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हाल में इस्लामिक देश अजरबैजान की सरकार ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने एक नए विवाद को जन्म दे दिया है. अजरबैजान में हिजाब से जुड़ा विवाद बढ़ गया है. सरकार ने हाल में ही शिक्षकों के कपड़े को लेकर नए नियम लागू किए हैं.
शिक्षिकाओं का कहना है कि स्कूलों के प्रिंसिपल ने उन्हें अपना हिजाब हटाने या फिर नौकरी से इस्तीफा देने को कहा गया है. सरकारी स्कूलों में कपड़े 'धर्मनिरपेक्षता' (सभी धर्मों से समान दूरी) के सिद्धांत के अनुसार होने चाहिए. हालांकि, सरकार के इस नियम का विरोध शुरू हो गया है.
पिछले महीने स्कूलों में छात्राओं के लिए हिजाब को लेकर लगाए गए नियमों के खिलाफ स्कूली बच्चों की ओर से प्रदर्शन किया गया. सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है, जिसमें देखा जा सकता है कि स्कूली छात्र-छात्राएं स्कूलों के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं. बता दें कि इस प्रदर्शन में वो शिक्षिकाएं भी शामिल हुईं, जिन्हें हिजाब के कारण स्कूलों में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है. ऐसे में माना जा रहा है कि अजरबैजान में हिजाब को लेकर कथित पाबंदियों के खिलाफ अब एक बड़ा प्रदर्शन रूप ले सकता है.
अल-जजीरा की एक रिपोर्ट में कहा गया कि इससे पहले सितंबर के महीने में छात्र-छात्रों के लिए भी एक ड्रेस कोड लागू किया गया था. इस नए नियम के कारण हिजाब पहनने वाली छात्राओं को स्कूल के गेट से ही वापस भेज दिया गया था. इसके कुछ दिन बाद यानी 6 अक्टूबर को अजरबैजान के मंत्रिमंडल ने नया प्रस्ताव रखा, जिसके तहत सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को लिए कपड़ों को लेकर नए नियम तय किए गए. इसके तहत शिक्षकों के कपड़े शिक्षा के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के अनुरूप होने चाहिए.
बता दें कि अजरबैजान का संविधान देश को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र मानता है. यहां की करीब एक करोड़ की आबादी में अधिकांश लोग शिया मुस्लिम हैं. इससे पहले साल 2010 में भी स्कूलों में हिजाब को लेकर ऐसा ही प्रतिबंध लगा था. इस कारण देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए थे. अब नए नियमों का विरोध करने वाले एक धर्मशास्त्री, अबगुल सुलेमानोव को सितंबर में 30 दिनों की जेल की सजा सुनाई गई है.
अल जजीरा की की एक रिपोर्ट के अनुसार, अजरबैजान के इस फैसले में तुर्किये की भी एंट्री हो चुकी है. बताया जा रहा है कि छात्रों को स्कूल से वापस लौटाए जाने की खबरों के बाद वहां पर विरोध प्रदर्शन हुए और सोशल मीडिया पर भी कड़ा अभियान चलाया गया. कुछ तुर्किये के अखबारों ने इस आदेश की तुलना साल 1997 में तुर्किये में लगाए गए प्रतिबंधों से की है.
बता दें कि साल 1997 में सेना के दखल के बाद तुर्किये में हिजाब पहनने वाली महिलाओं को कई सालों तक विश्वविद्यालयों और सरकारी नौकरियों से दूर रखा गया था. गत 23 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में तुर्किये के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी. इस दौरान उन्होंने किसी भी देश का नाम लिए बगैर कहा कि कुछ देशों की ओर से स्कूलों में हिजाब में प्रतिबंध लगाना महिलाओं के अधिकारों पर हमला है.