धरती से 700 किमी नीचे छिपा है 'विशाल महासागर'? वैज्ञानिकों को मिले पुख्ता सबूत; खोज से दुनिया हैरान!
धरती की सतह से करीब 700 किलोमीटर नीचे की गहराई में वैज्ञानिकों को एक विशाल जल भंडार के संकेत मिले हैं. जानिए रिंगवुडाइट मिनरल में छपे इस 'छिपे महासागर' से जुड़ी ताजा वैज्ञानिक रिसर्च और इसके मायने.
हम सब जानते हैं कि पानी जिंदगी के लिए बहुत जरूरी है. पर क्या आप जानते हैं कि यह हमारी जमीन के बेहद नीचे छुपा बैठकर भी बड़ा कमाल कर रहा है? यह पृथ्वी के अंदर मौजूद चट्टानों की परतों (मेंटल) को धीरे-धीरे खिसकने में मदद करता है. इसी हलचल से हमारी धरती का मौसम और तापमान लंबे समय तक संतुलित रहता है. वैज्ञानिक हमेशा से यह सोचकर हैरान थे कि आखिर इतना गहरा पानी कहां छुपा है और वहां पहुंचा कैसे?
कुछ लोग मानते थे कि अंतरिक्ष से गिरे उल्कापिंड पानी लाए, तो कुछ का सोचना था कि शुरुआत में सूखी पड़ी जमीन बाद में गीली हुई. हाल ही में 'नेचर जियोसाइंस' में छपी एक नई स्टडी ने इस राज से पर्दा उठाया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पानी जमीन से करीब 660 से 2,900 किलोमीटर नीचे छुपा है. यह जगह धरती के मेंटल और कोर (केंद्र) के ठीक बीच की सीमा है. यहां कुछ बेहद अजीब हिस्से हैं, जो वैज्ञानिकों को सालों से उलझा रहे थे.
लैब में बनाया धरती के अंदर जैसा माहौल
जमीन के इतने नीचे की ज्यादातर चट्टानें और खनिज सूखे माने जाते हैं. इसलिए रिसर्च टीम ने एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया. उन्होंने हीरों की नोक के बीच सैंपलों को दबाया और लेजर से बहुत तेज गर्म किया. इस तरह उन्होंने लैब में ही धरती की गहराई जैसा भारी दबाव और भीषण गर्मी पैदा कर दी.
दो नए खनिजों की खोज
इस प्रयोग में वैज्ञानिकों को दो नए खनिज मिले, जिन्हें 'आयरन ऑक्सीहाइड्रॉक्साइड' कहा जा रहा है. ये खनिज अपने अंदर बहुत सारा पानी सोखकर रख सकते हैं. हैरानी की बात यह है कि जहां पानी की मात्रा 0.1 प्रतिशत से भी कम थी, वहां भी ये खनिज बन गए. ये इतने भारी और मजबूत हैं कि धरती के शुरुआती दौर में जब लावे का समुद्र ठंडा हो रहा था, तब ये नीचे जाकर बैठ गए होंगे.
क्या यह पानी कभी बाहर आएगा?
यह पानी हमेशा के लिए नीचे बंद नहीं रहेगा. जब अंदर का पदार्थ धीरे-धीरे ऊपर आता है और दबाव कम होता है, तो ये खनिज टूटने लगते हैं. इनसे निकलने वाला पानी ज्वालामुखियों के जरिए फिर से सतह पर आ सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस खोज से यह समझने में बड़ी मदद मिलेगी कि हमारी धरती पर पानी कैसे आया और इतने सालों तक अंदर कैसे बचा रहा.