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वैज्ञानिकों ने हमारे सौरमंडल की ऐसी आउटर लिमिट यानी बाहरी सीमा पर कुछ ऐसा खोज निकाला है, जिसे देखकर अच्छे-अच्छे एस्ट्रोनॉमर्स के होश उड़ गए हैं. प्लूटो से भी कोसों दूर एक नया संभावित बौना ग्रह (Dwarf Planet) हाथ लगा है, जिसे फिलहाल साइंटिस्ट्स ने 'ED138' नाम दिया है. मजे की बात तो यह है कि इसकी तलाश चिली के पहाड़ों पर बैठे दुनिया के सबसे तगड़े डिजिटल कैमरे ने की है.
क्या है यह नया मेहमान ED138?
वैज्ञानिकों ने हमारी पृथ्वी और सूरज के बीच की दूरी से लगभग 46 गुना ज्यादा दूर एक भारी-भरकम ऑब्जेक्ट को ट्रैक किया है. स्पेस की भाषा में इसे 'ट्रांस-नेप्च्यूनियन ऑब्जेक्ट' यानी TNO कहा जाता है. इसका सीधा मतलब यह है कि यह एक ऐसी खगोलीय चीज है जो नेप्च्यून ग्रह के भी पार रहकर सूरज का चक्कर काट रही है.
शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, ED138 का व्यास (Diameter) लगभग 600 से 1,500 किलोमीटर के बीच हो सकता है. अगर यह अनुमान सही साबित होता है, तो यह हमारे मान्यता प्राप्त सबसे छोटे बौने ग्रह 'सिरस' (Ceres) से भी काफी बड़ा होगा. हालांकि, यह आकार में प्लूटो से थोड़ा छोटा है, लेकिन यह इतना बड़ा जरूर है कि वैज्ञानिक इसे एक पूरी की पूरी 'नई दुनिया' के रूप में देखने लगे हैं.
चिली के पहाड़ से हुई इतिहास की सबसे बड़ी खोज
इस ऐतिहासिक खोज का श्रेय जाता है चिली में 2,682 मीटर ऊंचे पहाड़ पर बनी 'वेरा सी. रुबिन ऑब्जर्वेटरी' (Vera C. Rubin Observatory) को. इस वेधशाला में दुनिया का सबसे बड़ा और शक्तिशाली डिजिटल कैमरा लगा हुआ है. साल 2025 से पूरी तरह एक्टिव हुए इस टेलीस्कोप की खासियत यह है कि यह महज तीन दिनों के अंदर पूरे रात के आसमान की हाई-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें खींच सकता है.
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक और स्मिथसोनियन के सीनियर एस्ट्रोफिजिसिस्ट मैथ्यू होल्मन (Matthew Holman) जब 2026 के शुरुआती डेटा को एक खास कंप्यूटर प्रोग्राम से स्कैन कर रहे थे, तो अचानक ED138 स्क्रीन पर उभर आया. होल्मन बताते हैं कि जब उन्होंने पहली बार इसे देखा, तो उन्हें अपनी ही आंखों पर भरोसा नहीं हुआ. उन्हें लगा शायद कंप्यूटर कोड में कोई गड़बड़ी या एरर आ गया है. लेकिन जब वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मारियो जुरिक के साथ मिलकर पुराने कैटलॉग खंगाले गए, तो मार्च 2026 तक की 20 और तस्वीरें मिल गईं. यहां तक कि पिछले 10 सालों के डेटा को मिलाकर इसके ऑर्बिट (कक्षा) का पूरा मैप तैयार कर लिया गया.
आखिर इतने सालों तक नजरों से क्यों छिपा रहा ED138?
अब आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि जब यह ऑब्जेक्ट इतना बड़ा है, तो आज तक हमारे बड़े-बड़े टेलीस्कोप्स की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी? इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हैं.
पहला कारण यह है कि ED138 दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) के आसमान में स्थित है. दुनिया के ज्यादातर बड़े टेलीस्कोप्स उत्तरी गोलार्ध में लगे हुए हैं, जहां से आकाश के इस हिस्से को देख पाना लगभग नामुमकिन था.
दूसरा और सबसे दिलचस्प कारण यह है कि पिछले 20 सालों से यह पिंड हमारी आकाशगंगा (Milky Way) के बिल्कुल सामने से होकर गुजर रहा था. आकाशगंगा में अनगिनत तारों की रोशनी होती है. जब कोई ऑब्जेक्ट इतने सारे चमकते तारों के बीच से धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, तो वैज्ञानिकों के लिए उसे पहचान पाना वैसा ही होता है जैसे जलते हुए बल्बों के बीच एक छोटे से जुगनू को ढूंढना.
क्या इसे आधिकारिक तौर पर 'बौना ग्रह' मान लिया गया है?
ठहरिए! अभी ED138 को आधिकारिक तौर पर 'ड्वार्फ प्लैनेट' का दर्जा नहीं मिला है. वैज्ञानिक मैथ्यू होल्मन के मुताबिक, फिलहाल यह सिर्फ एक 'कैंडिडेट' यानी उम्मीदवार है. अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) द्वारा इसे बौना ग्रह घोषित करने के लिए पहले इसके सटीक आकार और मास (द्रव्यमान) की पुष्टि करनी होगी, जिसमें कुछ महीनों का समय लग सकता है.
अगर IAU इसे अपनी मंजूरी दे देता है, तो यह Ceres, Pluto, Haumea, Makemake और Eris के बाद हमारी लिस्ट में जुड़ने वाला छठा मान्यता प्राप्त बौना ग्रह बन जाएगा.
प्लूटो की यादें और 2006 का वो विवादित फैसला
जब भी किसी नए बौने ग्रह की बात होती है, तो हमारे जेहन में प्लूटो का नाम जरूर आता है. साल 2006 में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने ग्रह (Planet) की परिभाषा को बदल दिया था. नई परिभाषा के अनुसार, किसी पिंड को ग्रह कहलाने के लिए तीन शर्तें पूरी करनी होती हैं:
वह सूरज का चक्कर लगाता हो.
उसका आकार लगभग गोल हो.
उसने अपनी कक्षा (Orbit) के आसपास का इलाका बाकी मलबे से साफ कर लिया हो.
प्लूटो तीसरी शर्त पर खरा नहीं उतरा था, जिसकी वजह से उससे ग्रह का दर्जा छीनकर उसे 'बौना ग्रह' बना दिया गया था. इसके बाद हमारे सौरमंडल में 9 की जगह सिर्फ 8 मुख्य ग्रह रह गए थे. अब ED138 भी उसी प्लूटो की बिरादरी का हिस्सा बनने जा रहा है.