जो चाहते थे ट्रंप, कोर्ट ने वही कर दिया: क्या है 'थर्ड-कंट्री डिपोर्टेशन' नीति, जिसे मिली 'सुप्रीम' इजाजत; इन लोगों की बढ़ेंगी मुश्किलें
अमेरिकी ट्रंप प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट से 'थर्ड-कंट्री डिपोर्टेशन' नीति के लिए हरी झंडी मिल गई है. यानी इस नीति के तहत अमेरिका से निर्वासित किए जाने वाले दूसरे देशों के नागरिकों को उनके मूल देश के बजाए किसी तीसरे देश में भेजा जा सकता है.
अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट से ट्रंप प्रशासन को बड़ी राहत मिली है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जो चाहते थे, आखिर सुप्रीम कोर्ट ने उसी संबंध में फैसला दे दिया है. अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को प्रवासियों को उनके मूल देश के बजाय किसी तीसरे देश में डिपोर्ट यानी निर्वासित करने की प्रक्रिया फिर से शुरू करने की इजाजत दे दी है.
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट अभी इस बात पर विचार कर रही है कि सरकार की यह 'थर्ड-कंट्री रिमूवल' नीति कानूनी रूप से सही है या नहीं. माना जा रहा है कि ट्रंप प्रशासन की इस नीति से प्रवासियों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. इस नीति के तहत डिपोर्ट किए जाने वाले प्रवासियों को यह मौका नहीं दिया जाता है कि उन्हें पता चले कि उनको कहां भेजा जा रहा है.
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा निचली अदालत का फैसला
गौर करने वाली बात है कि इसी साल फरवरी के महीने में मैसाचुसेट्स के एक फेडरल जज ने ट्रंप प्रशासन के 'थर्ड-कंट्री रिमूवल' नीति पर रोक लगा दी थी. जज ने माना था कि किसी भी प्रवासी को किसी दूसरे देश में डिपोर्ट करने से पहले उन्हें सही जानकारी देनी चाहिए. इसके अलावा यह भी पता होना चाहिए कि क्या तीसरे देश में उन्हें किसी उत्पीड़न या प्रताड़ना का डर तो नहीं है. हालांकि, अब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले पर रोक लगा दी है.
दिसंबर में होगी सुनवाई
गौर करने वाली बात है कि सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश आखिरी फैसला नहीं है कि प्रशासन की यह नीति कानूनी है या नहीं. इसी साल दिसंबर में सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर विस्तार से दलीलें सुनेगा, जिसके बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा. वर्तमान की सुनवाई के दौरान तीन जजों ने सरकार की इस मांग को खारिज करने का पक्ष लिया था. इसमें जस्टिस सोनिया सोटोमायर, एलेना कगन और केतनजी ब्राउन जैक्सन शामिल थे. हालांकि, बहुमत वाले जजों ने सरकार को इजाजत दे दी.
जानिए ट्रंप प्रशासन की 'थर्ड-कंट्री रिमूवल'
अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी विभाग (DHS) की नीति के अंतर्गत अगर किसी प्रवासी को अमेरिका से बाहर निकालने का अंतिम आदेश जारी किया गया हो, तो उसे उस देश भी भेजा जा सकता है, जहां का वह मूल नागरिक नहीं है. शर्त यह है कि वह देश उसे स्वीकार करने को तैयार हो. सामान्य तौर पर डीएचएस नोटिस देने के करीब 24 घंटे तक इंतजार करता है, जिससे प्रवासी बता सके कि उसके कहीं और जाने में किस प्रकार कि परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. इसके बाद इमिग्रेशन अधिकारी की ओर से तय किया जाता है कि व्यक्ति को डिपोर्ट करना है या नहीं.
सरकार ने क्या रखी दलील
अमेरिकी प्रशासन ने इस नीति को लेकर अपनी दलील रखी और कहा कि देश से खतरनाक अपराधियों को निकालना जरूरी है. अमेरिकी न्याय विभाग ने कहा कि निचली अदालत की रोक के कारण उन्हें 70 अपराधी प्रवासियों वाली एक फ्लाइट रद्द करनी पड़ी थी. यह उड़ान तीन अलग-अलग देशों में जाने वाली थी. इससे अतिरिक्त खर्च भी हुआ और कूटनीतिक बातचीत फिर से शुरू करनी पड़ी.
प्रवासियों को सता रही इस बात की चिंता
जहां एक ओर ट्रंप प्रशासन अपनी नीति को अमेरिका के लिए सही ठहरा रहा है, तो दूसरी ओर प्रवासियों के वकीलों ने इस नीति को खतरनाक करार दिया है. प्रवासियों के वकीलों का कहना है कि यह नीति लोगों को अपनी बात साबित करने का मौका दिए बिना अनजान देशों में भेज सकती है.
प्रवासियों के वकीलों ने एक अनुमान का हवाला दिया और कहा कि डीएचएस ने 2025 और 2026 के दौरान 28 से ज्यादा तीसरे देशों में 25,000 से अधिक लोगों को डिपोर्ट किया गया. याचिका में कहा गया कि डिपोर्ट किए लोगों को लंबी कैद, मारपीट, यौन उत्पीड़न और गायब होने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ा.
ऐसे लोगों पर लागू होगा यह नियम
यह फैसला केवल उन प्रवासियों से जुड़ा है, जिनके खिलाफ देश छोड़ने का अंतिम आदेश जारी किया जा चुका है. इसका सीधा मतलब है कि अगर आप वैध स्थायी निवासी, छात्र, वर्कर या किसी अन्य वैध वीजा पर अमेरिका में निवास कर रहे हैं, तो आपको किसी रिमूवल प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा. इन परिस्थितियों में कोर्ट के आदेश का भी असर नहीं होगा. (इनपुट- आईएएनएस)
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