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बिहार में ₹6000 भी नहीं कमा रहे 44% दलित, लेकिन उनके नेताओं की संपत्ति में हुआ जबरदस्त इजाफा!

आरक्षण पर बहस के बीच दलितों को लुभाने की सियासत शुरू हो चुकी है. बिहार में दलितों के रहनुमा कहलाने वाले नेता चमकते जा रहे हैं, जबकि उनके वोटर यानी दलित समाज के लोगों की हालत में कोई सुधार नजर नहीं आ रहा है.

Written By K. Raj Mishra
Published: Sep 08, 2026, 10:36 AM IST | Updated: Sep 08, 2026, 12:29 PM IST
Image Credit: दलितों के नाम पर चमक रहे राजनेता! (Zee Media)
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आरक्षण पर जारी बहस के बीच पटना में आज (मंगलवार, 8 सितंबर) तमाम दलित संगठनों की ओर से 'आरक्षण बढ़ाओ, संविधान बचाओ' मार्च निकालने वाले हैं.  इसमें पूरे बिहार से दलित समाज के लोगों के जुटने का दावा किया जा रह है. कांग्रेस नेता अमर आजाद ने इस मार्च का समर्थन करते हुए कहा कि अभी भी देश में दलित आदिवासी समाज पर अत्याचार जाति के आधार पर हो रहा है. उन्होंने कहा कि दलित IAS-IPS कुछ भी बन जाए उन्हें उनकी जाति के नाम से प्रताड़ित किया जाता है. उधर, दूसरी ओर ‘कोटे के अंदर कोटा’ को लेकर प्रदेश के दो दिग्गज दलित नेताओं की जंग भी देश-दुनिया देख चुका है. इन तमाम घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि इस वक्त प्रदेश में दलितों की सियासत चरम पर है. हालांकि, यह भी कड़वा सच है कि दलितों का 'रहनुमा' बनकर सिर्फ अपनी सियासत चमकाई जाती रही है.

बिहार में दलितों की दयनीय स्थिति!

बिहार जाति सर्वेक्षण 2023 में दलितों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई. जातीय सर्वेक्षण के आंकड़ों से खुलासा हुआ है कि प्रदेश में अनुसूचित जाति (दलित) की आबादी 19.65 फीसदी है. इसमें से 43.93% दलित परिवारों की मासिक आमदनी 6,000 रुपये से भी कम है. इतना ही नहीं 63% दलित आबादी या तो पूरी तरह से बेरोजगार है या फिर उनके पास कोई नियमित काम नहीं है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में 14% से अधिक लोग कच्चे घरों में रहते हैं, जिनमें से लगभग 15% झोपड़ियों में और अन्य 26% टिन-शेड वाले घरों में रहते हैं.

सामाजिक स्थिति भी बेहद खराब

ऑल इंडिया सर्वे ऑफ हायर एजुकेशन (2021-22) के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालयों में दलित छात्रों की संख्या महज 5.7% है, जबकि इस वर्ग के शिक्षकों की बात करे तो यह आंकड़ा सिर्फ 5.6% है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 की रिपोर्ट के अनुसार, दलित समुदाय में शिशु मृत्यु दर 5.5 प्रतिशत है, जबकि मातृ मृत्यु दर 0.13% (130 प्रति लाख) है. वहीं, दलित बच्चों में कुपोषण की दर अन्य समुदायों की तुलना में अधिक है. NACDAOR की रिपोर्ट के अनुसार, 2010 से 2022 के बीच बिहार में दलितों के खिलाफ 85 हजार 684 अत्याचार के मामले दर्ज किए गए, यानी प्रतिदिन औसतन 17 मामले. इनमें 1202 हत्याएं, 979 बलात्कार, 38 हजार 615 गंभीर चोट के मामले शामिल हैं.

प्रदेश के बड़े दलित नेता

बिहार के सबसे बड़े दलित नेताओं में रामविलास पासवान का नाम आता है. वे कई बार केंद्रीय मंत्री रहे. रामविलास पासवान के साथ-साथ उनके परिवार के कुल 8 सदस्य राजनीति से जुड़े रहे हैं. इनमें भाई पशुपति कुमार पारस, भाई रामचंद्र पासवान, बेटा चिराग पासवान, भतीजा प्रिंस राज पासवान, दामाद अरुण भारती और अनिल कुमार साधु शामिल हैं. रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी पार्टी और परिवार दो हिस्सों में टूट गई. वर्तमान समय में  राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी की कमान पशुपति पारस के हाथों में हैं. वहीं लोजपा-रामविलास के अध्यक्ष चिराग पासवान हैं. चिराग ने अपनी पार्टी को काफी आगे बढ़ाया और आज वह 5 सांसदों के साथ केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री हैं. बिहार सरकार में भी उनकी पार्टी की हिस्सेदारी है. इसी तरह से HAM संरक्षक जीतन राम मांझी भी दलितों के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं. जेडीयू से अलग होने के बाद मांझी ने अपनी पार्टी का गठन किया था और आज केंद्र सरकार में मंत्री हैं. उनके बेटे संतोष सुमन बिहार सरकार में मंत्री हैं. बिहार सरकार में मंत्री अशोक चौधरी और रत्नेश सदा का नाम भी बड़े दलित नेताओं में लिया जाता है. कांग्रेस ने दलित नेता राजेश राम को प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है.

दलित नेताओं की स्थित देखिए

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About the Author

कर्मराज मिश्रा ज़ी न्यूज (डिजिटल) टीम में बतौर चीफ सब एडिटर कार्यरत हैं. वे यहां देश-विदेश की राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं. कानपुर यूनीवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर की डिग्री हासिल करके IBN-7 न्यूज चैनल से इंटर्नशिप की. इसके बाद खबर फास्ट, नेशन लाइव और साधना न्यूज न्यूज चैनलों में काम करने के बाद डिजिटल का रुख किया और 2017 से 2020 तक हिंदुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी में बतौर सीनियर सब एडिटर काम किया. इसके बाद News Nation, India Ahead के बाद वर्तमान में Z Media का हिस्सा हैं. मीडिया में 10 साल के कार्यकाल के दौरान यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़ और दिल्ली विधानसभा चुनावों के अलावा 2019 और 2024 का लोकसभा चुनाव कवर किया है.
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