App

बांकीपुर के बाद पटना शिक्षक सीट: सम्राट चौधरी के राज में भाजपा के गढ़ में लहरा रहा जन सुराज पार्टी और राजद का पताका

भारतीय जनता पार्टी के साथ एक दिक्कत है. नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने के बाद वह बांकीपुर हार जाती है. जेपी नड्डा के अध्यक्ष रहते वह हिमाचल हार जाती है. सीएम योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद वह गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव हार जाती है.

बांकीपुर के बाद पटना शिक्षक सीट: सम्राट चौधरी के राज में भाजपा के गढ़ में लहरा रहा जन सुराज पार्टी और राजद का पताका
Image Credit: सम्राट चौधरी, मुख्यमंत्री, बिहार सरकार (File Photo)

बिहार में ​भारतीय जनता पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 15 अप्रैल को अपनी सरकार बनाई थी और उसके बाद हुए दो बड़े चुनावों में पार्टी को मुंह की खानी पड़ी है. अगस्त में हुए बांकीपुर उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था और विधान परिषद चुनाव में पटना शिक्षक सीट भी उसे गंवानी पड़ गई है. दोनों भाजपा की परंपरागत सीटें रही हैं. अब राज्य में पार्टी की रणनीति और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठना लाजिमी है. इन दोनों हार में एक बात कॉमन है कि दोनों सीटें शहरी वोटर वाली हैं और दोनों ही जगह विरोधी दलों ने पार्टी के आधार वोट बैंक में सेंधमारी की है. हालांकि, विधान परिषद चुनाव में पार्टी को कोई नुकसान नहीं हुआ है. उसके पास 3 सीटें थीं और 2 जीत ली हैं, दरभंगा स्नातक की सीट पर अभी रिजल्ट नहीं आया है. लेकिन पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र, जो भाजपा का गढ़ हुआ करता था, आज वहां राजद का पताका फहरा रहा है.

दरक रहा भाजपा का शहरी किला

बांकीपुर और पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जन सुराज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल की ओर से भेद लगाना पार्टी के लिए निश्चित रूप से निराशाजनक है. पार्टी के लिए यह और भी चिंतनीय इसलिए हो जाता है, क्योंकि दोनों ही शहरी वोटर वाले इलाके हैं और शहरी वोटरों के लिए भाजपा दशकों से पहली पसंद रही है. इसके अलावा पटना शिक्षक निर्वाचन सीट तो प्रबुद्ध वोटरों की रही है, जिसमें भी भारतीय जनता पार्टी के अलावा किसी और की दाल गलती नहीं दिखती थी. 

राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट बांकीपुर हार गई पार्टी

बांकीपुर सीट तो इसलिए भी ज्यादा अहम थी, क्योंकि वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की सीट थी और वहां कहा जाता था कि भाजपा कुत्ते और बिल्ली को भी चुनाव में खड़ा कर दे तो जीत निश्चित है, लेकिन अब वह बात नहीं रही. प्रशांत किशोर ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की पुश्तैनी और परंपरागत सीट को जीतने का दम दिखाया और भारतीय जनता पार्टी पस्त हो गई. इसलिए सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी अपना किला बचाने में विफल रही है? एक सवाल यह भी कि क्या बीजेपी के गढ़ में सेंधमारी शुरू हो चुकी है?

नीतीश के महागठबंधन में जाने पर भी किला बचा ले गई थी भाजपा

सवाल इसलिए भी उठते हैं कि नीतीश कुमार की लोकप्रियता के चरम और महागठबंधन में जाने के बाद भी भाजपा ये दोनों सीटें नहीं हारी थीं, लेकिन नीतीश कुमार के सत्ता से हटने और सम्राट चौधरी को गद्दी मिलने के बाद से एक के बाद एक दोनों सीटें उसके हाथ से रेत की तरफ फिसल गईं और पार्टी मुंह ताकती रह गई. इस तरह सम्राट चौधरी अपनी शुरुआती अग्निपरीक्षा में विफल साबित होते दिख रहे हैं. इसे पार्टी की रणनीति, संगठन की प्रभावशीलता और कार्यकर्ताओं का मनोबल पस्त होने के रूप में देखा जा सकता है.

नंबरों के लिहाज से भाजपा को नुकसान नहीं

वैसे तो विधान परिषद की 8 सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा को नंबर के लिहाज से कोई नुकसान होता नहीं दिख रहा है. 3 विधान पार्षद उसके पास थे और 2 फिर से जीत गए हैं. बीजेपी को उम्मीद है कि दरभंगा स्नातक सीट पर भी वह जीत हासिल करेगी. पार्टी ने तिरहुत शिक्षक और कोसी स्नातक सीटों पर जीत दर्ज की है, लेकिन एनडीए की ओर से सभी 8 सीटों पर जीत के दावे किए जा रहे थे, उसका क्या हुआ? जनता दल यूनाइटेड का एक प्रत्याशी इस चुनाव में विजयी रहा है. कुल मिलाकर एनडीए को अभी तक 3 सीटें हासिल हुई हैं. पहले भी उसके पास 4 सीटें थीं. 

उठेंगे सम्राट चौधरी पर सवाल

बांकीपुर और पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा की हार से सम्राट चौधरी पर सवाल तो उठेंगे, लेकिन उन सवालों का जवाब इस तरह देने की कोशिश होगी कि पार्टी ने अपने नंबर को बरकरार रखा है. अनंत सिंह के पुरजोर विरोध के बाद भी पटना स्नातक सीट से जेडीयू के नीरज कुमार का जीतना भी सम्राट चौधरी के पक्ष में जाता है, लेकिन अपने गढ़ को गंवाकर नई सीटें जीतना कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं मानी जाएगी. खुद भाजपा आलाकमान के माथे पर भी इस रिजल्ट को लेकर बल पड़ गए होंगे. पार्टी के सामने अपने गढ़ में संगठन को फिर से प्रभावी बनाने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने की पुरजोर कोशिश करनी होगी.

सारण शिक्षक सीट पर बागियों ने खेल बिगाड़ा

एनडीए में सारण शिक्षक सीट से निर्दलीय और एनडीए के बागी राहुल राज की जीत को लेकर भी सवाल उठेंगे. सवाल इस बात को लेकर होंगे कि क्या प्रत्याशियों के चयन में गड़बड़ी हुई? सारण शिक्षक सीट पर जिस तरह से उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के 3 विधायकों ने अपनी ओर से रामपुकार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया गया था, वह भी जेडीयू प्रत्याशी आनंद पुष्कर के खिलाफ गया. नाम वापसी की तिथि बीत जाने के बाद रामपुकार सिन्हा ने अपना नाम वापस लिया, जिसका कोई मतलब नहीं रहा. वे जेडीयू प्रत्याशी का पूरा नुकसान कर चुके थे और हार की पटकथा लिख चुके थे.

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

Sunil Mishra

Sunil Mishra

इंडस्ट्री में 2 दशकों का अनुभव है तो खबरों की बाजीगरी आती है. डिजिटल मीडिया में आधे दशक हो चुके हैं. लंबे समय तक प्रिंट मीडिया में काम करना डिजिटल की दुनिया में मददगार साबित हुआ. दैनिक जागरण से शुरू हुआ सफर, अमर उजाला, हिन्दुस्तान, News Nation, ABP और India Ahead होते हुए Z Bihar Jharkhand तक पहुंचा है. बिहार और झारखंड की स्थानीय और राजनीतिक खबरों की विशेष समझ.
Read More