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मिडटर्म चुनाव से ठीक पहले ईरान पर अमेरिका की बमबारी, चुनाव के बीच टकर कार्लसन के इस बड़े दावे से दुनिया में दहशत

अमेरिका में मिडटर्म चुनावों के बीच यूएस मिलिट्री ने मंगलवार को ईरान के केश्म द्वीप पर कई हमले किए. इस द्वीप के नीचे बनी टनल सिटी में ईरान की हथियारबंद तेज नावें और मिसाइल भंडार होने का अंदेशा जताया जाता है.

Edited By Devinder Kumar
Published: Nov 03, 2026, 11:44 PM IST | Updated: Nov 03, 2026, 11:49 PM IST
Image Credit: राष्ट्रपति ट्रंप ने मिडटर्म चुनाव के बीच ईरान पर हमला क्यों किया?
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ट्रंप बार बार मिडटर्म से पहले ईरान पर हमला नहीं करने का दावा कर रहे थे लेकिन बीती रात ईरान के केश्म द्वीप पर एक के बाद एक 5 बड़े धमाके सुनाई दिए. अमेरिकी वायुसेना के फाइटर जेट्स ने इन हमलों को अंजाम दिया. अमेरिका की वायुसेना ने इस हमले में ईरान के जमीन से हवा में मार करने वाले मिसाइल लॉन्चर को नष्ट किया. इसके अलावा केश्म के रडार और एयर डिफेंस साइट्स को भी निशाना बनाया.

अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि ईरान ने अमेरिकी विमान पर मिसाइलें दागी थीं, जिसके जवाब में यह स्ट्राइक की गई. अमेरिका ने इस हमले का मकसद ईरान की उस ताकत को खत्म करना बताया है. जिससे ईरान होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों को निशाना बनाता है
ईरान का केश्म, फारस की खाड़ी का सबसे बड़ा द्वीप है. यह होर्मुज स्ट्रेट के मुहाने पर स्थित है और यहीं से ईरान होर्मुज को कंट्रोल करता है.

केश्म द्वीप के नीचे सुरंगों और नमक की गुफाओं का बड़ा नेटवर्क है. यहां ईरान ने अंडरग्राउंड मिसाइल सिस्टम और तेज हमला करने वाली बोट्स छिपा रखी हैं. द्वीप के अंदर ईरान ने ऐसे सैन्य ठिकाने बनाए हैं, जिनका मकसद समुद्री रास्तों पर नियंत्रण रखना है. ईरान इसी द्वीप से होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों पर हमले और उनकी आवाजाही रोकने का काम करता है.

ईरान ने भी अमेरिका को दिया जवाब

अमेरिका ने फिलहाल इस हमले को अपनी सीक्रेट स्ट्राइक्स का हिस्सा बताया है. जिसे इसलिए जानबूझकर सार्वजनिक नहीं किया जाता ताकि बड़े युद्ध का सिग्नल न जाए. हालां​कि चुनाव से पहले अमेरिकी सेना ने इस हमले को सार्वजनिक कर दिया. हम आपको इसकी वजह भी बताएंगे, लेकिन इससे पहले आपको ईरान के पलटवार के बारे में भी जानना चाहिए.

ईरान की IRGC ने दावा किया कि इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के जरिए उसने अमेरिका के दो MQM-170 ड्रोन्स को कब्जे में लिया है. इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में दुश्मन के ड्रोन, रडार और संचार प्रणालियों को रेडियो सिग्नल और इलेक्ट्रॉनिक तकनीक के जरिए जाम किया जाता है. जब ड्रोन और उसके ऑपरेटर के बीच संपर्क बाधित हो जाता है. तो ड्रोन को उतारकर या गिराकर अपने कब्जे में कर लिया जाता है. इसके अलावा ईरान ने अमेरिका के एक MQ9 रीपर ड्रोन मार गिराने का दावा भी किया है. यानी ईरान भी पलटवार के लिए तैयार था. हालांकि दुनिया इन हमलों से हैरान है.

ईरान के केश्म द्वीप पर अमेरिकी हमला इसलिए दुनिया को हैरान करने वाला है. सिर्फ एक दिन पहले ट्रंप ने कहा था कि वो ईरान पर हमला नहीं करेंगे. ईरान के सुप्रीम कमांडर मोजतबा खामेनेई ने भी अमेरिका से कूटनीति के​ जरिए विवाद खत्म करने के संकेत दिए थे. मोजतबा खामेनेई ने अमेरिका से कूटनीतिक वार्ता के लिए राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियन को विशेष अधिकार दिया है, जो IRGC से जुड़े कट्टर नेताओं की अपेक्षा सुधारवादी माने जाते हैं. आपको ईरान के सुप्रीम लीडर के इस कदम का मतलब भी समझना चाहिए.

ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में सर्वोच्च नेता के पास देश के लिए अंतिम और रणनीतिक फैसले लेने की सर्वोच्च शक्ति होती है. विदेश नीति और अमेरिका के साथ संबंधों पर अब तक कट्टरपंथी धड़े का कड़ा नियंत्रण रहा है. लेकिन अब मोजतबा खामेनेई ने राष्ट्रपति पेजेश्कियन को वार्ता करने की खुली छूट दी है. जिसका मतलब है, ईरान अड़ियल रुख छोड़कर कूटनीति से विवाद को खत्म करना चाहता है.

अमेरिकी नाकाबंदी से दबाव महसूस कर रहा ईरान

ये इस बात का भी संकेत है कि अमेरिका के हमले और समुद्री नाकेबंदी से ईरान अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव महसूस कर रहा है. इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के आक्रामक रुख से ईरान को लग रहा है कि अगर कूटनीतिक समाधान नहीं निकला तो उसे लंबे समय तक युद्ध लड़ना पड़ेगा. इसमें उसका नुकसान ज्यादा होने की आशंका है.

अमेरिका को इस मौके का इस्तेमाल शांति के लिए करना चाहिए था. सिर्फ एक दिन पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने भी ईरान पर हमला नहीं करने की बात कही थी और समझौते के संकेत भी दिए थे.

ट्रंप ने कहा था कि ईरान से समझौता हो सकता है. लेकिन इस बयान के कुछ घंटे बाद ही ईरान पर हमला हो गया. ट्रंप के बारे में मशहूर है कि वो कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं. इसलिए उनके अगले कदम के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है. अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन से ठीक पहले ईरान पर हमला भी इस बात का एक उदाहरण है. आज आपको इस हमले में छिपी ट्रंप की चुनावी रणनीति भी समझनी चाहिए.

चुनाव के बाद ईरान पर हो सकता है अमेरिकी हमला

जब अमेरिका ने हमले किए, उस वक्त अमेरिका में मिडटर्म इलेक्शन के लिए वोटिंग चल रही थी. वोटिंग के लिए लंबी-लंबी कतारें लगी हैं. ट्रंप को डर था कि युद्ध की वजह से बढ़ी महंगाई का गुस्सा लोग उन पर उतार सकते हैं. इसके बावजूद अमेरिका ने ईरान पर हमला किया. इसकी वजह ये है कि एक तबका ऐसा भी है, जो ईरान को खतरा मानता है और ईरान पर हमले का समर्थक है. ट्रंप, ईरान पर बड़े हमले का ट्रेलर दिखाकर चुनाव से पहले अपने इन्हीं पक्के वोटर्स में जोश भरना चाहते थे.

ये भी पढ़ें- 70 साल बाद सामूहिक कब्रें खोद रही अमरीकी सेना: 24 घंटे में 2400 लाशें दफनाने का अभ्यास, आखिर क्या चल रहा ट्रंप के मन में? 

अमेरिका में किसी वक्त ट्रंप के बड़े समर्थक रहे एक्सपर्ट टकर कार्लसन ने दावा किया है कि यूएस प्रेसिडेंट मिडटर्म के बाद ईरान पर परमाणु हमले का फैसला कर सकते हैं. कार्लसन का दावा ट्रंप प्रशासन के अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी पर आधारित है, जिसके मुताबिक इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के दबाव में ट्रंप प्रशासन कुछ दिनों के अंदर ईरान पर परमाणु हमला कर सकता है.
इस धमाके का लक्ष्य मध्य ईरान में नतांज के पास स्थित पिकैक्स माउंटेन होगा.

इजरायली खुफिया जानकारी के मुताबिक ईरान ने पिकैक्स में फिर से यूरेनियम संवर्धन शुरू कर दिया है. ईरान ये परमाणु केंद्र पहाड़ों के बीच ग्रेनाइट चट्टानों की गुफाओं में बनाया है और कोई भी पारंपरिक अमेरिकी हथियार 300 फीट मोटी ठोस ग्रेनाइट चट्टान को भेद नहीं सकता. इसलिए इसे नष्ट करने का एकमात्र सैन्य विकल्प परमाणु हमला है. नेतन्याहू रोज ट्रंप को फोन करके इसके लिए दबाव डाल रहे हैं. टकर कार्लसन के मुता​बिक ट्रंप 7 नवंबर के आसपास इससे जुड़ा फैसला ले सकते हैं.
 

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अनुभवी पत्रकार और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. अमर उजाला और नवभारत टाइम्स जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में काम करने के बाद, वर्तमान में वे Zee News में कार्यरत हैं. देश-दुनिया और ब्रेकिंग न्यूज पर नजर रखते हैं. अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, वैश्विक घटनाक्रमों और खोजपरक पत्रकारिता में विशेष पकड़ है.
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