App

क्या है UN हेडक्वार्टर एग्रीमेंट? जिसके कारण अमेरिका अपने दुश्मन को भी देश में आने से नहीं रोक सकता...

1947 के UN समझौते की वजह से अमेरिका चाहकर भी संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में आने वाले विदेशी नेताओं को अपनी धरती पर कदम रखने से सीधे नहीं रोक सकता. इसी मजबूरी के चलते उसे ईरान जैसे अपने कट्टर दुश्मन देशों के नेताओं को भी न्यूयॉर्क आने का वीजा देना ही पड़ता है. आइए डिटेल से जान लेते हैं...

क्या है UN हेडक्वार्टर एग्रीमेंट? जिसके कारण अमेरिका अपने दुश्मन को भी देश में आने से नहीं रोक सकता...
Image Credit: UN HEADQUARTERS AGREEMENT

अमेरिका और ईरान के बीच की दुश्मनी किसी से छिपी नहीं है. दोनों देशों के रिश्ते दशकों से बेहद तल्ख रहे हैं. इन दिनों दोनों के बीच संघर्ष चल रहा है. इसके बावजूद जब भी संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की बैठक होती है, ईरान के विदेश मंत्री और उनका पूरा प्रतिनिधिमंडल बिना कोई रोक-टोक के न्यूयॉर्क की धरती पर कदम रखता है. इस बार भी ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची UNGA में शामिल होने अमेरिका पहुंचे हैं, जहां उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर से मुलाकात भी की है. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जिस देश को अमेरिका फूटी आंख नहीं सुहाता, उसी देश के नेताओं को वह अपने ही घर में आने का वीजा और रास्ता देने के लिए आखिर क्यों मजबूर हो जाता है?

इस सवाल का जवाब छिपा है साल 1947 में हुए एक ऐतिहासिक समझौते में, जिसे 'UN हेडक्वार्टर एग्रीमेंट' (UNHQ Agreement) के नाम से जाना जाता है. आइए कुछ आसान सवाल और जवाब के जरिए इसे विस्तार से समझ लेते हैं...

सवाल 1: UN हेडक्वार्टर एग्रीमेंट क्या है और इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

जवाब: दूसरे विश्व युद्ध के बाद 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र (UN) बना, तो यूरोप युद्ध से तबाह हो चुका था. पहले की वैश्विक संस्था 'लीग ऑफ नेशंस' का मुख्यालय स्विट्जरलैंड के जिनेवा में था, जो दूसरे विश्व युद्ध को रोकने में नाकाम रही थी. इसलिए दुनिया उस समय तबाह यूरोप से बाहर एक सुरक्षित और निष्पक्ष ठिकाना चाहती थी.

दिसंबर 1945 में अमेरिकी कांग्रेस ने संयुक्त राष्ट्र को अमेरिका में मुख्यालय बनाने का औपचारिक न्योता दिया, जिसे यूएन ने स्वीकार कर लिया. दिसंबर 1946 में उद्योगपति जॉन डी. रॉकफेलर जूनियर ने 85 लाख डॉलर दान किए, जिससे न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में जमीन खरीदी गई. इसके बाद न्यूयॉर्क को यूएन के स्थायी मुख्यालय के रूप में चुन लिया गया.

मुख्यालय अमेरिकी जमीन पर तय होते ही कूटनीति के सामने 3 बड़ी चुनौतियां आ गईं

1. कानून और अधिकार का टकराव: यूएन परिसर को 'अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र' बनाया गया था, जहां अमेरिकी पुलिस या स्थानीय कानून सीधे लागू नहीं हो सकते थे. इसके लिए दोनों के अधिकारों की सीमा तय करना जरूरी था.

2. राजनयिकों की सुरक्षा और निष्पक्षता: शीत युद्ध का दौर था. अगर लिखित समझौता न होता, तो अमेरिका अपने विरोधी या दुश्मन देशों के प्रतिनिधियों का वीजा रोक सकता था, जिससे यूएन का निष्पक्ष काम ठप हो जाता.

3. बेरोकटोक आने-जाने की छूट: यूएन बिना किसी अड़चन के काम कर सके, इसके लिए जरूरी था कि सभी देशों के प्रतिनिधि और अधिकारी बिना किसी अमेरिकी रोक-टोक के आ-जा सकें.

इन नियमों को तय करने के लिए यूएन महासचिव ट्रिग्वे ली और अमेरिकी विदेश मंत्री जॉर्ज सी. मार्शल के बीच लंबी बातचीत हुई. आखिरकार 26 जून 1947 को 'UN हेडक्वार्टर एग्रीमेंट' पर दस्तखत किए गए. अमेरिकी संसद और यूएन महासभा की मंजूरी के बाद 21 नवंबर 1947 को यह पूरी तरह लागू हो गया.

इस समझौते का सीधा नियम यह था कि एक मेजबान (होस्ट कंट्री) के तौर पर अमेरिका यूएन के कामकाज में दखल नहीं देगा और सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को मुख्यालय तक पहुंचने की पूरी छूट देगा.

सवाल 2: क्या कहते हैं इस समझौते के सेक्शन 11, 12 और 13?

जवाब: 1947 के 'UN हेडक्वार्टर एग्रीमेंट' के आर्टिकल IV में दिए गए सेक्शन 11, 12 और 13 ही वे कानूनी प्रावधान हैं, जो सदस्य देशों के प्रतिनिधियों को न्यूयॉर्क आने की गारंटी देते हैं:

सेक्शन 11 (रास्ते में कोई नहीं रोकेगा): अमेरिका की पुलिस या सरकार यूएन आने वाले किसी भी देश के प्रतिनिधि, अधिकारी या उनके परिवार को रोक नहीं सकती. उनके आने-जाने का रास्ता हमेशा खुला रहेगा.

सेक्शन 12 (दोस्ती हो या दुश्मनी, फर्क नहीं पड़ेगा): अमेरिका और उस देश के रिश्ते चाहे जितने भी खराब हों, बातचीत बंद हो या युद्ध जैसे हालात हों, अमेरिका उस देश के नेता को यूएन आने से मना नहीं कर सकता. निजी रंजिश यूएन के काम के बीच नहीं आएगी.

सेक्शन 13 (मुफ्त और बिना देरी मिलेगा वीजा): अमेरिका अपने घरेलू वीजा नियमों का बहाना बनाकर किसी को नहीं अटका सकता. यूएन की बैठक में शामिल होने वालों को बिना किसी फीस के और बिना देर किए तुरंत वीजा देना होगा.

सवाल 3: तो क्या अमेरिका पूरी तरह बेबस है? उसके सुरक्षा अधिकार क्या हैं?

जवाब: नहीं, अमेरिका पूरी तरह बेबस नहीं है. जब अमेरिकी संसद ने इस समझौते को कानून के रूप में मंजूरी दी थी, तो उसने इसमें एक खास शर्त जोड़ी थी, जिसे 'सेक्शन 6' कहा जाता है. इसके तहत अमेरिका ने साफ कर दिया कि उसकी अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे ऊपर रहेगी.सामान्य तौर पर खराब रिश्तों के आधार पर अमेरिका किसी को नहीं रोक सकता, लेकिन वह इन अधिकारों और चोर रास्तों का इस्तेमाल करता है:

1. सीधा सुरक्षा खतरा या आतंकवाद: जब किसी व्यक्ति पर आतंकी संगठन, गंभीर हिंसा, युद्ध अपराध या जासूसी में शामिल होने का शक या आरोप हो, तो अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर वीजा देने से साफ मना कर देता है. जैसे 1988 में उसने फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात को वीजा नहीं दिया था, जिसके बाद यूएन को अपनी बैठक जिनेवा में बुलानी पड़ी थी.

2. वीजा लटकाने का खेल: अमेरिका कई बार सीधे 'ना' नहीं बोलता, बल्कि वीजा देने में इतनी देर कर देता है कि कार्यक्रम की तारीख ही निकल जाए. रूस और ईरान के अधिकारियों के साथ वह अक्सर यही पैंतरा अपनाता है. यूक्रेन युद्ध के बाद सितंबर 2022 में यूएन महासभा के दौरान अमेरिका ने रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और उनकी टीम की फाइल दबा ली थी. हालांकि, भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते अंत में लावरोव को वीजा जारी करना पड़ा.

3. देश से बाहर निकालने का अधिकार: अगर कोई राजनयिक यूएन की आड़ में जासूसी या किसी गैर-कानूनी काम में पकड़ा जाए, तो अमेरिका उसे तुरंत देश छोड़ने का फरमान सुना सकता है.

4. आवाजाही पर पहरा लगाने का अधिकार: वीजा पूरी तरह न रोक पाने पर अमेरिका विदेशी नेताओं के घूमने-फिरने पर कड़ा दायरा तय कर देता है.

सवाल 4: इस बार ईरानी डेलिगेशन पर क्या पाबंदियां हैं और क्यों?

जवाब: पूरी तरह वीजा रद्द करने पर होने वाले कूटनीतिक विवाद से बचने के लिए अमेरिका ने 'मूवमेंट पर पहरे' का यही पैंतरा ईरान के मामले में अपनाया है. अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में आए ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और उनके पूरे प्रतिनिधिमंडल को बेहद सीमित दायरे में बांध रखा है.

1. तय दायरा (रेडियस लिमिट): ईरानी राजनयिकों को न्यूयॉर्क के मैनहट्टन में केवल संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के आसपास कुछ ही ब्लॉक (यूएन हेडक्वार्टर, ईरानी यूएन मिशन और उनके राजनयिक आवास) के बीच जाने की छूट है.

2. हवाई अड्डे का तय रूट: वे सिर्फ जॉन एफ. कैनेडी (JFK) एयरपोर्ट से मैनहट्टन स्थित अपने मिशन तक सीधे आ-जा सकते हैं. रास्ते में कहीं रुकने या रूट बदलने की इजाजत नहीं होती.

3. शहर घूमने पर रोक: ईरानी प्रतिनिधिमंडल न्यूयॉर्क शहर के आम बाजारों, पर्यटन स्थलों या तय सीमा से बाहर नहीं जा सकता.

4. विशेष अनुमति जरूरी: अगर उन्हें तय दायरे से बाहर कहीं भी जाना हो, तो उसके लिए पहले अमेरिकी विदेश विभाग (State Department) से विशेष छूट (Waiver) के लिए लिखित इजाजत लेनी पड़ती है.

सवाल 5: अमेरिका और UN में विवाद होने पर फैसला कैसे होता है? क्या पहले ऐसा हुआ है?

जवाब: 1947 के समझौते के सेक्शन 21 में इसका सीधा फॉर्मूला तय है. अगर दोनों के बीच किसी बात पर ठन जाए, तो मामला 3 सदस्यों वाले मध्यस्थता पैनल (Arbitration Tribunal) में जाता है:

एक सदस्य को यूएन महासचिव चुनते हैं.

एक सदस्य को अमेरिकी विदेश मंत्री चुनते हैं.

तीसरे सदस्य (अध्यक्ष) को दोनों मिलकर तय करते हैं. सहमति न बनने पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के चीफ इसे चुनते हैं.

कानूनी पेच फंसने पर हेग स्थित ICJ से कानूनी सलाह (Advisory Opinion) भी ली जा सकती है.

सवाल: क्या पहले कभी ऐसा टकराव हुआ है?

जवाब: हां, पहले ऐसा हुआ है. सबसे चर्चित मामला 1987-1988 का PLO (फिलिस्तीन मुक्ति संगठन) विवाद था.

विवाद क्या था? अमेरिका ने कानून बनाकर पीएलओ को आतंकी संगठन घोषित कर दिया और न्यूयॉर्क में चल रहे उसके यूएन मिशन दफ्तर पर ताला लगाने का आदेश दे दिया. यूएन ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि मुख्यालय समझौते के तहत अमेरिका ऐसा नहीं कर सकता.

अदालत का दखल: मामला हेग की अंतरराष्ट्रीय अदालत (ICJ) और न्यूयॉर्क की एक अमेरिकी अदालत दोनों जगह पहुंचा था. दोनों ही अदालतों ने साफ कह दिया कि अंतरराष्ट्रीय समझौता अमेरिका के घरेलू कानून से ऊपर है, इसलिए वह मिशन बंद नहीं करा सकता. नतीजा यह हुआ कि अमेरिका को पीछे हटना पड़ा और पीएलओ का दफ्तर खुला रहा. यह साबित करता है कि यूएन के मामलों में अमेरिका भी अपनी मनमर्जी नहीं चला सकता.

Add Zee News as a Preferred Source
TAGS:

About the Author

Bhoopendra Rai

Bhoopendra Rai

पत्रकारिता में 9 साल से सक्रिय भूपेंद्र कुमार राय Zee News में सीनियर सब एडिटर के तौर पर न्यूज टीम का हिस्सा हैं, देश विदेशी की खबरें कवर करते हैं. 2017 में ETV Bharat (हैदराबाद) से करियर की शुरुआत करने के बाद वे 2020 में Zee News पहुंचे, जहां 2022 तक काम किया. 2023 में News24 की स्पोर्ट्स टीम को लीड करने का मौका मिला. इसके बाद India Daily Live में बतौर चीफ सब एडिटर स्पोर्ट्स टीम के साथ जुड़े. 2024 में दोबारा News24 लौटे और नई स्पोर्ट्स वेबसाइट लॉन्चिंग का अहम हिस्सा रहे. अक्टूबर 2025 में News24 से अलविदा लेकर एक बार फिर Zee News पहुंचे हैं. खेलों में गहरी रुचि रखते हैं और क्रिकेट वर्ल्ड कप, एशियन गेम्स, ओलंपिक गेम्स, हॉकी वर्ल्ड कप समेत बड़े खेल इवेंट को कवर करने का अनुभव है. ब्रेकिंग न्यूज, क्रिकेट एनालिसिस और किस्से-कहानियों पर अच्छी पकड़ है. जी न्यूज में खेल से जुड़ी खबरों के बाद अब न्यूज टीम के साथ रियलटाइम न्यूज पर काम कर रहे हैं. एक्सप्लेनर और किसी भी मुद्दे पर रिसर्च के साथ उसे आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचा रहे हैं. आप Bhoopendra.Rai@zeemedia.com पर सीधे ईमेल या फिर नीचे X और Facebook से जुड़ सकते हैं.
Read More