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सीवेज कचरा अब केवल गंदगी या सिरदर्द नहीं, बल्कि मजबूत इमारतें बनाने का जरिया बनेगा. भारत और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने मानव अपशिष्ट (ह्यूमन वेस्ट) को सुरक्षित बायोचार में बदलकर एक खास कंक्रीट तैयार किया है, जो सामान्य सीमेंट से कहीं ज्यादा मजबूत और टिकाऊ साबित हुआ है. यह अनोखी तकनीक न सिर्फ निर्माण जगत को मजबूती देगी, बल्कि शहरों में सीवेज निपटारे और सीमेंट उद्योग से होने वाले प्रदूषण की समस्या को भी एक साथ हल करेगी.
यह स्टडी 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' जर्नल में छपी है. इसे जयपुर की मणिपाल यूनिवर्सिटी और अमेरिका की लुइसियाना टेक यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर तैयार किया है. इस रिसर्च का नेतृत्व जयपुर की मणिपाल यूनिवर्सिटी के सिविल इंजीनियर रघुवेश तिवारी ने किया. उनकी टीम ने तेलंगाना के वारंगल स्थित एक सीवेज प्लांट से मानव अपशिष्ट लिया और उससे 'बायोचार' तैयार किया. बायोचार कार्बन से भरपूर एक खास पदार्थ होता है, इसे बनाने के लिए कचरे को बहुत कम ऑक्सीजन की मौजूदगी में तेज आंच पर पकाया जाता है.
कंक्रीट क्यों है जरूरी?
मकान और इमारतें बनाने के लिए कंक्रीट सबसे जरूरी चीज है. कंक्रीट बनाने में मुख्य रूप से सीमेंट का इस्तेमाल होता है, लेकिन दिक्कत यह है कि जब सीमेंट तैयार किया जाता है, तो बहुत भारी मात्रा में जहरीली गैस (कार्बन डाइऑक्साइड या CO2) निकलती है, जिससे हवा प्रदूषित होती है और गर्मी (ग्लोबल वार्मिंग) बढ़ती है. यही वजह है कि वैज्ञानिक अब सीमेंट की जगह ऐसे नए विकल्प तलाश रहे हैं, जो इमारतों को मजबूती भी दें और जिनसे पर्यावरण को कोई नुकसान भी न पहुंचे.
सीवेज कचरे से तैयार बायोचार क्या फायदा देगा?
दरअसल, सीमेंट बनाने से दुनिया भर में बहुत ज्यादा प्रदूषण फैलता है. ऐसे में अगर सीवेज कचरे से बना बायोचार सिर्फ 5% से 10% सीमेंट की जगह भी ले ले, तो दो बड़े फायदे होंगे. पहला, शहरों में सीवेज और गंदगी के निपटारे का रास्ता साफ होगा. दूसरा, मकान और इमारतें बनाने के लिए एक मजबूत और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प मिल जाएगा.
मल और कचरे से कैसे तैयार हुआ कंक्रीट? 4 प्वाइंट में प्रोसेस समझिए
1. कलेक्शन और सुखाना: वैज्ञानिकों ने तेलंगाना के वारंगल स्थित एक सीवेज प्लांट से मानव अपशिष्ट (स्लज) लिया. इसे पहले खुली हवा में सुखाया गया. इसके बाद 105 डिग्री सेल्सियस तापमान पर 24 घंटे तक ओवन में रखकर पूरी तरह नमी खत्म की गई.
2. पायरोलिसिस (तेज आंच पर पकाना): सूखे कचरे को एक विशेष भट्टी में रखा गया. वहां बहुत कम ऑक्सीजन के बीच इसे 350 से 450 डिग्री सेल्सियस तापमान पर दो घंटे तक गर्म किया गया.
3. बायोचार तैयार होना: इस हीटिंग प्रोसेस से कचरा कार्बन से भरपूर एक सुरक्षित पदार्थ में बदल गया, जिसे 'बायोचार' कहते हैं.
4. पीसना और मिलाना: आखिर में इस बायोचार को बारीक पीसकर छान लिया गया. फिर इसे सीमेंट के एक सुरक्षित विकल्प के तौर पर कंक्रीट में मिलाया गया.
5% से 10% का सही संतुलन: समय के साथ बढ़ती गई मजबूती
वैज्ञानिकों ने सीमेंट की जगह 5%, 10% और 15% बायोचार मिलाकर अलग-अलग दिनों तक कंक्रीट की मजबूती परखी तो नतीजे चौंकाने वाले मिले. कंक्रीट में 5% बायोचार मिलाने पर 91 दिनों में दबाव सहने की ताकत 20% और मुड़ने की मजबूती 36% बढ़ गई. वहीं, जब 10% बायोचार मिलाया गया, तो मुड़ने की ताकत 42% और दबाव सहने की क्षमता 21% तक बढ़ गई. यानी यह कंक्रीट सामान्य सीमेंट वाले कंक्रीट से काफी मजबूत साबित हुआ.
15% पर क्यों आई गिरावट?
बायोचार की मात्रा बढ़ाकर 15% करते ही कंक्रीट कमजोर होने लगा. वजह यह रही कि सीमेंट बहुत कम होने से कंक्रीट को बांधकर मजबूत रखने वाले रासायनिक तत्व ठीक से नहीं बन पाए.
बायोचार से क्यों मजबूत बनता है कंक्रीट?
वैज्ञानिकों ने इसके पीछे मुख्य रूप से 3 तकनीकी कारणों की पहचान की है.
1. अंदर से सूखने नहीं देता (इंटरनल क्यूरिंग): बायोचार में बहुत बारीक छेद होते हैं. यह 60% से ज्यादा पानी सोख सकता है. कंक्रीट के भीतर यह पानी के छोटे टैंक की तरह काम करता है. कंक्रीट सूखने के दौरान यह धीरे-धीरे अंदर से पानी छोड़ता रहता है, जिससे कंक्रीट लगातार मजबूत होता है.
2. सीमेंट के साथ पक्की पकड़: बायोचार में सिलिका और एल्यूमीनियम जैसे तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं. ये सीमेंट के साथ मिलकर एक खास रासायनिक बंधन (C-S-H) बनाते हैं, यही बंधन कंक्रीट की असली ताकत की रीढ़ माना जाता है.
3. लीकेज और दरारें रोके: बायोचार के बारीक कण कंक्रीट के अंदर मौजूद नन्हे छेदों और खाली जगहों को पूरी तरह भर देते हैं, इससे कंक्रीट बेहद ठोस हो जाता है और उसमें पानी का रिसाव रुक जाता है.
जहरीली धातुओं को भीतर ही कर लेता है कैद
मानव मल से जुड़े होने के कारण वैज्ञानिकों ने इसमें जहरीली धातुओं (हैवी मेटल्स) की खास जांच की. परीक्षण में सामने आया कि कंक्रीट बनने के बाद इन धातुओं का बाहर रिसाव लगभग खत्म हो गया.
पारे (मर्करी) में भारी गिरावट: कच्चे बायोचार में पारे की मात्रा काफी अधिक (45.4 ppb) थी. कंक्रीट बनते ही 5% मिश्रण में यह घटकर सिर्फ 5.09 ppb रह गई, यानी 85% से ज्यादा पारा कंक्रीट के भीतर ही दब गया.
जिंक और मैंगनीज भी बेअसर: इसी तरह जिंक और मैंगनीज जैसी हानिकारक धातुओं के स्तर में भी भारी कमी दर्ज की गई.
अंदर कैसे हो जाता है लॉक: सीमेंट और बायोचार का मिश्रण ऐसा मजबूत रासायनिक ढांचा बनाता है, जो इन सभी जहरीली धातुओं को सोखकर अपने भीतर पूरी तरह 'लॉक' कर लेता है. इससे पर्यावरण या इंसानों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता.
अब आगे क्या चुनौतियां हैं?
यह रिसर्च बेहद उम्मीद जगाती है, लेकिन बड़े पैमाने पर आम निर्माण में इसे इस्तेमाल करने से पहले कुछ व्यावहारिक रुकावटें हल करनी होंगी.
1. कंक्रीट जल्दी सख्त होना: बायोचार पानी बहुत तेजी से सोखता है. इस वजह से ताजा कंक्रीट जल्दी सख्त हो जाता है और उसे मनचाहे आकार में ढालना थोड़ा कठिन हो सकता है.
2. ज्यादा मिलाने पर कमजोरी: कंक्रीट में सीमेंट की जगह बायोचार का इस्तेमाल केवल 5% से 10% तक ही सही बैठता है. 15% होते ही कंक्रीट कमजोर पड़ने लगता है, यानी सीमेंट को बहुत ज्यादा नहीं घटाया जा सकता.
3. हर शहर के कचरे में फर्क: यह प्रयोग अभी सिर्फ तेलंगाना के वारंगल के सीवेज कचरे पर हुआ है, देश और दुनिया के अलग-अलग इलाकों में खान-पान और पानी अलग होने से कचरे की बनावट और गुण बदल सकते हैं. इसलिए अभी अलग-अलग जगहों के कचरे पर टेस्ट होना बाकी है.
4. मौसम और टिकाऊपन की परीक्षा: वैज्ञानिकों को अभी यह परखना बाकी है कि कड़ाके की ठंड, तेज गर्मी और बारिश जैसे मौसम में यह कितना टिकेगा. इसके अलावा यह पूरी तरह तय करना होगा कि वर्षों बाद भी कोई जहरीला तत्व जमीन के अंदर न पहुंचे.
5. भारी खर्च और बड़े प्लांट: भारी मात्रा में सीवेज कचरे को 450 डिग्री सेल्सियस तक पकाने के लिए बड़े प्लांट, भारी बिजली-ईंधन और बड़े निवेश की जरूरत होगी.
वैज्ञानिकों के सामने क्या सवाल है?
शोधकर्ताओं का कहना है कि असली इमारतों में इसका इस्तेमाल करने से पहले कुछ और टेस्ट जरूरी हैं. यह देखना होगा कि कड़ाके की ठंड, तेज गर्मी और नमकीन पानी में यह कंक्रीट कैसा टिकता है. इसके अलावा, यह भी पक्का करना होगा कि सीवेज से बनी इस सामग्री से जहरीली धातुएं बाहर रिसने न लगें.