नीचे गर्मी, ऊपर जम जाती है बर्फ! दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची इमारत 'शंघाई टावर' में क्यों बदल जाता है मौसम?
चीन की सबसे ऊंची इमारत की एक खासियत है कि इसमें आपको अलग अलग मौसम का अहसास होता है. ग्राउंड फ्लोर से आप जैसे ही टॉप फ्लो पर पहुंचते हैं तो पारा माइनस में नजर आता है, जबकि ग्राउंड फ्लोर पर गर्मी का अहसास होता है.
अगर आपसे कहा जाए कि एक ही बिल्डिंग में आप 2 तरह का मौसम फील कर सकते हैं तो चौंकिएगा मत. दुनिया में एक ऐसी इमारत है, जिसके ग्राउंड फ्लोर पर खड़े होने पर आपको उमस भरी गर्मी फील होती है और जैसे ही आप लिफ्ट से टॉप फ्लोर पर पहुंचते हैं तो तापमान इतना कम हो जाता है कि बर्फ जमने लगे. ये कहानी है चीन की सबसे ऊंची इमारत 'शंघाई टावर' की. 632 मीटर ऊंची इस इमारत में हर मंजिल के साथ आप मौसम का बदला हुआ मिजाज देखेंगे.
शंघाई टावर में जैसे-जैसे आप लिफ्ट से ऊपर चढ़ते हैं, हर मंजिल के साथ मौसम और तापमान तेजी से बदलने लगता है, ग्राउंड फ्लोर पर मौसम सामान्य रहता है, लेकिन टॉप फ्लोर और उसके आस-पास पहुंचते ही हवा एकदम बर्फीली हो जाती है. ऊपरी मंजिलों पर पारा अक्सर 0 डिग्री तक लुढ़क जाता है और कई बार तो बर्फ जमने लगती है. ठंड के दिनों में टावर के ऊपरी हिस्से का तापमान माइनस में चला जाता है, जबकि नीचे का मौसम आम दिनों जैसा ही रहता है.
सबसे पहले शंघाई टावर के बारे में जानिए
- शंघाई टावर चीन की सबसे ऊंची और पूरी दुनिया की तीसरी सबसे ऊंची इमारत है.
- यह चीन के शंघाई शहर के पुडोंग जिले के लुजियाज़ुई फाइनेंशियल हब में स्थित है.
- इसमें कुल 133 मंजिलें हैं. 5 जमीन के नीचे और 128 बाहर.
- इस टावर की कुल ऊंचाई करीब 632 मीटर (लगभग 2,073 फीट) है.
- इसे मशहूर अमेरिकी आर्किटेक्चर फर्म 'जेन्सलर' ने डिजाइन किया है.
- इसका खास घुमावदार और जलेबीनुमा (सर्पिल) आकार इसे भयंकर तूफानी हवाओं के दबाव से बचाता है.
कैसे और क्यों बदल जाता है बिल्डिंग के अंदर का मौसम?
अब जानिए इस बिल्डिंग का मौसम कैसे और क्यों बदलता है. इसे ऐसे समझिए कि आप नीचे के फ्लोर्स पर हैं, तो हो सकता है कि आसमान में घने बादल छाए दिखें और धूप का नामो-निशान न हो, लेकिन जैसे ही आप लिफ्ट से टॉप फ्लोर्स पर जाते हैं तो नजारा बदल जाता है, वहां धूप खिली नजर आएगी और आसमान एकदम साफ दिख सकता है.
यह मौसम इसलिए बदलता है, क्योंकि इस टावर की ऊंचाई बादलों के तैरने वाले स्तर (क्षोभमंडल यानी ट्रोपोस्फीयर) तक पहुंचती है. इसका मतलब यह है कि नीचे जमीन से जो बादल आसमान में दिखते हैं, यह इमारत उनके भी पार यानी ऊपर निकल जाती है. यही वजह है कि इतनी ऊंचाई पर पहुंचकर मौसम का मिजाज शहर की सड़कों जैसा नहीं, बल्कि किसी ऊंचे पहाड़ की चोटी जैसा हो जाता है.
साइंस का नियम भी कहता है कि हवा में जैसे ही ऊंचाई बढ़ती जाती है तो तापमान अपने आप गिरता जाता है. यही वजह है कि ग्राउंड फ्लोर के मुकाबले शंघाई टावर के टॉप फ्लोर के तापमान में करीब 8 से 10 डिग्री सेल्सियस तक का अंतर दिखता है.
जलवायु भी एक वजह
शंघाई टावर के ऊपर जमने वाली बर्फ के लिए शंघाई की जलवायु भी जिम्मेदार है. सर्दियों के दौरान, ठंडी महाद्वीपीय हवा शंघाई के पूर्वी तट से आने वाली नम तटीय हवा के साथ मिलती है और इमारत के ऊपरी बाहरी हिस्से से टकराती है. हवा के साथ आई नमी इमारत के संपर्क में आने पर कम तापमान होने की वजह से जम जाती है. इस वजह से भी शंघाई टावर के टॉप फ्लोर पर बर्फ जमी रहती है.
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