रियाद पर मंडराया यमन युद्ध का साया: हूतियों को हल्के में लेना सऊदी अरब की बड़ी भूल? जानिए भारत पर क्या होगा असर
यमन के हूती विद्रोहियों का हमला रियाद तक पहुंचने से सऊदी अरब की सुरक्षा रणनीति पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं. जानिए हूतियों की सैन्य क्षमता को कम आंकना सऊदी को कैसे भारी पड़ रहा है और मिडिल ईस्ट में इसके क्या जियोपॉलिटिकल मायने हैं.
19 सितंबर 2026 की रात रियाद में हवाई हमले के सायरन बजे. कुछ देर बाद किंग खालिद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास आरामको के एक फ्यूल डिपो से काला धुआं उठता दिखाई दिया. यमन के हूतियों ने इस हमले की जिम्मेदारी ली. मौजूदा संघर्ष में सऊदी राजधानी पर इसे हूतियों का पहला सीधा हमला माना जा रहा है. शुरुआती आकलन के मुताबिक हमले से सऊदी के तेल उत्पादन पर तत्काल बड़ा असर नहीं पड़ा. लेकिन रियाद जैसे शहर में तेल ठिकाने के पास हमला सऊदी की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा संकेत है.
रियाद पर हमला अचानक नहीं हुआ. इससे पहले 10 सितंबर को हूतियों ने लाल सागर के किनारे बसे बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा किया. अगले दिन पेरिम द्वीप पर भी उनका नियंत्रण होने की खबर सामने आई. पेरिम द्वीप बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास है. यह समुद्री रास्ता एशिया और यूरोप के बीच व्यापार के लिए बेहद अहम है. स्वेज नहर की ओर जाने वाले जहाज इसी रास्ते से गुजरते हैं. मोखा भी बाब अल-मंदेब के करीब है.
2.2 करोड़ से ज्यादा लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत
इस समय मारिब और ताइज़ में भी लड़ाई तेज है. मारिब यमन के तेल और गैस का बड़ा केंद्र है और सरकार का अहम गढ़ माना जाता है. ताइज तट और यमन के अंदरूनी हिस्सों को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण शहर है. अगर इन इलाकों में हूतियों की पकड़ मजबूत होती है तो पूरे यमन और बाब अल-मंदेब पर उनका प्रभाव बढ़ सकता है. इस संघर्ष की मानवीय कीमत भी बड़ी है. यूनिसेफ के मुताबिक जुलाई में लड़ाई बढ़ने के बाद से 1.46 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार यमन में 2.2 करोड़ से ज्यादा लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है.
सऊदी अरब के सामने सैन्य कार्रवाई या समझौते का विकल्प
यह संकट क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के लिए बड़ी चुनौती है. सऊदी अरब के सामने मुख्य रूप से दो रास्ते हैं. पहला, सैन्य कार्रवाई और दूसरा, हूतियों के साथ समझौते की कोशिश. सऊदी अरब पहले सैन्य रास्ता अपना चुका है. मार्च 2015 में सऊदी गठबंधन ने यमन में सैन्य अभियान शुरू किया था. उस समय MBS रक्षा मंत्री थे. अमेरिका और ब्रिटेन से सऊदी गठबंधन को हथियार, खुफिया जानकारी और प्रशिक्षण मिला. इसके बावजूद हूती संगठन को निर्णायक रूप से हराया नहीं जा सका. अप्रैल 2022 में एक नाजुक युद्धविराम हुआ. UNDP के अनुसार 2021 के अंत तक यमन युद्ध में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कारणों से करीब 3.77 लाख लोगों की मौत हुई थी.
जुलाई में टूटा युद्धविराम
यह युद्धविराम इस साल जुलाई में टूट गया. 20 जुलाई को हूतियों ने सऊदी बंदरगाहों और जहाजों की नाकेबंदी का ऐलान किया. सितंबर में एक्सिस की रिपोर्ट के अनुसार MBS ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से दो बार फोन पर बात कर अमेरिकी हवाई हमलों की मांग की. रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने सीधे सैन्य कार्रवाई से इनकार किया और खुफिया तथा टारगेटेड डाटा देने पर सहमति जताई. अमेरिका का ध्यान इस समय ईरान और होर्मुज़ पर भी है. ऐसे में वॉशिंगटन एक और बड़े सैन्य मोर्चे से बचना चाहता है.
हूतियों की नाराजगी के पीछे इतिहास भी है
हूती-सऊदी संघर्ष को केवल मौजूदा युद्ध से समझना मुश्किल है. इसकी जड़ें यमन और सऊदी अरब के पुराने विवादों तक जाती हैं. 26 दिसंबर 1915 को ब्रिटेन और अब्दुलअज़ीज़ अल सऊद यानी इब्न सऊद के बीच दारीन संधि हुई थी. ब्रिटेन ने उन्हें नज्द का शासक माना. इसके बदले इब्न सऊद ने ब्रिटेन की सहमति के बिना किसी दूसरी विदेशी ताकत से समझौता नहीं करने की बात मानी. इसके साथ उन्हें हर महीने 5,000 पाउंड और हथियार दिए गए. इससे जुड़े कई दस्तावेज ब्रिटिश भारत के India Office के रिकॉर्ड में भी मौजूद हैं. 1932 में आधुनिक सऊदी अरब बना. हूती इस इतिहास का इस्तेमाल सऊदी राज्य को पश्चिमी ताकतों के समर्थन से बनी व्यवस्था के रूप में पेश करने के लिए करते हैं.
सिर्फ ईरान के इशारे पर नहीं चलते हैं हूती
सीमा विवाद भी दोनों देशों के रिश्तों में लंबे समय से रहा है. 1934 की ताइफ संधि के बाद जाजान, असीर और नजरान सऊदी अरब के हिस्से में आए. 2000 की जेद्दा संधि के बाद सीमा विवाद को औपचारिक रूप से सुलझाया गया. हालांकि हूती उस यमनी गणराज्य की वैधता पर ही सवाल उठाते हैं जिसने इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे. हूतियों को अक्सर ईरान के सहयोगी या उसके समर्थित संगठन के तौर पर देखा जाता है. ईरान और हिज्बुल्लाह से उन्हें प्रशिक्षण, हथियार और संगठनात्मक मदद मिलने की रिपोर्टें रही हैं. यमन की सरकारी सेना ने हूतियों पर ईरानी एयर डिफेंस हथियारों के इस्तेमाल का आरोप लगाया है. दूसरी ओर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने कहा है कि हूतियों की कार्रवाई का तेहरान से संबंध नहीं है. कई विश्लेषकों के अनुसार ईरान और हूतियों के हित कई मुद्दों पर एक जैसे हैं, लेकिन हूती अपने फैसले खुद भी लेते हैं.
2014 से हूती यमन की राजधानी सना और देश के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों के बड़े क्षेत्र पर नियंत्रण रखते हैं. उनकी रणनीति में ड्रोन और मिसाइलों का इस्तेमाल अहम है. कम लागत वाले हथियारों से महंगे सैन्य और ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाकर वे विरोधी पर दबाव बनाते हैं. इसे असमान युद्ध कहा जाता है.
तेल के दो अहम रास्ते खतरे में
सऊदी अरब और पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ी चिंता तेल की सप्लाई को लेकर है. खाड़ी से तेल की आवाजाही के दो बड़े समुद्री रास्ते हैं. पहला स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और दूसरा बाब अल-मंदेब. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन यानी EIA के मुताबिक 2023 में होर्मुज़ से रोजाना करीब 2.09 करोड़ बैरल तेल गुजरा था. यह दुनिया की कुल खपत का करीब पांचवां हिस्सा था. इसी साल बाब अल-मंदेब से रोजाना करीब 87 लाख बैरल तेल और तेल उत्पादों की आवाजाही हुई. फरवरी में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज पर दबाव बढ़ा. ऐसे में सऊदी अरब ने ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए तेल को लाल सागर के यानबू बंदरगाह तक पहुंचाने का रास्ता इस्तेमाल किया.
यह पाइपलाइन रोजाना करीब 70 लाख बैरल तेल ले जाने की क्षमता रखती है. लेकिन सितंबर में इराक स्थित एक समूह के ड्रोन हमले में पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हो गई और इसे बंद करना पड़ा. दूसरी तरफ हूतियों ने सऊदी टैंकरों को बाब अल-मंदेब से नहीं गुजरने की चेतावनी दी है. इस तरह सऊदी तेल की सप्लाई के दोनों प्रमुख रास्तों पर दबाव बढ़ गया है.
तेल महंगा हुआ तो भारत पर भी असर पड़ेगा
तेल की कीमतों पर पश्चिम एशिया के तनाव का असर पहले ही दिख रहा है. सितंबर में Brent क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा और 25 सितंबर को इसकी कीमत करीब 105.7 डॉलर थी. इस साल इसमें 70 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज हुई है. हालांकि अप्रैल के करीब 126 डॉलर के शिखर से यह नीचे है. भारत अपनी जरूरत का करीब 88 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है. सऊदी अरब भारत के बड़े तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है. होर्मुज में परेशानी बढ़ने के बाद सऊदी तेल का एक हिस्सा यानबू के रास्ते भारत पहुंच रहा था. अगर लाल सागर और बाब अल-मंदेब में भी खतरा बढ़ता है तो भारत के लिए तेल की सप्लाई और परिवहन लागत दोनों पर असर पड़ सकता है.
इसका असर तीन तरह से हो सकता है
पहला, कच्चा तेल महंगा हुआ तो भारत का आयात बिल बढ़ सकता है. इससे रुपये और महंगाई पर दबाव पड़ सकता है. दूसरा, लाल सागर का रास्ता बाधित हुआ तो यूरोप जाने वाले भारतीय माल को अफ्रीका के रास्ते लंबा सफर करना पड़ सकता है. इससे जहाजों का किराया और बीमा लागत बढ़ सकती है. तीसरा, खाड़ी में रहने वाले भारतीयों पर असर पड़ सकता है. सऊदी अरब में करीब 27.5 लाख भारतीय रहते हैं. पूरे खाड़ी क्षेत्र में भारतीयों की संख्या करीब 99.5 लाख है. सऊदी अरब भारत के बासमती चावल का भी बड़ा बाजार है. भारत के बासमती निर्यात में सऊदी की हिस्सेदारी करीब 20.3 फीसदी बताई गई है.
सऊदी की सुरक्षा रणनीति भी बदल सकती है
हूतियों के लगातार हमलों के बीच सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा साझेदारियों पर फिर से विचार करना पड़ सकता है. अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच मक्का संयुक्त रक्षा समझौता हुआ. फ्रांस ने यानबू तेल टर्मिनल की सुरक्षा के लिए सैनिक भेजने की पुष्टि की है, हालांकि उसने युद्ध में शामिल होने से इनकार किया है.
अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंधों के अलावा सऊदी अरब चीन और दूसरे देशों के साथ भी अपने संबंध बढ़ा रहा है. पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव का असर भारत समेत पूरे एशिया पर पड़ सकता है.
आगे क्या होगा?
अब तीन सवाल अहम हैं
- पहला, क्या हूतियों की रणनीति ईरान की क्षेत्रीय रणनीति से जुड़ी है? ईरान पर दबाव बढ़ने के साथ खाड़ी के देशों और समुद्री रास्तों को निशाना बनाने की रणनीति की चर्चा हुई है. कुछ विश्लेषक हूती हमलों को इसी व्यापक रणनीति से जोड़ते हैं. हालांकि हूतियों के अपने राजनीतिक और क्षेत्रीय हित भी हैं.
- दूसरा, सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के लिए किन देशों पर ज्यादा भरोसा करेगा? अमेरिका के अलावा पाकिस्तान, तुर्किये, फ्रांस और चीन के साथ उसके संबंध इस लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं.
- तीसरा, क्या पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति से सऊदी अरब की इजराइल और दूसरे पश्चिमी देशों के साथ नीतियां प्रभावित होंगी? इस बारे में अलग-अलग अटकलें हैं, लेकिन अभी ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जिससे किसी खास दिशा का निष्कर्ष निकाला जा सके.
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह संघर्ष?
हूतियों और सऊदी अरब के बीच बढ़ता तनाव सिर्फ यमन या खाड़ी की समस्या नहीं है. बाब अल-मंदेब और लाल सागर का रास्ता वैश्विक व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है. अगर यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो तेल, माल ढुलाई और बीमा की लागत बढ़ सकती है. इसका असर भारत के आयात और निर्यात पर भी पड़ सकता है. तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो भारत के आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है. साथ ही खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों और वहां से भारत आने वाली कमाई पर भी क्षेत्रीय अस्थिरता का असर पड़ सकता है. इसलिए रियाद पर हुआ हमला केवल सऊदी अरब की सुरक्षा का मामला नहीं है. बाब अल-मंदेब और लाल सागर में होने वाली घटनाओं का असर आगे चलकर भारत की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब तक पहुंच सकता है.