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एक महिला कैदी का नाम इस वक्त मीडिया की सुर्खियां बना हुआ है. यह नाम है क्रिस्टा गेल पाइक का, जिन्हें 1995 में हत्या के मामले में दोषी करार दिया गया था और एक साल बाद उन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी. बीते बुधवार को उन्हें सजा के तहत मौत की नींद सुलाने के लिए 2 इंजेक्शन दिए गए, लेकिन उनकी जान नहीं निकली. इस नाकाम कोशिश के बाद वह गंभीर रूप से बीमार हैं और फिलहाल अस्पताल में लाइफ सपोर्ट सिस्टम यानी वेंटिलेटर पर हैं. डॉक्टर उनकी जान बचाने और शरीर से जानलेवा दवा का असर खत्म करने में लगे हुए हैं.
इस मामले में शुक्रवार को पाइक के वकीलों ने अदालत में एक इमरजेंसी याचिका दायर की है, जिसमें वकीलों ने जेल प्रशासन पर भारी लापरवाही के आरोप लगाए हैं और मामले से जुड़े सारे सबूत सुरक्षित रखने की मांग की है. इमरजेंसी याचिका में वकीलों ने कोर्ट से अपील की है कि वह जेल प्रशासन को बुधवार रात की इस गड़बड़ी से जुड़े सारे सबूत संभालकर रखने का आदेश दे.
वकीलों ने बताया कि सजा देने की नाकाम कोशिश के दौरान पाइक को किस तरह की गंभीर शारीरिक चोटें और दर्द झेलना पड़ा. वकीलों के अनुसार, जैसे ही नैशविले की जेल में पाइक को नस के जरिए जानलेवा दवा की दो डोज दी गईं, वैसे ही उनकी हालत गंभीर होती गई. वह सांस नहीं ले पा रही हैं, इसलिए उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया है. वकीलों ने बताया कि सुई नस में सही से नहीं बैठ पाई, इसी वजह से वह तेज तेजाबी केमिकल नसों से निकलकर त्वचा के अंदर फैल गया. इससे पाइक के दोनों हाथ बुरी तरह सूजकर जल गए और उन पर फफोले पड़ गए हैं.
महिला कैदी पाइक के वकीलों ने जेल प्रशासन पर गंभीर आरोप भी लगाए हैं, जिनमें कहा गया कि डॉक्टरों ने पहले ही सावधान किया था कि पाइक की नसें बहुत पतली हैं और उन्हें खून की एक बीमारी ('थ्रोम्बोसाइटोसिस') है, इसलिए नस में सुई (IV लाइन) लगाना बहुत मुश्किल होगा. लेकिन अधिकारियों ने डॉक्टरों की इस चेतावनी पर कोई ध्यान नहीं दिया.
टेनेसी के 20वें ज्यूडिशियल डिस्ट्रिक्ट की चांसरी कोर्ट में दी गई अर्जी में वकीलों ने कहा कि 'सज़ा देने वाली टीम में से किसी को भी यह समझ नहीं आया कि सुई सही नस में नहीं लगी थी या नस फट चुकी थी और वह जहरीली दवा खून की बजाय पाइक के शरीर के मांस (टिशू) में फैल रही थी.' अर्जी में यह भी बताया गया कि उस वक्त वहां मौजूद गवाहों ने पाइक के रोने, सिसकने और दर्द में भारी-भारी सांसें लेने की आवाजें सुनी थीं.
इस घटना के बाद गवर्नर ली ने साल 2026 के बाकी बचे समय के लिए राज्य में सभी प्रकार की सजe-ए-मौत पर रोक लगा दी है और पूरी प्रक्रिया में हुई चूकों की निष्पक्ष जांच के आदेश दिए हैं. पाइक के मामले में गवर्नर बिल ली का कहना है कि तय नियमों का पालन किया गया था, लेकिन इस साल यह दूसरा मामला था जब सज़ा देने की प्रक्रिया बुरी तरह पटरी से उतर गई.
यह मामला 3 दशक पुराना है. 50 साल की क्रिस्टा पाइक को साल 1995 में अपनी 19 साल की सहपाठी कोलीन स्लेमर की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था. उस वक्त पाइक की उम्र सिर्फ 18 साल थी. हुआ यह था कि जनवरी 1995 में पाइक, उनके उस समय के बॉयफ्रेंड तादारिल शिप और एक दोस्त ने स्लेमर को टेनेसी यूनिवर्सिटी के कैंपस के पास जंगल में बुलाया था, जहां तीनों ने स्लेमर की पिटाई की और धारदार हथियार से हमला कर दिया. अपराध के समय पाइक 18 साल की थीं, वहीं उनके बॉयफ्रेंड शिप की उम्र 17 साल थी. शिप ने बाद में मामले में गवाही दी. नाबालिग होने के कारण उसे मौत की सजा नहीं दी गई और उम्रकैद की सजा सुनाई गई.
अगर यह सजा पूरी हो जाती, तो पिछले 200 से ज़्यादा सालों में टेनेसी में सज़ा-ए-मौत पाने वाली पाइक पहली महिला होतीं. साथ ही, अमेरिकी इतिहास में वह ऐसी पहली कैदी बन जातीं, जिन्हें अपने टीनेज (किशोरावस्था) के किसी जुर्म के लिए यह सज़ा मिली.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, गवर्नर ली ने इसी हफ्ते पाइक की दया याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें यह मांग की गई थी कि उनकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया जाए. इसके पीछे वजह बताई गई थी कि बचपन में उनके साथ बहुत बुरा बर्ताव हुआ था, दो बार रेप सहित गंभीर यौन शोषण हुआ, वह मानसिक रूप से बीमार थीं और मां के शराब पीने की वजह से उनका दिमाग ठीक से विकसित नहीं हो पाया था. हालांकि, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने भी बुधवार को इस पर लगी रोक हटाते हुए सज़ा देने की मंजूरी दे दी थी.
CNN ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि इससे पहले अमेरिका में ऐसे सिर्फ 7 मामले सामने आए थे, जहां मौत की सजा (घातक इंजेक्शन) के बाद भी कैदी जिंदा बच गए. लेकिन उन पुराने मामलों में मेडिकल टीम को सही नस नहीं मिल पा रही थी, यानी नस में सुई न लग पाने की वजह से सजा पूरी नहीं हो सकी थी. लेकिन पाइक के मामले में कहानी बिल्कुल अलग है. यह पहला ऐसा मामला है, जहां जानलेवा दवा शरीर के अंदर जाने के बावजूद वह जिंदा बच गईं.