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वाराणसी शिक्षक MLC चुनाव का नतीजा भाजपा के लिए झटका है. समाजवादी पार्टी के लाल बिहारी यादव ने भाजपा के डॉ. प्रमोद कुमार मिश्रा को 5,015 वोटों से हरा दिया. लाल बिहारी यादव को 11,612 वोट मिले जबकि प्रमोद मिश्रा के खाते में 6,597 वोट आए. निर्दलीय उम्मीदवार चेत नारायण सिंह को भी 3,471 वोट मिले. इस चुनाव में सबसे ज्यादा ध्यान जीत के अंतर ने खींचा. 2020 में लाल बिहारी यादव महज 936 वोटों से जीते थे. इस बार अंतर पांच हजार से ज्यादा हो गया. यानी भाजपा मुकाबले को करीबी बनाने में भी नाकाम रही. नतीजे के पीछे तीन बातें अहम हैं. लाल बिहारी यादव की शिक्षक राजनीति में पुरानी पकड़, भाजपा के उम्मीदवार का पिछली बार से कम वोट पाना और चेत नारायण सिंह की मौजूदगी. इनके साथ शिक्षक समुदाय के मुद्दों और दोनों दलों की चुनावी तैयारी को भी समझना होगा.
2020 के चुनाव में लाल बिहारी यादव को 7,766 वोट मिले थे. डॉ. प्रमोद मिश्रा को 6,830 वोट मिले और वह 936 वोटों से पीछे रह गए. उस समय प्रमोद मिश्रा निर्दलीय उम्मीदवार थे. इस बार वह भाजपा के टिकट पर मैदान में उतरे. भाजपा के साथ आने के बाद उनके वोट बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन नतीजा उलटा रहा. इस बार पहली वरीयता की गिनती में प्रमोद मिश्रा को 6,060 वोट मिले. अंतिम गणना में यह संख्या 6,597 तक पहुंची. यानी 2020 के मुकाबले उनके कुल वोट कम रहे. दूसरी ओर लाल बिहारी यादव के पहली वरीयता के वोट ही बढ़कर 10,958 हो गए. पिछली बार के मुकाबले उन्हें 3,192 ज्यादा पहली वरीयता के वोट मिले. यह अंतर बताता है कि सपा उम्मीदवार ने अपना समर्थन बढ़ाया, जबकि भाजपा का टिकट प्रमोद मिश्रा के लिए अतिरिक्त वोट जुटाने में कामयाब नहीं रहा. इसका मतलब यह नहीं कि भाजपा के हर समर्थक ने इस बार दूसरी पार्टी को वोट दिया. लेकिन नतीजे बताते हैं कि पार्टी का चुनाव चिह्न और संगठन उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ की कमी पूरी नहीं कर पाए. शिक्षक मतदाताओं के बीच लाल बिहारी यादव की अपनी पहचान ज्यादा मजबूत दिखाई दी.
चेत नारायण सिंह की उम्मीदवारी भाजपा के लिए एक मुश्किल जरूर बनी. वह निर्दलीय चुनाव लड़े और पहली वरीयता में उन्हें 3,111 वोट मिले. अंतिम गणना के बाद उनके कुल वोट 3,471 हो गए. उनकी मौजूदगी ने मुकाबले में तीसरा मजबूत चेहरा खड़ा कर दिया. लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है. चेत नारायण सिंह को मिले सभी वोट भाजपा के खाते में चले जाते.. यह मानना सही नहीं होगा. शिक्षक MLC चुनाव में उम्मीदवार की पुरानी पहचान और शिक्षक संगठनों से जुड़ाव भी असर डालते हैं. चेत नारायण सिंह के समर्थक जरूरी नहीं कि सभी भाजपा के मतदाता रहे हों. पहली वरीयता के वोटों में लाल बिहारी यादव को 10,958 और प्रमोद मिश्रा को 6,060 वोट मिले. दोनों के बीच 4,898 वोटों का अंतर था. यह बढ़त चेत नारायण सिंह के वोटों के बंटवारे से अलग भी एक बड़ी कहानी बताती है. सपा उम्मीदवार को शुरुआत से ही ज्यादा समर्थन मिला. इसलिए भाजपा की हार का पूरा कारण बागी उम्मीदवार को बताना आसान होगा लेकिन अधूरा. हो सकता है कि चेत नारायण सिंह ने समीकरण प्रभावित किया हो. फिर भी भाजपा के लिए यह टेंशन वाली बात है कि उसके आधिकारिक उम्मीदवार को पहली वरीयता में ही सपा से इतने कम वोट क्यों मिले.
लाल बिहारी यादव की जीत को समझने के लिए उनकी शिक्षक राजनीति का सफर देखना होगा. उनका जन्म 1 जुलाई 1960 को आजमगढ़ जिले के विशुनपुर गांव में हुआ था. वह शिक्षक और शिक्षा संस्थानों से जुड़े रहे हैं. वित्तविहीन स्कूलों के शिक्षकों के मानदेय और अधिकारों के मुद्दे उठाने से उन्हें शिक्षक समुदाय में पहचान मिली. 2004 में उन्होंने उत्तर प्रदेश वित्तविहीन माध्यमिक शिक्षक संघ बनाया और संगठन के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर काम किया. उनका जोर लंबे समय से उन शिक्षकों की समस्याओं पर रहा है जिन्हें नियमित वेतन और सेवा सुरक्षा के मामले में सरकारी या सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों जैसी स्थिति हासिल नहीं है. विधान परिषद पहुंचने के लिए लाल बिहारी यादव को कई चुनाव लड़ने पड़े. 2007, 2013 और 2017 में कोशिश के बाद 2020 में वह वाराणसी खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से जीतकर विधान परिषद पहुंचे. 2022 में उन्हें विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. बाद में सदन की संख्या बदलने से यह पद समाप्त हुआ. जुलाई 2024 में सपा की संख्या बढ़ने के बाद वह फिर नेता प्रतिपक्ष बने. उनकी यह पृष्ठभूमि चुनाव में काम आई. लाल बिहारी यादव शिक्षक समुदाय के बीच लंबे समय से सक्रिय हैं. उन्हें शिक्षकों की समस्याओं और उनके संगठनों के कामकाज की जानकारी है. ऐसे में मतदाताओं के बीच उनकी पहचान सिर्फ सपा उम्मीदवार की नहीं बल्कि शिक्षक मुद्दों को उठाने वाले नेता की भी है. यही उनकी बड़ी ताकत रही. भाजपा के उम्मीदवार को पार्टी का समर्थन मिला लेकिन लाल बिहारी यादव के पास शिक्षक राजनीति में अपना आधार था. नतीजों में इसका असर दिखाई दिया.
शिक्षक MLC चुनाव में मतदाता आम विधानसभा चुनाव की तरह नहीं होते. यहां स्कूलों और शिक्षा संस्थानों से जुड़े लोग वोट डालते हैं. इसलिए उनकी नौकरी, वेतन, मानदेय, पेंशन और सेवा शर्तों से जुड़े सवाल चुनाव में अहम हो जाते हैं. वित्तविहीन स्कूलों के शिक्षकों के लिए मानदेय और नौकरी की सुरक्षा बड़े मुद्दे हैं. पुरानी पेंशन की बहाली की मांग भी शिक्षक राजनीति में लंबे समय से उठती रही है. लाल बिहारी यादव इन मुद्दों पर सक्रिय रहे हैं. शिक्षक संघ के जरिए उनका शिक्षकों से लगातार संपर्क भी रहा है. इन मुद्दों पर काम करने वाले नेता को चुनाव में फायदा मिल सकता है. लाल बिहारी यादव की जीत को इसी पृष्ठभूमि में समझना चाहिए. उन्होंने शिक्षक समुदाय के बीच लंबे समय से अपनी जगह बनाई है. उनके सामने भाजपा के उम्मीदवार थे जिन्हें पार्टी का समर्थन हासिल था. लेकिन इस चुनाव में शिक्षक मतदाताओं ने किसे पहली पसंद बनाया, इसका जवाब वोटों के आंकड़े साफ देते हैं. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि उम्मीदवार की पहचान, शिक्षक संगठनों से जुड़ाव और स्थानीय संपर्क भी चुनाव में असर डालते हैं.
भाजपा के सामने इस चुनाव में चुनौती केवल उम्मीदवार उतारने की नहीं थी. उसे शिक्षक समुदाय के बीच अपनी पकड़ भी साबित करनी थी. डॉ. प्रमोद मिश्रा पहले भी चुनाव लड़ चुके थे. 2020 में वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लाल बिहारी यादव को कड़ी टक्कर दे चुके थे. इस बार पार्टी के टिकट पर लड़ने के बावजूद उन्हें पिछली बार से कम वोट मिले. यही नतीजे का सबसे बड़ा सवाल है. पार्टी का टिकट मिलने के बाद भी उम्मीदवार अपना पुराना समर्थन क्यों नहीं बचा सके? क्या शिक्षक संगठनों के साथ संपर्क उतना मजबूत नहीं था? क्या चुनावी तैयारी में सपा आगे रही? या उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान शिक्षक मतदाताओं को उतना प्रभावित नहीं कर सकी? सपा ने इस सीट पर अपना उम्मीदवार दोहराया था. लाल बिहारी यादव के पास पिछले चुनाव का अनुभव और शिक्षक समुदाय के बीच पुराना संपर्क था. इस लिहाज से उन्हें अपनी बात मतदाताओं तक पहुंचाने में बढ़त मिली हो सकती है. दूसरी तरफ भाजपा के लिए सिर्फ पार्टी का समर्थन पर्याप्त साबित नहीं हुआ. चेत नारायण सिंह की मौजूदगी ने मुकाबले को और जटिल बनाया लेकिन आंकड़े बताते हैं कि भाजपा की परेशानी उससे आगे थी. पहली वरीयता में ही उसके उम्मीदवार को सपा से करीब पांच हजार वोट कम मिले. पार्टी को अब यह देखना होगा कि शिक्षक मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ कहां कमजोर रही और अगले चुनाव में उसे किस तरह बेहतर तैयारी करनी होगी.
वाराणसी शिक्षक MLC चुनाव में सपा की जीत के बाद इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है. लेकिन दोनों चुनावों की प्रकृति अलग है. शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में पंजीकृत शिक्षक मतदाता वोट डालते हैं. यहां शिक्षा से जुड़े मुद्दे और शिक्षक संगठनों की भूमिका ज्यादा अहम हो सकती है. विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का दायरा बहुत बड़ा होता है. वहां बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण और सरकारी योजनाओं जैसे कई मुद्दे एक साथ असर डालते हैं. इसलिए शिक्षक MLC चुनाव की जीत को पूरे वाराणसी या उत्तर प्रदेश के मतदाताओं की राय नहीं माना जा सकता. फिर भी यह नतीजा भाजपा के लिए समीक्षा का मौका है. शिक्षक समुदाय के बीच पार्टी की रणनीति क्यों नहीं चली.. यह सवाल अहम रहेगा. सपा के लिए भी चुनौती है कि वह शिक्षक समुदाय के मुद्दों पर अपनी सक्रियता बनाए रखे और इस समर्थन को आगे भी कायम रखे.
वाराणसी शिक्षक MLC चुनाव में लाल बिहारी यादव ने 5,015 वोटों से जीत दर्ज की. पहली वरीयता के वोटों में ही उन्होंने बड़ी बढ़त बना ली थी. दूसरी ओर भाजपा के डॉ. प्रमोद मिश्रा को पार्टी के टिकट पर लड़ने के बावजूद पिछली बार से कम वोट मिले. चेत नारायण सिंह को मिले वोटों ने चुनावी गणित को प्रभावित किया हो सकता है, लेकिन भाजपा की हार की पूरी वजह उन्हें नहीं माना जा सकता. लाल बिहारी यादव की शिक्षक राजनीति में पुरानी पहचान, वित्तविहीन शिक्षकों के मुद्दों पर सक्रियता और मतदाताओं के बीच संपर्क उनकी जीत को समझने के अहम पहलू हैं. भाजपा के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि संगठन और पार्टी के समर्थन के बावजूद उसका उम्मीदवार शिक्षक मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ क्यों नहीं बना सका.