नदियों को कैद करने की भूल आज बिहार के गले की बनी शूल: पटना के बाढ़ सम्मेलन में बांध बनाए जाने का हुआ था विरोध
आदमी अपनी सुविधा के लिए क्या नहीं करता है? हर रोज प्रकृति से खिलवाड़ करता है. बांध बनाता है, टनल बनाता है, पहाड़ों पर रोड बनाता है, लेकिन यह सब करते वक्त वह भूल जाता है कि जब प्रकृति इसका बदला लेगी तो उसका हश्र क्या होगा?
बाढ़ को आने दो और पानी को निकल जाने दो. उत्तर बिहार के मिथिला, कोसी और तिरहुत क्षेत्रों में 19वीं और 20वीं सदी में यह एक स्थापित मान्यता थी कि बाढ़ के पानी को रोकना नहीं है, बल्कि उसे निकलने देना है. तब बाढ़ को आज की तरह तबाही नहीं, जीवनदायिनी माना जाना था. बाढ़ की त्रासदी के बीच एक भूला बिसरा तथ्य है, जिसे याद करना अभी के समय के लिए मौजूं प्रतीत होता है. वो तथ्य है पटना का बाढ़ सम्मेलन. यह सम्मेलन 1937 में हुआ था, जिसमें वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने अंग्रेजी सरकार को चेताया था कि तटबंध मत बनाओ, बल्कि बाढ़ के पानी को आने दो. इस तरह वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने उत्तर बिहार के आम लोगों की धारणा को तकनीकी और वैज्ञानिक रूप से सही ठहराया था. इससे यह भी साबित हो गया था कि तब बाढ़ एक आपदा नहीं, वरदान मानी जाती थी. उस समय के लोग बाढ़ आना नहीं, बल्कि पानी आना बोलते थे. कई जगहों पर इसे दहिया भी कहा जाता था.
उस समय स्थानीय लोगों की तरह इंजीनियर और वैज्ञानिक भी मानते थे कि नेपाल से आने वाली नदियां अपने साथ पानी ही नहीं, गाद भी लाती थीं. बाढ़ का पानी फैलने से खेतों में गाद फैल जाती थी. 10 से 15 दिनों में जब पानी निकल जाता था तो गाद खेतों को उपजाऊ बनाने का काम करती थी. इससे रबी और दहलन का फसल अच्छा होता था. साथ ही भूजल का स्तर भी रिचार्ज हो जाता था.
1934 के भूकंप के बाद बिहार में नदियों के रास्ते बदले और इससे नुकसान व्यापक पैमाने पर हुआ था. इससे निजात पाने के लिए अंग्रेजी सरकार ने 1937 में 10 से 12 नवंबर के बीच पटना में एक बड़ी कांफ्रेंस बुलाई, जिसमें वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बुलाया गया था. सम्मेलन में उस समय के बिहार के चीफ इंजीनियर कैप्टन जीएफ हॉल ने एक ऐतिहासिक दस्तावेज पेश किया था.
चीफ इंजीनियर कैप्टन जीएफ हॉल की ओर से पेश किए गए उस दस्तावेज में कहा गया था,
तटबंध बनाकर नदी को कैद करना बड़ी भूल होगी. तटबंद गाद को जमा करेंगे, जिससे नदियों का तल जमीन से ऊंचा हो जाएगा. जिस दिन बांध टूटेगा, प्रलय जैसे हालात हो जाएगा. बाढ़ एक समस्या नहीं, जिसे रोकना पड़े. यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे रास्ता देना जरूरी है.
पटना के बाढ़ सम्मेलन में विशेषज्ञों का मानना था,
- नदियों का फैलाव न रोका जाए. इससे पानी कुछ दिनों में निकल जाएगा.
- लोगों को ऊंचे टीले पर बसाया जाए, ताकि वे प्रभावित न हो सकें.
- नदियों के पानी की राह में रेलवे ट्रैक, पक्की सड़कें न बनाई जाएं.
आजादी के बाद विशेषज्ञों की राय को दरकिनार कर दिया गया
पटना के बाढ़ सम्मेलन के 10 बाद आजादी मिल गई और उसके बाद की सरकारों ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की चेतावनी को नजरंदाज कर दिया. आज कोसी, गंडक और बागमती नदी पर हजारों किलोमीटर के बांध बना दिए गए हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि 1954 में जब बिहार में तटबंधों का जाल बिछना शुरू हुआ, तब बाढ़ प्रभावित इलाकों का क्षेत्रफल 25 लाख हेक्टेयर हुआ करता था और आज जब हजारों किलोमीटर के बांध बनाए जा चुके हैं, तब बाढ़ प्रभावित इलाकों का क्षेत्रफल 68 लाख से 70 लाख हेक्टेयर तक हो चुका है.
प्रसिद्ध पर्यावरणविद और आईआईटीयन दिनेश मिश्रा कहते हैं,
1955 में बिहार में केवल 160 किलोमीटर लंबे बांध बनाए गए थे और आज इनकी लंबाई 3700 किलोमीटर है. 1954 में 25 लाख हेक्टेयर भूमि बाढ़ के दायरे में थी और आज यह क्षेत्रफल 69 लाख हेक्टेयर हो चुका है. हमारे प्रयास लाभ की जगह नुकसान पहुंचा रहे हैं. किसी न किसी को इसका चिंता करनी चाहिए. रही नेपाल में हाई डैम बनाने की तो उसका पहला प्रस्ताव भी पटना के बाढ़ सम्मलेन में ही पेश किया गया था. आज भी इसकी चर्चा और आश्वासन ही दिए जाते रहे हैं. सवाल पानी को रोकने का नहीं, उसकी शीघ्र निकासी का है. तटबंध इस समस्या को बढाते हैं, यह निर्विवाद सत्य है. अगर हाई डैम बना भी तो वह समस्या को कितना संभाल पाएगा, वह भी संदेह के घेरे में है. परेशानी इस बात की है कि सही कदम कब उठाया जाएगा?
आज बिहार का अधिकांश हिस्सा बाढ़ में डूबा हुआ है. जिस पानी को पुराने समय में खेतों की उर्वरता बढ़ाने वाला वरदान समझा जाता था, आज वह तटबंधों में कैद होकर विनाशकारी विभीषिका बन चुका है. पता नहीं, हमारे नीति निर्धारकों को यह बात कब समझ में आएगी. पहले बांध बनाए गए और आज इन बांधों के चलते नदियों में जमे गाद को निकालने के लिए राष्ट्रीय प्रबंधन नीति की वकालत की जा रही है.