अमेरिका की बादशाहत खत्म... अब कौन है नई सुपर पॉवर? जयशंकर ने Munich में दिखाई दुनिया की बदलती तस्वीर
म्यूनिख सम्मेलन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने वैश्विक भू-राजनीति और बदलती व्यवस्था पर बड़ा बयान दिया. जानिए बहुध्रुवीय होती दुनिया और नए शक्ति केंद्रों के उभार पर जयशंकर की मुख्य बातें.
म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (Munich Security Conference) के मंच से भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दुनिया के सामने बदलते वैश्विक समीकरणों की एक बेहद साफ और बेबाक तस्वीर पेश की. उनका सीधा संदेश था कि अब वह दौर बीत चुका है जब कोई एक देश अकेला पूरी दुनिया पर अपनी बादशाहत चला सकता था. अमेरिकी प्रभाव के धीरे-धीरे घटने और पुराने ढर्रे के कमजोर होने से वैश्विक राजनीति में अब किसी एक single 'सुपरपावर' का एकाधिकार नहीं रहा. इसकी जगह अब 'मल्टीपोलर वर्ल्ड' (बहुविकल्पीय व्यवस्था) ले चुका है.
आज दुनिया में चीन, भारत जैसे नए और शक्तिशाली शक्ति-केंद्र उभर चुके हैं, जिन्हें नजरअंदाज करके कोई भी बड़ा अंतरराष्ट्रीय फैसला नहीं लिया जा सकता. एस जयशंकर के मुताबिक, नई दुनिया में किसी एक देश का हुक्म नहीं चलेगा, बल्कि क्षेत्रीय शक्तियां अपनी जरूरतों और प्राथमिकताओं के हिसाब से फैसले लेंगी. भारत आज इसी संतुलन का बड़ा जरिया बनकर उभरा है- जो न किसी के दबाव में झुकता है और न ही किसी गुट का अंधभक्त है. संक्षेप में कहें तो, किसी एक देश का युग खत्म हो चुका है और अब नए भारत जैसे प्रमुख खिलाड़ियों के साथ साझेदारी और बहुध्रुवीय व्यवस्था का दौर शुरू हो चुका है.
अमेरिका की बादशाहत पर खड़े कर दिए सवाल!
म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि दुनिया तेजी से कई विकल्पों वाली व्यवस्था की ओर बढ़ रही है. उन्होंने अमेरिकी बादशाहद पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि ऐसे दौर में देशों के लिए किसी एक खेमे में पूरी तरह जाने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने हितों के मुताबिक रिश्ते बनाए रखना ज्यादा जरूरी होगा. जयशंकर ने कहा कि आज की परस्पर निर्भर दुनिया में खुद को दूसरों से पूरी तरह अलग रखना संभव नहीं है. ऐसे में देशों को रिश्तों में संतुलन बनाते हुए अपने विकल्पों को बढ़ाना होगा. उन्होंने इसे 'बहुवकल्पी व्यवस्था' की बढ़ती भूमिका से जोड़ा.
मिडिल पावर देशों के सामने कई मौके
जयशंकर ने उभरती और मिडिल पावर अर्थव्यवस्थाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को अहम क्षेत्र बताया. उनके मुताबिक, बड़े देशों के अलावा दूसरे देश भी अपने संसाधनों को साथ लाकर संघर्ष और तनाव की स्थितियों में एक-दूसरे की कूटनीतिक कोशिशों को मजबूत कर सकते हैं. उन्होंने निवेश और व्यापार में सहयोग का भी जिक्र किया. भारत और यूरोपीय संघ के बीच लंबे समय तक चली बातचीत के बाद इस साल हुए समझौते को उन्होंने इसका उदाहरण बताया.
सप्लाई चेन से लेकर हेल्थ सिक्योरिटी तक
विदेश मंत्री ने सप्लाई चेन की मजबूती को भी प्रमुख मुद्दा बताया. उन्होंने कहा कि किसी क्षेत्र में प्रभाव बनाने के लिए दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होना जरूरी नहीं है. चिप्स और मशीन निर्माण जैसे क्षेत्रों में भी देश मिलकर अपनी भूमिका मजबूत कर सकते हैं. हेल्थ सिक्योरिटी के क्षेत्र में उन्होंने एपीआई और दवाओं के उत्पादन को अलग-अलग देशों में बढ़ाने की जरूरत बताई. उनके मुताबिक, दुनिया में जहां मांग है और जहां उत्पादन की क्षमता है, दोनों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है. इसके लिए प्रतिभा और कौशल का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवाह अहम भूमिका निभा सकता है.
कनेक्टिविटी और क्लाइमेट भी अहम मुद्दे
जयशंकर ने कनेक्टिविटी, जलवायु कार्रवाई और सतत विकास को भी उभरती और मिडिल पावर अर्थव्यवस्थाओं के साझा एजेंडे का हिस्सा बताया. उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों ने इन मुद्दों को और जरूरी बना दिया है. रक्षा क्षेत्र में भी उन्होंने बदलाव की जरूरत पर जोर दिया. उनके मुताबिक, पुराने उत्पादकों, उपभोक्ताओं और पारंपरिक रक्षा व्यवस्थाओं में बदलाव आ रहा है. ऐसे में ज्यादा स्मार्ट और नए तरीके की रक्षा व्यवस्था विकसित होगी.
स्पेस सेक्टर में भी सहयोग की संभावना
विदेश मंत्री ने अंतरिक्ष क्षेत्र में हुए तेज बदलावों का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि यह ऐसा क्षेत्र है, जहां उभरती और मिडिल पावर अर्थव्यवस्थाओं के बीच सहयोग की बड़ी संभावनाएं हैं. जयशंकर ने कहा कि दुनिया, उसका एजेंडा, वैश्विक परिदृश्य और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तेजी से बदल रही है. ऐसे में उभरती और मिडिल पावर अर्थव्यवस्थाओं के पास साथ मिलकर काम करने का एक बड़ा एजेंडा मौजूद है.