सऊदी अरब के पवित्र शहर मक्का की एक मस्जिद में कथित 'अनैतिक और आपत्तिजनक हरकतों' के आरोप में बांग्लादेशी कपल को चुपचाप फांसी पर चढ़ा दिया गया. जैसे ही ये खबर सऊदी सरकार की प्रेस एजेंसी ने सार्वजनिक की तो बांग्लादेश में खलबली मच गई. खलबली इसलिए, क्योंकि बांग्लादेश को इसकी कानो कान खबर नहीं लगी. अब ढाका ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए सऊदी से पूरी डिटेल और जवाब मांगा है.
इस मामले में सवाल उठ रहा है कि क्या सऊदी अरब ने उस अंतरराष्ट्रीय नियम को ताक पर रख दिया, जिसका पालन करना हर देश के लिए जरूरी माना जाता है. हम ये डिटेल से जानेंगे, लेकिन इससे पहले आपको पूरा मामला समझना जरूरी है.
सऊदी प्रेस एजेंसी के अनुसार, बांग्लादेशी कपल को मक्का की एक मस्जिद में कथित रूप से अनैतिक काम करते हुए सुरक्षाबलों ने पकड़ा. यह केस सऊदी की अदालत में चला और दोनों को मौत की सजा सुना दी गई. हैरानी की बात ये है कि गिरफ्तारी से लेकर फांसी के फंदे तक, पूरे प्रोसेस में सऊदी अरब ने जेद्दा स्थित बांग्लादेशी दूतावास को भनक तक नहीं लगने दी.
जिस कपल को फांसी की सजा दी गई है, ना तो उनके परिवार को कोई जानकारी दी गई और ना ही बांग्लादेशी अधिकारियों से यह तस्दीक कराई गई कि वे वाकई बांग्लादेश के नागरिक हैं या नहीं. अब बांग्लादेश सरकार ये पूछ रही है कि उनके नागरिकों को कानूनी मदद का मौका दिए बिना यह सब कैसे हो गया और उनके शव देश कैसे वापस आएंगे?
शरिया कानून में अपराध और सजा को मुख्य रूप से तीन कैटेगरीज में बांटा गया है, पहला है हुदूद, दूसरा किसास और तीसरा है ताजीर. ताजीर उन गुनाहों के लिए लागू होता है, जिनकी कोई फिक्स या तय सजा धार्मिक ग्रंथों में सीधे तौर पर दर्ज नहीं है. ताजीर के तहत सजा तय करने की पूरी ताकत अदालत के जज यानी काजी के विवेक पर डिपेंड करती है.
आसान शब्दों में समझें तो जब कोई शख्स ऐसा जुर्म करता है, जिससे समाज का माहौल बिगड़े, किसी धार्मिक स्थल की पवित्रता टूटे या सार्वजनिक मर्यादा तार-तार हो, तो जज जुर्म की गंभीरता देखकर कोड़े मारने, लंबी जेल या सीधे मौत की सजा भी मुकर्रर कर सकता है.
ताजीर कानून की सबसे बड़ी बात यही है कि इसमें पहले से कोई एक सजा तय नहीं होती. शरिया कोर्ट का जज पूरे मामले के हर पहलू को बारीकी से देखता है. गुनाह किस जगह हुआ, किस वक्त हुआ और समाज पर इसका कितना बुरा असर पड़ेगा. मक्का मस्जिद वाले इस मामले में बांग्लादेश के नजरुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख्तर को सजा देने में जज ने इसी अधिकार का यूज किया है.
ताजीर के तहत मिलने वाली मौत की सजा बेहद बेरहम होती है. आमतौर पर मुजरिमों का सिर कलम करके सजा-ए-मौत दी जाती है. कुछ खास मामलों में फायरिंग स्क्वाड (गोलियों से भूनकर) का भी सहारा लिया जाता है. सऊदी का यह कड़ा कानून अपने नागरिकों के साथ-साथ वहां रहने वाले विदेशी प्रवासियों पर भी पूरी तरह उसी सख्ती से लागू होता है.
ऐसा कोई पहला मौका नहीं है जब सऊदी अरब ने कदम उठाया है. इससे पहले भी कई बार ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहां किसी जुर्म में दूसरे मुल्क के नागरिक को सऊदी ने चुपचाप फांसी दे दी और उसके दूतावास को कानो-कान खबर तक नहीं होने दी. हाल ही में जून के महीने में भी इथियोपिया के 5 नागरिकों के साथ बिल्कुल ऐसा ही किया गया था. वहीं, इससे पहले भारत के भी एक नागरिक के साथ सऊदी हुकूमत ऐसा ही रवैया अपना चुकी है.
अब जानते हैं उस नियम के बारे में, जिसे नजरअंदाज करने के आरोप सऊदी अरब पर लगे हैं. कानून और मानवाधिकार के जानकारों का साफ कहना है कि सऊदी अरब ने इस पूरे मामले में इंटरनेशनल डिप्लोमैटिक नियमों की अनदेखी की है. बांग्लादेश की बड़ी संस्था BRAC के माइग्रेशन हेड शरीफ अल हसन के मुताबिक, सऊदी हुकूमत ने इस पूरे प्रोसेस में अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानूनों को पूरी तरह किनारे कर दिया.
दरअसल, सऊदी अरब ने 1981 में ही वियना कन्वेंशन पर साइन किए थे, जिसे दुनिया के 180 से ज्यादा देश मानते हैं. इस कानून का आर्टिकल 36 किसी भी विदेशी नागरिक को दूसरे मुल्क में पकड़े जाने पर कुछ बुनियादी हक देता है, नीचे जानिए...
दूतावास को फौरन जानकारी देना: अगर किसी विदेशी नागरिक को हिरासत में लिया जाता है, तो उसकी मांग पर बिना किसी देरी के उसके देश की एम्बेसी या काउंसलेट को खबर करना जरूरी होता है.
कानूनी मदद और मुलाकात का हक: जिस देश के नागरिक को पकड़ा जाता है, उस देश के राजनयिकों को पूरा हक होता है कि वे अपने नागरिक से जेल में जाकर मिलें, बातचीत करें और उसके बचाव के लिए वकील का इंतजाम कराएं.
इस पूरे मामले में कानूनी एक्सपर्ट डॉ. रेहान रशीद कहते हैं, 'सऊदी पुलिस और प्रशासन की यह ड्यूटी थी कि वे पकड़े गए दोनों नागरिकों को बताएं कि उनके पास अपने देश के दूतावास से मदद मांगने का कानूनी हक है. इसका रिकॉर्ड भी रखा जाना चाहिए था. मेजबान देश की जिम्मेदारी सिर्फ तभी खत्म होती है, जब आरोपी खुद साफ मना कर दे कि उसे अपने मुल्क के दूतावास से कोई मदद नहीं चाहिए.'
बांग्लादेश के पूर्व राजदूत हुमायूं कबीर ने इस मुद्दे पर इसे सऊदी की लापरवाही करार दिया है. कबीर का कहना है, 'अगर कोई नागरिक विदेश में ऐसी मुश्किल में पड़ता है, तो वह अपने देश के दूतावास से संपर्क कर मदद मांग सकता है.' हुमायूं कबीर का यह भी कहना है, 'चूंकि मुकदमा सऊदी अरब की अपनी आंतरिक कानूनी और न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा था, इसलिए सऊदी प्रशासन पर बांग्लादेश को अनिवार्य रूप से सूचित करने की सीधी कानूनी बाध्यता नहीं है. फिर भी, यदि बांग्लादेश आधिकारिक तौर पर सवाल उठाता है, तो सऊदी अधिकारी इसका जवाब दे सकते हैं.'