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14 सितंबर को हिंदी दिवस 2026 मनाया जाना है. बिहार में 'हिंदी दिवस' बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है, जिसमें सरकारी कार्यालयों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में संगोष्ठी, वाद-विवाद, कवि-सम्मेलन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. बिहार में वैसे तो मैथिली, भोजपुरी, मगही, वज्जिका और अंगिका भाषा बोली जाती हैं, लेकिन हिंदी भाषा को मजबूती प्रदान करने में बिहार का ऐतिहासिक योगदान रहा है. देश में बिहार पहला राज्य है, जिसने हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया है. खास बात यह है कि यह काम आजादी मिलने के करीब 50 साल पहले किया गया था. वहीं, स्वतंत्रता के बाद बिहार ने 'बिहार राजभाषा अधिनियम, 1950' के जरिए हिंदी को राज्य की राजभाषा का दर्जा देने का फैसला लिया था.
देश में फारसी भाषा के हावी होने के कारण
बता दें कि भारत ने लंबे समय तक गुलामी का दौर देखा है. जब मुगलों का दौर था तो देश में फारसी और अरबी का चलन था. मुगल शासकों के दरबार में फारसी भाषा में ही सारे कामकाज होते थे. मुगल शासक अकबर ने अपने शासनकाल में फारसी को अनिवार्य प्रशासनिक भाषा बना दिया था. उस दौर में सेना या अन्य किसी विभाग में नौकरी पाने के लिए फारसी सीखना अनिवार्य हो गया था. इस वजह से मुस्लिमों के अलावा हिंदुओं को भी फारसी भाषा सीखनी पड़ी. मुगलों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए स्थानीय राजाओं और नवाबों ने भी फारसी को अपनाया. भारतीय न्याय पालिका में फारसी भाषा रच-बस गई थी. यही वजह है कि आज भी हमारी अदालतों और पुलिस विभाग में इस्तेमाल होने वाले कई शब्द फारसी और अरबी भाषा के हैं, इनमें- मुवक्किल, गवाह, मुलजिम, मुजरिम, वकालतनामा, तारीख, पेशी, ब्यान शामिल हैं.
लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी थोपने का काम किया
मुगलों के बाद जब अंग्रेजों ने भारत में अपना शासन शुरू किया, तब भी उन्होंने फारसी भाषा को हटाकर अंग्रेजी थोप दी. साल 1837 तक अदालती कामकाज और रिकॉर्ड के लिए फारसी का ही इस्तेमाल होता रहा. इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने 10 जून 1834 को लॉर्ड मैकाले को भारत का गवर्नर बनाकर भेजा. मैकाले ने भारत आते ही अंग्रेजी भाषा के विस्तार पर जोर दिया. उन्होंने भारतीय दंड संहिता (IPC) का निर्माण किया और सन 1837 में अदालतों और सरकारी दफ्तरों से फारसी की अनिवार्यता को समाप्त करके अंग्रेजी को प्रशासनिक और न्यायिक कामकाज की मुख्य भाषा बना दिया. इस कानून में स्थानीय भाषाओं के इस्तेमाल को भी महत्व देने की बात कही गई. इसके अलावा मैकाले ने भारत की शिक्षा व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव करते हुए अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली की नींव रखी. सरकारी नौकरियां, सरकारी दफ्तरों और अदालतों में अंग्रेजी का इस्तेमाल होने लगा और भारतीयों को अंग्रेजी सीखने के लिए मजबूर होना पड़ा.
आज भी दिखता है फारसी-अंग्रेजी का प्रभाव
आजादी के बाद भी देश की अदालतों और सरकारी दफ्तरों में फारसी और अंग्रेजी का बहुत गहरा और लंबा प्रभाव देखने को मिला. आजादी के बाद हिंदी को राजकीय भाषा का दर्जा मिला और धीरे-धीरे सरकारी दफ्तरों में हिंदी भाषा में कामकाज शुरू हुआ हैं. हालांकि, भारत की न्याय प्रणाली में अंग्रेजी भाषा का आज भी दबदबा देखने को मिलता है. सुप्रीम कोर्ट और सभी हाई कोर्ट की आधिकारिक भाषा आज भी अंग्रेजी ही है.
हिंदी को बढ़ाने में बिहार का अतुल्यनीय योगदान
हिंदी भाषा को बढ़ाने में बिहार का कोई दूसरा राज्य मुकाबला नहीं कर सकता. जैसा कि ऊपर भी बताया है कि बिहार ही एकमात्र राज्य है जिसने अंग्रेजी शासनकाल में हिंदी को अपनी आधिकारिक भाषा का दर्जा देने का काम किया था. आजादी के बाद बिहार पहला राज्य बना, जिसने हिंदी को अपने यहां राजभाषा का दर्जा दिया. 1995 में बिहार सरकार ने आदेश दिया कि सरकारी दफ्तरों, बोर्डों और नेमप्लेटों पर अंग्रेजी के जगह हिंदी का प्रयोग हो. इसके अलावा लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं और विज्ञापनों में भी हिंदी को प्रमुखता दी गई.
बिहार ने हिंदी साहित्य को नई ऊंचाई दी
साहित्य के क्षेत्र में बिहार ने हर कालखंड में सार्थक हस्तक्षेप किया है. आदिकालीन कवि विद्यापति बिहार से ही थे. सूरदास की रचनाओं में उनका प्रभाव साफ देखने को मिलता था. कबीर की रचनाओं पर हिंदी के आदिकवि सरहप्पा का असर दिखता है. सरहप्पा वैसे तो ओडिशा के थे, लेकिन उस कालखंड में उनका क्षेत्र अंग प्रदेश (बिहार) में आता था. इसके अलावा वे नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य थे. बिहार के रामधारी सिंह 'दिनकर' ने हिंदी साहित्य को वैश्विक पटल पर ले जाने का काम किया. हिंदी साहित्य को एक नई ऊंचाई देने के कारण उन्हें 'राष्ट्रकवि' भी कहा जाता है. राष्ट्रकवि के अलावा बिहार ने आचार्य शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, और राजा राधिकारमरण प्रसाद सिंह जैसे महान साहित्यकारों को देने का काम किया. हिंदी की खड़ी बोली के पहले लेखक महेश नारायण भी बिहार से थे. उन्होंने सन 1881 में ‘स्वप्न’ काव्य की रचना की थी. हिंदी साहित्य में जनार्दन झा ‘द्विज’, जानकीवल्लभ शास्त्री, नलिन विलोचन शर्मा जैसे साहित्यकारों का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा हुआ है. बिहार के हीरा डोम पहले हिन्दी दलित कवि के रूप में जाने जाते हैं
सिनेमा के क्षेत्र में बिहार के बड़े कलाकार
सिनेमा के क्षेत्र में भी बिहार के कलाकारों ने अपना लोहा मनवाया है. बिहारी बाबू के नाम से मशहूर शत्रुघ्न सिन्हा ने 80 के दशक में बॉलीवुड पर राज किया. उनको देखकर मनोज वाजपेयी और गिरिधर झा ने मुंबई का रुख किया और बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान स्थापित की. इसके बाद रामायण तिवारी, राकेश पांडेय, पंकज त्रिपाठी, अविनाश दास, क्रांति प्रकाश झा, नीतीन चन्द्रा और विजय कुमार ने सिनेमा के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा की छाप छोड़ी. गीतकार शैलेन्द्र और संगीतकार अंजान भी बिहार से हैं. डायरेक्टर प्रकाश झा का संबंध भी बिहार से है.