों की रचना की और उनकी साहित्यिक पहचान केवल विद्रोही कवि तक सीमित नहीं रही.
अंग्रेजी राज में सरकारी नौकरी और कवि का विद्रोह
दिनकर का जीवन सिर्फ साहित्यिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने अध्यापन से शुरुआत की और बाद में बिहार सरकार में काम किया. 1934 में वे सब-रजिस्ट्रार बने और 1943 तक इस सेवा में रहे.
जीवनीकारों के अनुसार, उनकी राष्ट्रीय विचारधारा और अंग्रेजी शासन से असहमति के कारण उन्हें चार सालों में 22 बार स्थानांतरित किया गया.
यहां दिनकर की जिंदगी का एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है. एक तरफ वे सरकार की नौकरी कर रहे थे, दूसरी तरफ उनकी कविताएं औपनिवेशिक शासन के खिलाफ जनभावना को आवाज दे रही थीं.
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ लेकिन दिनकर के लिए संघर्ष का अर्थ समाप्त नहीं हुआ. अब सामने विदेशी शासन नहीं था.
सवाल था- आजाद भारत कैसा होगा? गरीबी कैसे खत्म होगी? सामाजिक असमानता कैसे कम होगी? सत्ता और जनता के बीच रिश्ता कैसा होगा? विकास का लाभ आखिरी व्यक्ति तक कैसे पहुंचेगा?
'कुरुक्षेत्र' में दिनकर युद्ध के विनाश से आगे जाकर मनुष्य और समाज के सवाल उठाते हैं. उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां-
'शांति नहीं तब तक जब तक
सुख-भाग न नर का सम हो,
नहीं किसी को बहुत अधिक हो,
नहीं किसी को कम हो.'
आज भी असमानता पर बहस के बीच उद्धृत होती हैं.
आज दिनकर को पढ़ते हुए यह याद रखना जरूरी है कि वे सिर्फ साहित्य की दुनिया के व्यक्ति नहीं थे. 1952 में वे राज्यसभा के सदस्य बने और कई सालों तक संसद में रहे.
संसद की आधिकारिक जीवनी उन्हें साहित्यकार के साथ-साथ सांसद, शिक्षाविद और राष्ट्रवादी व्यक्तित्व के रूप में दर्ज करती है. संसद में पहुंचने के बाद भी उनकी पहचान एक कवि की ही रही. यह शायद उनकी सबसे बड़ी खासियतों में से एक थी. सत्ता के करीब पहुंचकर भी उनकी भाषा में आम आदमी की बेचैनी गायब नहीं हुई.
दिनकर को साहित्यिक दुनिया ने भी सम्मान दिया. उनकी पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' को 1959 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला.
इसके बाद 'उर्वशी' के लिए उन्हें 1972 का ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला. भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया. लेकिन दिनकर की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद कोई पुरस्कार नहीं था.
उनकी असली ताकत यह थी कि उनकी पंक्तियां पुरस्कार समारोहों से निकलकर गांवों, कस्बों, कॉलेजों, आंदोलनों और मंचों तक पहुंच गईं.
आज भी किसी भाषण में जब 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' या 'मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है' जैसी पंक्तियां गूंजती हैं तो पता चलता है कि साहित्य की लोकप्रियता का कोई सरकारी प्रमाणपत्र नहीं होता. उसे जनता तय करती है.
इसलिए 23 सितंबर सिर्फ एक कवि की जयंती नहीं है. यह उस विश्वास को याद करने का दिन है कि शब्द कभी-कभी इतिहास से भी ज्यादा लंबी उम्र जीते हैं. और दिनकर के शब्दों में वह आग आज भी बाकी है.