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लोकतंत्र के असली प्रहरी थे भागलपुर के 'धरतीपकड़'! इंदिरा-राजीव से लेकर बाजपेयी-आडवाणी के खिलाफ लड़ चुके थे चुनाव

भागलपुर के लोगों के बीच 'धरती पकड़' केवल चुनावी उम्मीदवार नहीं, बल्कि समाजसेवा और जनजागरण का प्रतीक माने जाते थे. वे अपने जीवन में 284 चुनाव लड़े थे, लेकिन एक भी चुनाव नहीं जीते.

Written By K. Raj Mishra
Published: Sep 04, 2026, 08:58 AM IST | Updated: Sep 04, 2026, 09:27 AM IST
Image Credit: भागलपुर के 'धरतीपकड़' का निधन (फाइल फोटो)
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भागलपुर के चर्चित समाजसेवी और ‘धरती पकड़’ के नाम से मशहूर नागरमल बाजोरिया का गुरुवार (3 सितंबर) को निधन हो गया. 96 वर्ष की आयु में उन्होंने राजधानी पटना में अंतिम सांस ली. उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर वे वृद्धावस्था संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे. उनके निधन की खबर से भागलपुर में में शोक की लहर दौड़ गई. आज यानी शुक्रवार (4 सितंबर) को बरारी स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार संपन्न होगा. बता दें कि 'धरती पकड़' को चुनाव लड़ने का काफी शौक था और वे अपने जीवन में पंचायत से लेकर राष्ट्रपति पद तक के लिए करीब 284 चुनाव लड़ चुके थे. जानकारी के मुताबिक, उन्होंने राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के चुनाव में भी 17 बार किस्मत आजमाई. हालांकि, उन्हें किसी भी चुनाव में जीत नहीं मिली.

'गधा' चुनाव चिन्ह था अनोखी पहचान

नागरमल बाजोरिया उर्फ 'धरती पकड़' की सबसे अनोखी पहचान उनका गधा चुनाव चिन्ह था. वह जब भी चुनाव लड़ते, प्रचार और नामांकन के दौरान अपने साथ एक गधा जरूर रखते थे. गधा ही उनके चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा आकर्षण बन जाता था. धीरे-धीरे उनका यह अंदाज इतना मशहूर हुआ कि लोग उन्हें उनके नाम से ज्यादा ‘धरतीपकड़’ के नाम से पहचानने लगे. जानकारी के मुताबिक, साल 2014 के बाद अस्वस्थ रहने के कारण उन्होंने सक्रिय रूप से चुनाव लड़ना बंद कर दिया था, लेकिन गरीबों की सेवा करने में कोई समझौता नहीं किया. चुनावी राजनीति से दूर होने के बाद भी उन्होंने गरीब बेटियों की शादी कराना, जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना और असहाय परिवारों की मदद करने में कोई समझौता नहीं किया.

कंधे पर बड़ा सा झोला था उनकी पहचान

जानकारी के अनुसार, नागरमल बाजोरिया का जन्म पाकिस्तान के लाहौर में हुआ था, लेकिन बंटवारे से पहले ही उनका परिवार भागलपुर आकर बस गया था. 'धरती पकड़' को जानने वाले लोग बताते हैं कि उनके कंधे पर हमेशा एक बड़ा सा झोला रहता था, जिसमें वह जरूरतमंद युवक-युवतियों के बायोडाटा रखे रहते थे. अगर रास्ते में कोई उनसे बेटी या बेटे की शादी की बात कह देता तो वे तुरंत झोले से बायोडाटा निकालकर रिश्ता जोड़ने की कोशिश शुरू कर देते थे.

चुनाव हारे, लेकिन हार नहीं मानी

उन्होंने अपने जीवन में करीब 284 चुनाव लड़े, लेकिन कभी जीत हासिल नहीं कर सके. चुनाव हार के बाद भी वह निराश नहीं होते थे. वह कहते थे कि मैं चुनाव नहीं हारता, जनता हार जाती है. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कई दिग्गज नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ा. इनमें इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, संजय गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे नाम शामिल हैं. उनके निधन से भागलपुर ने एक ऐसे शख्स को खो दिया, जिसने लोकतंत्र को केवल वोट की राजनीति नहीं, बल्कि जनजागरण का माध्यम माना.

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About the Author

कर्मराज मिश्रा ज़ी न्यूज (डिजिटल) टीम में बतौर चीफ सब एडिटर कार्यरत हैं. वे यहां देश-विदेश की राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं. कानपुर यूनीवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर की डिग्री हासिल करके IBN-7 न्यूज चैनल से इंटर्नशिप की. इसके बाद खबर फास्ट, नेशन लाइव और साधना न्यूज न्यूज चैनलों में काम करने के बाद डिजिटल का रुख किया और 2017 से 2020 तक हिंदुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी में बतौर सीनियर सब एडिटर काम किया. इसके बाद News Nation, India Ahead के बाद वर्तमान में Z Media का हिस्सा हैं. मीडिया में 10 साल के कार्यकाल के दौरान यूपी, बिहार, छत्तीसगढ़ और दिल्ली विधानसभा चुनावों के अलावा 2019 और 2024 का लोकसभा चुनाव कवर किया है.
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