डिजिटल दौर का अनूठा पितृकर्म: विदेश में बैठे यजमान, गयाजी के देवघाट पर वीडियो कॉल से हुआ पिंडदान
गयाजी में आस्था और तकनीक का अद्भुत संगम देखने को मिला. देवघाट पर मोबाइल स्क्रीन पर यजमान नजर आए और फल्गु तट पर मंत्र गूंजने लगे. इसी दृश्य ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया. दरअसल, पुरोहितों के हाथों में मोबाइल था और स्क्रीन पर हजारों किलोमीटर दूर विदेश में बैठे यजमान, जिन्होंने डिजिटल माध्यम से पिंडदान कराया.
क्या हजारों किलोमीटर दूर विदेश में बैठकर भी मोक्षदायिनी गयाजी में अपने पूर्वजों का पिंडदान कराया जा सकता है? जी हां, गयाजी के विश्वप्रसिद्ध पितृपक्ष मेले से आस्था और तकनीक का एक बेहद अनोखा संगम सामने आया है. विदेश में रह रहे अजय गुप्ता गयाजी तो नहीं पहुंच सके, लेकिन उन्होंने अपने पितरों के प्रति अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाया. फल्गु नदी के पवित्र देवघाट पर मोबाइल की स्क्रीन चमकी, वीडियो कॉल से यजमान जुड़े और पुरोहितों के मंत्रोच्चार के बीच पिंडदान संपन्न हुआ. देवघाट पर जुटे श्रद्धालुओं के लिए भी यह नजारा कौतूहल का केंद्र बन गया. आइए देखते हैं इस खास रिपोर्ट में कि आखिर ऑनलाइन पिंडदान की यह प्रक्रिया कैसे पूरी होती है.
विदेश में बैठे यजमान, गयाजी में हुआ पिंडदान
गयाजी के प्रसिद्ध देवघाट पर आस्था के महाकुंभ पितृपक्ष मेले में श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ा है, लेकिन इसी भीड़ के बीच एक दृश्य ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया. देवघाट पर पुरोहितों के हाथों में मोबाइल था और स्क्रीन पर हजारों किलोमीटर दूर विदेश में बैठे यजमान अजय गुप्ता और प्रसून पाल. अजय गुप्ता और प्रसून पाल व्यस्तता या दूरी के कारण गयाजी नहीं आ सके, लेकिन उन्होंने तकनीक का सहारा लेकर अपने पितरों के निमित्त कर्मकांड पूरा कराया. पूरे अनुष्ठान के दौरान वे वीडियो कॉल पर हाथ जोड़े जुड़े रहे और पुरोहितों के निर्देशानुसार हर विधि में सहभागी बने.
डिजिटल दौर में अनोखा पितृकर्म को देखने उमड़ी भीड़
ऑनलाइन माध्यम से हुए इस पिंडदान को देखने के लिए देवघाट पर लोगों की भीड़ जमा हो गई. आखिर विदेश में बैठा व्यक्ति गयाजी में शास्त्र सम्मत तरीके से पिंडदान कैसे करा सकता है? धार्मिक मान्यताओं और पुरोहितों के अनुसार, ऑनलाइन पिंडदान में सबसे मुख्य आधार नाम, गोत्र और प्रतिनिधि का अधिकार होता है.
मूल यजमान मोबाइल स्क्रीन के जरिए लगातार प्रक्रिया को देखता है
पुरोहितों के मुताबिक, सबसे पहले विदेश में बैठे यजमान का नाम और गोत्र उच्चारित कर संकल्प कराया जाता है. इसके बाद गयाजी में मौजूद किसी ब्राह्मण या प्रतिनिधि को कर्मकांड करने का अधिकार सौंपा जाता है. वही प्रतिनिधि यजमान की जगह बैठकर पिंडदान की प्रक्रिया पूरी करता है, जबकि मूल यजमान मोबाइल स्क्रीन के जरिए लगातार प्रक्रिया को देखता है और प्रणाम करता है.
विदेश में बैठे अजय गुप्ता का यह प्रयास लाखों लोगों के लिए मिसाल
डिजिटल युग में तकनीक और परंपरा का यह मेल यह साबित करता है कि स्थान चाहे कोई भी हो, अगर मन में श्रद्धा और भाव सच्चा हो, तो दूरी कभी बाधा नहीं बनती. विदेश में बैठे अजय गुप्ता का यह प्रयास उन लाखों लोगों के लिए एक मिसाल है जो किसी कारणवश गयाजी नहीं पहुंच पाते.
गयाजी में आस्था और तकनीक का अद्भुत संगम
गयाजी के देवघाट से आई यह तस्वीर बताती है कि बदलते समय के साथ धार्मिक अनुष्ठानों के तरीके भले बदल रहे हों, लेकिन सनातन परंपराओं के प्रति आस्था और पितरों के प्रति श्रद्धा आज भी वैसी ही अटूट है.
रिपोर्ट: जय प्रकाश कुमार