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रात 12 बजे लड़कियां सड़कों पर निकल सकती हैं: जमुई और समस्तीपुर की घटनाओं से ध्वस्त हुआ सरकार का दावा

'रात 12 बजे महिलाएं सुरक्षित घरों से निकल सकती हैं...' यह बात केवल रैलियों में अच्छी लगती है. एक महिला जब अकेले घरों से निकलती है तो उस पर क्या गुजरती है, वो ही बता सकती है. और यह केवल कानून व्यवस्था का ही नहीं है, समाज व्यवस्था का भी मसला है. हम अपने बच्चों की परवरिश कैसे कर रहे हैं, इस पर भी सोचें.

रात 12 बजे लड़कियां सड़कों पर निकल सकती हैं: जमुई और समस्तीपुर की घटनाओं से ध्वस्त हुआ सरकार का दावा
Image Credit: रात को 12 बजे महिलाओं का घरों से निकलना आज भी सुरक्षा की दृष्टि से रिस्क वाला है. (AI Image)

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था- 'बिहार में रात के 12 बजे भी अगर किसी ने आपको छू भी दिया तो सम्राट चौधरी सुबह अपना इस्तीफा दे देगा.' सम्राट चौधरी से पहले मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ने सार्वजनिक मंचों से इस बात को तवज्जो देते हुए पेश करते थे कि 2005 से पहले के बिहार और आज के बिहार में बहुत बदलाव आया है. वे कहते थे- '2005 से पहले क्या स्थिति थी? शाम के बाद कोई घरों से निकलता था? आज कानून का राज स्थापितहुआ है. अब महिलाएं और बेटियां रात के 12 बजे के बाद भी बिना किसी डर के सुरक्षित सड़कों पर आ-जा सकती हैं.' अफसोस! जमुई और समस्तीपुर की घटनाएं इन दोनों बयानों पर सवाल उठा रही हैं. दोनों घटनाओं की पीड़िताएं उस समय को कोस रही होंगी कि कहां से कहां हम घर से निकले. तब तो रात के 12 भी नहीं बजे थे. जमुई वाली घटना शाम के 7 बजे हुई तो समस्तीपुर वाली वारदात का वीडियो देखें तो वो दिन के उजाले में होती दिख रही है.

ये दोनों घटनाएं कानून व्यवस्था पर सवाल तो उठा ही रही हैं, हमारी समाज व्यवस्था पर भी बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगाते हैं. हकीकत यह है कि रात 12 बजे घर से सुरक्षित बाहर निकलने के दावे के उलट दिन के उजाले या शाम के धुंधलके में ही सुरक्षा का पूरा ताना-बाना ध्वस्त होता दिख रहा है. दरअसल, जमुई और समस्तीपुर की घटनाएं केवल कानून व्यवस्था फेलियर होने का मामला नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम पर तमाचा है, जो महिलाओं को रात के 12 बजे सुरक्षित निकलने के दावे करता है और उनको उस तमाशबीन के रहमोकरम पर छोड़ देता है.

लाइक्स और व्यूज की हवस में हम अंधे

कानून कहता है कि नाबालिग लड़की से छेड़छाड़ की स्थिति में उसकी पहचान गोपनीय रखी जानी चाहिए. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से भी कई तरह के निर्देश जारी किए जा चुके हैं, लेकिन हमारे इस रीलबाज समाज में लाइक्स और व्यूज की हवस हमें अंधा बना रही है और हम धड़ल्ले से ऐसे वीडियोज वायरल करते हैं, ताकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हम डॉलर कमा सकें. ऐसे में, हम यह भी नहीं सोच पाते कि लड़की किसी की बेटी और किसी की बहन हो सकती है और इससे उसकी कितनी बदनामी होगी. हम यह भी भूल जाते हैं कि अगर यही घटना हमारी बहन और बेटियों के साथ भी हुई तो भी क्या हम ऐसे ही असंवेदनशील होकर वीडियो बनाएंगे.

जमुई में शाम को 7 बजे और समस्तीपुर में दिन के उजाले में जो कुछ भी हुआ, वह जाहिर करता है कि असामाजिक तत्वों में पुलिस का खौफ नहीं है. ये घटनाएं कानून व्यवस्था को लेकर कुछ सवाल भी खड़े करती हैं:

डायल 112 और गश्ती दल कहां था?

पुलिस की ओर से आपातकालीन सेवा के दावे किए जाते हैं. पिंक पेट्रोलिंग और गश्ती के दावे किए जाते हैं, लेकिन जहां वारदात होती है, वहां गश्ती दल की क्या स्थिति थी, इस पर कोई बात ही नहीं कर रहा है. उस क्षेत्र में जो गश्ती दल को तैनात किया गया था, वो क्या कर रहा था, ये कौन बताएगा?

घटना कितना भी गंभीर हो, पुलिस के बयान का पुराना पैटर्न

जब इस तरह की कोई घटना होती है तो पुलिस का सेट डायलॉग होता है कि मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और एसआईटी बना दी गई है. कुछ आरोपी पकड़े गए हैं और बाकियों की तलाश की जा रही है. यह ऐसा जेनेरिक बयान है कि किसी भी घटना को लेकर पुलिस की बाइट में चिपकाई जा सकती है. एक दारोगा भी वहीं बयान देता है और जिले का एसपी भी उसे दोहराता है. अब अगर जमुई और समस्तीपुर जैसे कांड में ऐसे बयान पुलिस देगी तो वह गंभीर तो नहीं ही होगी. क्या पुलिस ऐसे मामलों को स्पीडी ट्रायल में ले जाएगी, ताकि जल्द से जल्द पीड़िताओं को न्याय मिल सके और मनचलों के लिए नजीर पेश हो सके.

वीडियो वायरल करने वालों पर कब होगी कार्रवाई?

मनचलों ने तो दुस्साहस दिखाई ही और लड़कियों को छेड़ने से ज्यादा उन्हें मानसिक संताप दिया, लेकिन उनका क्या जो धड़ल्ले से सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल कर रहे हैं और लड़कियों की पहचान और उनके आत्मसम्मान को धता बता रहे हैं. ऐसे लोगों के खिलाफ क्या पुलिस भारतीय न्याय संहिता और आईटी एक्ट की सख्त धाराओं के तहत मुख्य आरोपियों की तरह कार्रवाई करेगी या केवल बयानों में ही इसके बखान किए जाएंगे. अगर पुलिस ने ऐसा कुछ किया है तो उसे आगे आकर ये सब बातें मीडिया को बतानी चाहिए.

पुलिस की जवाबदेही कब तय होगी?

चाहे जमुई हो या फिर समस्तीपुर, संबंधित पुलिस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. अमूमन पुलिस पर कार्रवाई तभी होती है, जब क्षेत्रीय लोगों की भावना भड़क जाती है और पूरा इलाका उद्वेलित हो जाता है. जमुई और समस्तीपुर दोनों जगहों पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. सत्ता जब तक पुलिस की जवाबदेही तय नहीं करती, तब तक ऐसी घटनाओं को रोकना या इस पर लगाम कसना मुश्किल होगा.

1. क्या पुलिस से सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि गश्ती दल कहां था और क्या कर रहा था और उसे घटना के बारे में कब पता चला? 
2. क्या पुलिस से यह सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि उस इलाके में तब किसकी ड्यूटी थी और बीट दारोगा कहां था? 
3. क्या इलाके के चौकीदार को भी घटना के बारे में पता नहीं चला?
4. उस इलाके के सरपंच, मुखिया आदि को भी घटना के बारे में जानकारी नहीं थी या फिर जानकारी होते हुए भी वीडियो के वायरल होने का इंतजार किया गया.

रात 12 बजे घरों से निकलें तो सुरक्षा का भी ख्याल रखें

जब तक हम ठोस कार्रवाई नहीं करेंगे, रात को 12 बजे सुरक्षित घरों से निकलने की बात कहकर दरअसल हम महिलाओं को चिढ़ाने का काम करते हैं. आज एआई और चांद पर जाने के समय में हम महिलाओं को इस बात की तसल्ली दिला रहे हैं कि वह रात को 12 बजे अपने घरों से निकल सकती है, जबकि हकीकत में कोई भी समझदार महिला ऐसा करने से पहले 100 बार सोचेगी और फिर अपने पति, भाई या बेटे के साथ ही बाहर निकलेगी. क्योंकि, सुरक्षित महिलाएं केवल नेताओं के नारों में होता है. उसके अकेले घर से बाहर निकलते ही राक्षसी प्रवृत्ति के लोग सक्रिय हो जाते हैं. इसलिए नेताओं की बातों पर भरोसा न करें और अपनी सुरक्षा का ख्याल खुद ही रखें.

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About the Author

Sunil Mishra

Sunil Mishra

इंडस्ट्री में 2 दशकों का अनुभव है तो खबरों की बाजीगरी आती है. डिजिटल मीडिया में आधे दशक हो चुके हैं. लंबे समय तक प्रिंट मीडिया में काम करना डिजिटल की दुनिया में मददगार साबित हुआ. दैनिक जागरण से शुरू हुआ सफर, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, News Nation, ABP और India Ahead होते हुए Z Bihar Jharkhand तक पहुंचा है. बिहार और झारखंड की स्थानीय और राजनीतिक खबरों की विशेष समझ.
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