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कराची के बीचोंबीच वास्तुकला का शानदार नमूना है मोहट्टा पैलेस. जब क्लिफ्टन के समुद्री तट की ओर लोग जाते हैं तो उनको रंगीन कांच की खिड़कियां, शानदार सीढ़ियों और गुलाबी-पीले पत्थरों वाली एक पुरानी लेकिन बेहद खूबसूरत इमारत नजर आती है. जो भी कोई इसके आगे से गुजरता है, उसकी नजरें इसकी ओर जाती जरूर हैं.
2 करोड़ की आबादी वाले इस बड़े शहर में होने के बावजूद, यह महल एक शांत जगह है. यहां के बड़े से लॉन में मोर घूमते रहते हैं, और जैसे ही लोग इसके गेट के अंदर कदम रखते हैं, बाहर के ट्रैफिक का शोर सुनाई देना बंद हो जाता है.
मोहट्टा पैलेस को 1920 के दशक में एक बड़े हिंदू कारोबारी शिवरतन मोहट्टा ने बनवाया था. इसका नक्शा अहमद हुसैन आगा ने तैयार किया था. वह खासतौर से इसके लिए जयपुर से कराची आए थे. यह साल 1927 में बनकर तैयार हुआ था, जिसमें राजस्थानी और मुगल वास्तुकला की झलक दिखती है.
हालांकि, इसकी कहानी ताजमहल की भी याद दिलाती है. ताजमहल शाहजहां ने मुमताज के लिए बनवाया था, और मोहट्टा पैलैस को शिवरतन ने अपनी बीमार पत्नी को मरने से बचाने के लिए. डॉक्टरों ने कहा था कि उनकी पत्नी की बीमारी का इलाज सिर्फ शुद्ध हवा है. उनको ख्याल आया कि इसके लिए कराची के समुद्री तट से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती. उनका मानना था कि अरब सागर की हवा उनकी पत्नी की सेहत के लिए अच्छी रहेगी.
इसके बाद उन्होंने समुद्र के किनारे वास्तुकला का यह नायाब नमूना बनवाया. इस महल में इस्तेमाल किया गया खास गुलाबी पत्थर भारत के जोधपुर से मंगाया गया था. सैकड़ों गधों वाली गाड़ियों के जरिए इन पत्थरों को उस रास्ते से लाया गया था, जो आज भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा है.
मोहट्टा पैलेस की गुलाबी पत्थर की रेलिंग, गुंबद और मुंडेरे भारत के राजस्थान की वास्तुकला की याद दिलाती हैं. यह डिजाइन कराची के उस दौर के इतिहास को दर्शाता है, जब इस शहर में हिंदू और मुसलमान एक साथ रहते थे. आज, यह महल उस दौर की बची-खुची कुछ निशानियों में से एक है. AP की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कराची के तेजी से हो रहे विकास के कारण इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है.
इतनी भव्य इमारत होने के बावजूद, मोहट्टा पैलेस को अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. इसे गिराने या किसी और काम के लिए इस्तेमाल करने की कोशिशें बार-बार होती रही हैं. महल के ट्रस्टियों ने इस इमारत को डेंटल कॉलेज में बदलने की एक कोशिश को तो नाकाम कर दिया, लेकिन इसके मालिकाना हक को लेकर कानूनी लड़ाई अभी भी चल रही है, क्योंकि पुराने मालिक के वारिस इस संपत्ति पर अपना कंट्रोल चाहते हैं.
मोहट्टा पैलेस कराची के 'ओल्ड क्लिफ्टन' इलाके में है, जो एक बहुत ही बेहतरीन जगह है. यह इलाका आलीशान बंगले, महंगे रेस्तरां और बड़े कारोबारों से घिरा हुआ है. इस प्राइम लोकेशन की वजह से यह महल डेवलपर्स की नजरों में है.
कराची की आबादी हर साल लगभग 2% की दर से बढ़ रही है, जिससे शहर में भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है. जगह की कमी और शहर में रहने वाले अलग-अलग समुदायों की वजह से, ऐतिहासिक स्थलों को बचाने में जनता और सरकार की दिलचस्पी काफी कम हो गई है. कराची की मिली-जुली संस्कृति के कारण, यहां विरासत संरक्षण को तवज्जो देने के लिए स्थानीय स्तर पर लोगों का समर्थन जुटाना मुश्किल हो जाता है.
लाहौर जैसे शहरों में लोगों का मुगल-कालीन वास्तुकला से गहरा जुड़ाव है, लेकिन यह स्थिति कराची में नहीं है.
1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद, इस महल का इस्तेमाल कुछ वक्त के लिए पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने किया था. बाद में, यह पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की बहन, फातिमा जिन्ना यहां रहने लगीं. कुछ वक्त के लिए इसे तब 'कस्र-ए-फातिमा' भी कहा गया. फातिमा जिन्ना खुद भी एक जानी-मानी राजनीतिक हस्ती थीं, और इस महल से उनके जुड़ाव ने इसकी अहमियत और बढ़ा दी. उनके निधन के बाद, महल का मालिकाना हक उनकी बहन शिरीन के पास चला गया. लेकिन 1980 में शिरीन के निधन के बाद, इस संपत्ति को लेकर अदालती विवाद शुरू हो गया, जिसके चलते महल को कई सालों के लिए सील कर दिया गया.
जब तक यह महल खाली पड़ा रहा, इसके बेतरतीब ढंग से बढ़े हुए बगीचों और बंद दरवाजों को लेकर भूतों और अलौकिक घटनाओं की अफवाहें फैलने लगीं. नसरीन असकरी इस महल में बने म्यूजियम की डायरेक्टर हैं. उन्होंने कहा, बचपन में मैंने भी ऐसी कहानियां सुनी थीं. उन्होंने कहा, 'बचपन में मैं यहां से तेजी से गुजर जाती थी. मुझे बताया गया था कि यह एक 'भूत बंगला' है और मुझे वहां न जाने की चेतावनी दी गई थी.' इन स्थानीय कहानियों ने महल के रहस्य को और गहरा कर दिया.
महल के बारे में कई कहानियां प्रचलित हैं. कहा जाता है कि जब इस महल को रेनोवेट किया जा रहा था, तब मजदूर इसमें देर रात तक काम करते थे. लेकिन मजदूरों को जो महसूस हुआ, उस पर किसी ने यकीन नहीं किया. कुछ मजदूरों का दावा था कि महल में जो लाइट्स लगी हैं, वह उनको चलती हुई नजर आती हैं. मगर, महल में तो कोई होता भी नहीं था.
पैलेस की सिक्योरिटी में लगे गार्ड्स का कहना है कि अंग्रेजों के जमाने से ही इस महल में भूतों का डेरा है. उनका दावा है कि महल के अंदर उनको कोई शख्स चलता हुआ नजर आता है. यह भी दावा किया गया कि महल की चीजों की जगह सुबह के वक्त बदली हुई मिलती थी.
मोहट्टा पैलेस आज एक म्यूजियम है, लेकिन एंट्री टिकट से होने वाली कमाई बहुत कम है. आम लोगों के लिए टिकट की कीमत सिर्फ 30 पाकिस्तानी रुपये है, जबकि छात्रों, बच्चों और बुजुर्गों के लिए एंट्री पूरी तरह फ्री है. महल अपना खर्च चलाने के लिए कॉर्पोरेट और चैरिटी प्रोग्रामों के आयोजन पर निर्भर है. हालांकि, स्थानीय निवासियों ने इस पर चिंता जताई है. उनका अक्सर यह कहना होता है कि इन प्रोग्राम्स की वजह से शोर-शराबा होता है और ट्रैफिक बढ़ जाता है.
आय कमाने की संभावना होने के बावजूद, महल के ट्रस्टियों ने कुछ एक्टिविटीज पर रोक लगा रखी है. उदाहरण के लिए, यहां फैशन शूट, शादियां और कमर्शियल फिल्मों की शूटिंग करना मना है. नसरीन असकरी ने इसका कारण बताते हुए कहा, 'हम यहां से बहुत पैसा कमा सकते थे, लेकिन फिर तो कार्यक्रमों की बाढ़ आ जाती.' उन्होंने बताया कि अगर ऐसा होता, तो महल पूरी तरह से कार्यक्रमों से भर जाता और एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में इसके असली मकसद के लिए बहुत कम जगह बचती.