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US-सऊदी डील पर 'महाभारत': 'प्रेसिडेंट ट्रंप ये ठीक नहीं...' परमाणु समझौते पर विपक्षी सांसदों ने लगाया रोड़ा! वाशिंगटन में बवाल

अमेरिका-सऊदी अरब परमाणु समझौते को लेकर अमेरिकी संसद में सत्ताधारी रिपब्लिकंस और विपक्षी डेमोक्रेट्स सांसदों के बीच महाभारत शुरू हो गई है. दो वरिष्ठ सांसदों ने प्रस्तावित डील को लेकर ट्रंप के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए न सिर्फ उन्हें जमकर खरी खोटी सुनाई बल्कि उन्हें कूटनीति का पाठ भी बढ़ाया.

Written By Shwetank Ratnamber
Published: Oct 16, 2026, 12:50 PM IST | Updated: Oct 16, 2026, 02:14 PM IST
Image Credit: मोहम्मद बिन सलमान-डोनाल्ड ट्रंप (रॉयटर्स)
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US-Saudi Arabia deal: अमेरिका में सऊदी अरब को न्यूक्लियर ताकत देने का विरोध तेज हो गया है. वाशिंगटन डीसी में ट्रंप की प्रस्तावित डील के विरोध में खींचतान तेज हो गई है. ट्रंप बनाम विपक्ष की सिरफुटव्वल में दो वरिष्ठ डेमोक्रेट्स सांसदों ने यूएस-सऊदी के बीच प्रस्तावित डील के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. दोनों सांसदों ने ट्रंप को चेतावनी देते हुए इस डील के बाद परमाणु तकनीक के दुरुपयोग और मध्य पूर्व में हथियारों की होड़ तेज होने की आशंका जताई है. विपक्षी सांसदों के अड़ंगा डालने के बाद अब यूएस-सऊदी परमाणु समझौते का भविष्य संसद की समीक्षा और संभावित मतदान पर निर्भर करेगा.

सांसदों ने पेश किया प्रस्ताव

दो डेमोक्रेट सांसदों ने राष्ट्रपति ट्रंप के सऊदी अरब के साथ असैन्य परमाणु सहयोग समझौते को रोकने के लिए प्रस्ताव पेश किया है. दोनों सांसदों ने चेतावनी दी कि इस डील को फौरन खत्म कर देना चाहिए क्योंकि इसमें मिडिल ईस्ट में परमाणु हथियारों की होड़ को रोकने के लिए जरूरी सुरक्षा उपाय नहीं हैं.

ओरेगन के सांसद जेफ मर्कले और मैसाचुसेट्स के सांसद एडवर्ड मार्के ने असहमति का संयुक्त प्रस्ताव पेश किया, जिससे 29 नवंबर के बाद सीनेट यानी संसद में वोटिंग का रास्ता खुलेगा. डोनाल्ड ट्रंप अपने प्रस्तावित परमाणु समझौते को लागू करने का माहौल ढंग से बना भी नहीं पाए थे कि विपक्षी सांसदों ने यह कदम उठाकर रियाद के साथ ट्रंप प्रशासन की परमाणु कूटनीति के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी.

तीन महीने के लिए फंसा पेंच!

अमेरिकी संविधान के तहत, संसद के पास समझौते की समीक्षा के लिए 90 दिन का समय है. अगर  तबतक समीक्षा पूरी नहीं होती तो तय मियाद के बाद यूएस-सऊदी समझौता लागू हो सकता है.

अमेरिकी संसद की विदेश संबंध समिति के सीनियर मेंबर मर्कले ने कहा कि सऊदी अरब को असैन्य परमाणु तकनीक हस्तांतरित करने से पहले अमेरिका को मजबूत सुरक्षा उपायों पर जोर देना चाहिए.

मर्कले ने कहा, 'सऊदी अरब को अमेरिका की असैन्य परमाणु ऊर्जा तकनीक तक पहुंच देना, बिना इस बात की पुख्ता गारंटी के कि यह परमाणु बम की नींव नहीं बनेगी, अस्वीकार्य है. हम इतने बड़े फैसले में आंख बंद करके नहीं चल सकते.'

एडवर्ड मार्के ने इससे भी आगे जाकर चेतावनी दी कि यह प्रस्तावित समझौता पहले से ही अस्थिर क्षेत्र को और अस्थिर कर सकता है. उन्होंने कहा, 'अमेरिका-सऊदी परमाणु डील मेगावाट के बारे में नहीं, बल्कि मेगाटन के बारे में है.'

परमाणु संघर्ष का खतरा

अमेरिका में विपक्षी सांसदों का कहना है कि ईरान को एटमी ताकत देने के लिए रूस पर्दे के पीछे से समर्थन कर रहा है. ऐसे में जब अमेरिका ने ईरान को ऐसा करने से रोक दिया है तो सऊदी अरब के साथ ऐसा लचीला समझौता करने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इस समझौते से क्षेत्र में भविष्य में परमाणु संघर्ष का खतरा बढ़ सकता है.

उन्होंने यह भी चिंता जताई कि अगर सऊदी अरब को ऐसी क्षमताओं की अनुमति दी गई जो तेहरान को नहीं दी गई, तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर भविष्य के प्रतिबंधों का विरोध कर सकता है.

विपक्षी सांसदों के मुताबिक, इन शर्तों के न होने से अन्य क्षेत्रीय शक्तियों को भी इसी तरह की रियायतें मांगने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा. उन्होंने खासकर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का हवाला दिया, जिसके वाशिंगटन के साथ परमाणु सहयोग समझौते में संवेदनशील परमाणु गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध शामिल किए गए थे.

एडवर्ड मार्के ने कहा, 'यह डील मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों होड़ की शुरुआत है. संसद को इस बेहद खराब प्रस्ताव को फौरन खारिज कर देना चाहिए.' 

समझ पर सवाल

विपक्षी सांसदों ने ट्रंप प्रशासन के फैसला लेने की समझ पर सवाल उठाते हुए यह आरोप लगाया कि यह समझौता पहले से स्थापित परमाणु अप्रसार मानकों के हिसाब से कमजोर है, खासकर बिना किसी अंतरराष्ट्रीय निगरानी और निरीक्षण की आवश्यकता के बिना सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की इजाजत देना एक विनाशकारी फैसला हो सकता है.

विपक्षी सांसदों का तर्क है कि यह समझौता दो जरूरी सुरक्षा उपायों को पूरा नहीं करता. पहला- असैन्य परमाणु सहयोग के लिए तथाकथित गोल्ड स्टैंडर्ड, जिसके तहत प्राप्तकर्ता देश यूरेनियम को समृद्ध नहीं करने या खर्च किए गए परमाणु ईंधन को पुन: संसाधित नहीं करने के लिए प्रतिबद्ध होता है.

दूसरा- अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अतिरिक्त प्रोटोकॉल का पालन, जो निरीक्षकों को अघोषित परमाणु गतिविधियों का पता लगाने में मदद के लिए व्यापक पहुंच प्रदान करता है.

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About the Author

श्वेतांक रत्नाम्बर वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्हें टीवी और डिजिटल न्यूज़ मीडिया में 22 वर्षों से ज्यादा का व्यापक अनुभव है. वर्तमान में वे Zee News (Hindi) की डिजिटल टीम में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय (देश-दुनिया) खबरों की डेस्क पर कार्यरत हैं. समसामयिक मुद्दों, वैश्विक राजनीति और कूटनीति पर गहरी समझ रखने वाले श्वेतांक जटिल अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों और राजनीतिक समीकरणों का सटीक विश्लेषण करने के विशेषज्ञ हैं.Zee News डिजिटल से पहले उन्होंने ज़ी मीडिया नेटवर्क के ग्लोबल न्यूज़ चैनल 'WION' के साथ काम किया है. इस दौरान उन्होंने 'Gravitas', 'The West Asia Post' और 'One Africa' जैसे कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्राइम-टाइम शोज़ के हिंदी प्रोडक्शन और इंटरप्रिटेशन में अहम भूमिका निभाई. 2004 से शुरू हुए अपने पत्रकारिता करियर में श्वेतांक ने रिपोर्टिंग और एंकरिंग के साथ-साथ चार लोकसभा और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों की व्यापक ग्राउंड कवरेज की है.जामिया मिल्लिया इस्लामिया (JMI), नई दिल्ली से जर्नलिज्म में पीजी डिप्लोमा के बाद मास कम्युनिकेशन और पॉलिटिकल साइंस में मास्टर्स डिग्री हासिल करने वाले श्वेतांक लंबे समय से 'प्रेस क्लब ऑफ इंडिया' (PCI) के सम्मानित सदस्य हैं.आप श्वेतांक रत्नाम्बर से सीधे shwetank.ratnamber@india.com पर ईमेल के जरिए संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप उनसे एक्स (ट्विटर), मेटा (फेसबुक) और लिंक्डइन पर भी कनेक्ट कर सकते हैं.' 
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