JDU में गुटबाजी का पुराना इतिहास: अनंत सिंह से पहले भी कई लोगों ने की कोशिश, नीतीश कुमार के आगे हुए पस्त!
मोकामा से पार्टी विधायक अनंत सिंह ने विधान परिषद चुनाव में अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी नीरज कुमार ने खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और खुलेआम जन सुराज पार्टी के प्रत्याशी अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं. इतना ही नहीं उन्होंने पार्टी के अंदर की तनातनी को भी सार्वजनिक कर दिया है.
पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) में इन दिनों बड़ी खींचतान देखने को मिल रही है. मोकामा विधायक अनंत सिंह के 'बागी' तेवरों से पार्टी में कलह खुलकर सामने आ चुकी है. वे पटना स्नातक सीट से पार्टी प्रत्याशी नीरज कुमार के खिलाफ जन सुराज उम्मीदवार अनुज सिंह का समर्थन कर रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के तमाम बड़े नेताओं ने उनको समझाकर देख लिया, लेकिन वे किसी की सुनने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने साफ कहा है कि नीरज कुमार को हराकर ही मानेंगे. उनके इस तरह के रवैये को देखकर सियासी जानकारों का मानना है कि अनंत सिंह को किसी बड़े नेता का समर्थन हासिल है. जेडीयू में अनंत सिंह कोई पहले नेता हैं, जो बागी हुए हों या गुटबाजी करने की कोशिश कर रहे हों. उनसे पहले पार्टी में इस तरह की गुटबाजी देखने को मिल चुकी है. हालांकि, नीतीश कुमार ने हर पार्टी को इस संकट से बाहर निकाला.
कभी नीतीश कुमार के राइट हैंड थे उपेंद्र कुशवाहा
रालोमो अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा कभी नीतीश कुमार को अपना बड़ा भाई बताया करते थे. उपेंद्र कुशवाहा का जेडीयू (JDU) से बागी होने और अलग होने का किस्सा काफी लंबा है. उपेंद्र कुशवाहा ने साल 2000 में चुनाव जीतकर राजनीति में कदम रखा था. साल 2004 में नीतीश कुमार ने उन्हें विधानसभा नेता-प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंप दी थी. साल 2005 का चुनाव हारने के बाद उन्होंने गुटबाजी शुरू कर दी. नीतीश कुमार को इसकी भनक लग गई तो 2007 में कुशवाहा को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. साल 2008 में कुशवाहा ने एनसीपी ज्वाइन कर ली. थोड़े दिन बाद फिर से जेडीयू में वापस आ गए और नीतीश कुमार ने 2010 में राज्यसभा भेज दिया. 2012 में कुशवाहा ने FDI बिल पर पार्टी लाइन से अलग जाकर वोट किया. इससे नीतीश कुमार नाराज हो गए. अंत में कुशवाहा को इस्तीफा देना पड़ा. 2021 में उन्होंने अपनी पार्टी का RLSP का जेडीयू में विलय कर लिया था, लेकिन फरवरी 2023 में फिर से अलगाव हो गया और नई पार्टी RLM बना ली.
आरसीपी सिंह के राजनीतिक गुरु हैं नीतीश कुमार
पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को राजनीति में लाने का श्रेय नीतीश कुमार को जाता है. वे जेडीयू में दूसरे सबसे शक्तिशाली नेता माने जाते थे. नीतीश कुमार उन पर इतना ज्यादा भरोसा करते थे कि दिसंबर 2020 में उनको (आरसीपी सिंह) को जेडीयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया था. जुलाई 2021 से नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह के साथ मतभेद की शुरुआत हुई. कहा जाता है कि मोदी सरकार में नीतीश कुमार एक से ज्यादा मंत्री पद चाहते थे, लेकिन आरसीपी सिंह ने अकेले खुद ही मंत्री पद की शपथ ले ली. इससे नाराज होकर नीतीश कुमार ने उनसे राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छीन लिया और 2022 में उन्हें दोबारा से राज्यसभा नहीं भेजा. इस कारण से आरसीपी सिंह को केंद्रीय मंत्री पद से भी इस्तीफा देना पड़ा. इससे आरसीपी इतना नाराज हो गए कि पार्टी ही छोड़ दी.
प्रशांत किशोर से रहा पिता-पुत्र वाला रिश्ता
जन सुराज के संस्थापक और बांकीपुर के विधायक प्रशांत किशोर को चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बनाने का श्रेय भी नीतीश कुमार को जाता है. साल 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाने में अहम योगदान देने वाले प्रशांत किशोर ने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार के लिए काम किया और उन्हें बिहार की सत्ता में कायम रखा. यहीं से दोनों की दोस्ती शुरू हुई. नीतीश कुमार ने पीके को बदले में कैबिनेट मंत्री का दर्जा देते हुए 'बिहार विकास मिशन' का सलाहकार नियुक्त कर लिया. अक्टूबर 2018 में प्रशांत किशोर आधिकारिक रूप से जेडीयू में शामिल हो गए और नीतीश कुमार ने उन्हें सीधे पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया. पीके खुद कहते हैं कि नीतीश कुमार उन्हें अपना बेटा मानने लगे थे. हालांकि, 2020 में ही दोनों के रिश्तों में दरार आने लगी और दोनों की राहें अलग हो गईं.
ललन सिंह पर भी लगाम कसने का काम किया
एक वक्त था जब नीतीश कुमार ने पार्टी की कमान ललन सिंह को सौंप रखी थी. बतौर पार्टी अध्यक्ष ललन सिंह की राजद अध्यक्ष लालू यादव से नजदीकियां बढ़ने लगी थीं. सूत्रों का कहना है कि तेजस्वी यादव को बिहार का मुख्यमंत्री बनाए जाने की योजना बनाई जा रही है. एक अंग्रेजी अखबार ने इस साजिश की पोल खोल दी. उसने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि ललन सिंह ने नीतीश कुमार के एक करीबी मंत्री के साथ मिलकर यह प्रस्ताव रखा कि तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाया जाए तो वहीं नीतीश कुमार को उपमुख्यमंत्री बनाया जाए. नीतीश कुमार को जब इसकी भनक लगी तो उन्होंने ललन सिंह के पर कतर दिए. 29 दिसंबर 2023 को दिल्ली में हुई जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से हटा दिया गया था.