बिहार में ₹6000 भी नहीं कमा रहे 44% दलित, लेकिन उनके नेताओं की संपत्ति में हुआ जबरदस्त इजाफा!
आरक्षण पर बहस के बीच दलितों को लुभाने की सियासत शुरू हो चुकी है. बिहार में दलितों के रहनुमा कहलाने वाले नेता चमकते जा रहे हैं, जबकि उनके वोटर यानी दलित समाज के लोगों की हालत में कोई सुधार नजर नहीं आ रहा है.
आरक्षण पर जारी बहस के बीच पटना में आज (मंगलवार, 8 सितंबर) तमाम दलित संगठनों की ओर से 'आरक्षण बढ़ाओ, संविधान बचाओ' मार्च निकालने वाले हैं. इसमें पूरे बिहार से दलित समाज के लोगों के जुटने का दावा किया जा रह है. कांग्रेस नेता अमर आजाद ने इस मार्च का समर्थन करते हुए कहा कि अभी भी देश में दलित आदिवासी समाज पर अत्याचार जाति के आधार पर हो रहा है. उन्होंने कहा कि दलित IAS-IPS कुछ भी बन जाए उन्हें उनकी जाति के नाम से प्रताड़ित किया जाता है. उधर, दूसरी ओर ‘कोटे के अंदर कोटा’ को लेकर प्रदेश के दो दिग्गज दलित नेताओं की जंग भी देश-दुनिया देख चुका है. इन तमाम घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि इस वक्त प्रदेश में दलितों की सियासत चरम पर है. हालांकि, यह भी कड़वा सच है कि दलितों का 'रहनुमा' बनकर सिर्फ अपनी सियासत चमकाई जाती रही है.
बिहार में दलितों की दयनीय स्थिति!
बिहार जाति सर्वेक्षण 2023 में दलितों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई. जातीय सर्वेक्षण के आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि प्रदेश में अनुसूचित जाति (दलित) की आबादी 19.65 फीसदी है. इसमें से 43.93% दलित परिवारों की मासिक आमदनी 6,000 रुपये से भी कम है. इतना ही नहीं 63% दलित आबादी या तो पूरी तरह से बेरोजगार है या फिर उनके पास कोई नियमित काम नहीं है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में 14% से अधिक लोग कच्चे घरों में रहते हैं, जिनमें से लगभग 15% झोपड़ियों में और अन्य 26% टिन-शेड वाले घरों में रहते हैं.
सामाजिक स्थिति भी बेहद खराब
ऑल इंडिया सर्वे ऑफ हायर एजुकेशन (2021-22) के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालयों में दलित छात्रों की संख्या महज 5.7% है, जबकि इस वर्ग के शिक्षकों की बात करे तो यह आंकड़ा सिर्फ 5.6% है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 की रिपोर्ट के अनुसार, दलित समुदाय में शिशु मृत्यु दर 5.5 प्रतिशत है, जबकि मातृ मृत्यु दर 0.13% (130 प्रति लाख) है. वहीं, दलित बच्चों में कुपोषण की दर अन्य समुदायों की तुलना में अधिक है. NACDAOR की रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से 2022 के बीच बिहार में दलितों के खिलाफ 85 हजार 684 अत्याचार के मामले दर्ज किए गए, यानी प्रतिदिन औसतन 17 मामले. इनमें 1202 हत्याएं, 979 बलात्कार, 38 हजार 615 गंभीर चोट के मामले शामिल हैं.
प्रदेश के बड़े दलित नेता
बिहार के सबसे बड़े दलित नेताओं में रामविलास पासवान का नाम आता है. वे कई बार केंद्रीय मंत्री रहे. रामविलास पासवान के साथ-साथ उनके परिवार के कुल 8 सदस्य राजनीति से जुड़े रहे हैं. इनमें भाई पशुपति कुमार पारस, भाई रामचंद्र पासवान, बेटा चिराग पासवान, भतीजा प्रिंस राज पासवान, दामाद अरुण भारती और अनिल कुमार साधु शामिल हैं. रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी पार्टी और परिवार दो हिस्सों में टूट गई. वर्तमान समय में राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी की कमान पशुपति पारस के हाथों में हैं. वहीं लोजपा-रामविलास के अध्यक्ष चिराग पासवान हैं. चिराग ने अपनी पार्टी को काफी आगे बढ़ाया और आज वह 5 सांसदों के साथ केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री हैं. बिहार सरकार में भी उनकी पार्टी की हिस्सेदारी है. इसी तरह से HAM संरक्षक जीतन राम मांझी भी दलितों के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं. जेडीयू से अलग होने के बाद मांझी ने अपनी पार्टी का गठन किया था और आज केंद्र सरकार में मंत्री हैं. उनके बेटे संतोष सुमन बिहार सरकार में मंत्री हैं. बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी और रत्नेश सदा का नाम भी बड़े दलित नेताओं में लिया जाता है. कांग्रेस ने दलित नेता राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है.
दलित नेताओं की स्थित देखिए
- चिराग पासवान- दलितों की आवाज उठाने वाले चिराग पासवान के चुनावी हलफनामों को देखें तो 2019 से 2024 के बीच महज 5 साल में उनकी संपत्ति करीब 45% तक बढ़ गई है. 2019 में चिराग के पास कुल संपत्ति लगभग 1.84 करोड़ रुपये थी. वहीं, 2024 में उनकी संपत्ति बढ़कर लगभग 2.68 करोड़ रुपये थी. हलफनामे के अनुसार, उनके पास 2.68 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति है. इसके साथ ही उन्होंने 6 कंपनियों में लगभग 35.91 लाख रुपये इन्वेस्ट किए हैं. कारों की बात करें, तो उनके नाम पर एक फॉर्च्युनर कार (कीमत करीब 30 लाख रुपये) और एक जिप्सी कीमत करीब 5 लाख रुपये है. उनके पास 14 लाख रुपये की गोल्ड ज्वैलरी है. उनके पास कोई भी इंश्योरेंस पॉलिसी नहीं है और न ही उन्होंने NSS, Postal सेविंग्स में निवेश किया है.
- जीतन राम मांझी- गया जिले के महकार गांव में जन्मे मांझी मुसहर समुदाय से आते हैं. यह सबसे पिछड़े और हाशिए पर पड़े समुदायों में से एक है. शुरुआती दिनों में मांझी अपने पिता की तरह खेतिहर मजदूर थे. 2014 में उनके राजनीतिक करियर ने उड़ान भरी और नीतीश कुमार के इस्तीफा के बाद वह बिहार के 23वें मुख्यमंत्री बनें. नीतीश कुमार से मतभेद होने पर 2015 में उन्होंने HAM पार्टी का गठन किया. आज वह केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में जीतन राम मांझी ने जो हलफनामा दिया था, उसके आधार पर केंद्रीय मंत्री की संपत्ति में गिरावट देखने को मिली. 2015 में उनकी कुल संपत्ति लगभग 62.99 लाख रुपये थी, जबकि 2024 के लोकसभा में उन्होंने अपने पास 30 लाख रुपये की संपत्ति दिखाई थी.
- अशोक चौधरी- नीतीश कुमार के विश्वासपात्र नेताओं में शामिल अशोक चौधरी पिछले कई बार से बिहार सरकार में मंत्री बन रहे हैं. बिहार चुनाव 2025 में अपनी (पत्नी के साथ) कुल संपत्ति 42.68 करोड़ रुपये बताई थी. वर्ष 2009 से 2026 के बीच अशोक चौधरी की संपत्ति में लगभग 526% की कुल बढ़ोतरी दर्ज की गई है. साल 2009 में उनकी संपत्ति करीब 1.23 करोड़ रुपये थी. जन सुराज के संस्थापक और बांकीपुर के विधायक प्रशांत किशोर ने अशोक चौधरी पर पिछले 2 साल में 200 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी संपत्ति जुटाने का आरोप लगाया है.
- रत्नेश सदा- सोनबरसा से जेडीयू विधायक और बिहार सरकार में मंत्री रत्नेश सदा भी नीतीश कुमार के करीबी नेताओं में शामिल हैं. इसी वजह से उन्हें कैबिनेट में शामिल किया जाता है. पिछले 15 वर्षों में उनकी संपत्ति में लगभग 35 गुणा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वर्ष 2010 में उन्होंने अपनी कुल संपत्ति लगभग 9.95 लाख रुपये बताई थी. 2025 के विधानसभा चुनाव तक उनकी कुल संपत्ति बढ़कर लगभग 3.6 करोड़ रुपये हो गई. 2025 के हलफनामे के अनुसार, उन पर लगभग 47.6 लाख रुपये की देनदारी भी है.
- राजेश राम- दलित समाज को आकर्षित करने के लिए कांग्रेस पार्टी ने इस वर्ग से आने वाले राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठा रखा है. वे दो बार के विधायक रहे हैं, लेकिन इस बार 2025 में चुनाव हार गए थे. साल 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने अपने हलफनामे में कुल 1.50 करोड़ रुपये की संपत्ति दिखाई थी. 2025 के हलफनामे में उनकी चल-अचल संपत्ति 6 करोड़ से अधिक पहुंच गई. आज उनके पास जमीन और बैंक बैलेंस के अलावा एक पेट्रोल पंप भी है.