समंदर के सीने में सुपरकंप्यूटर: AI की भारी मांग के बीच चीन ने पानी के नीचे उतारा डेटा सेंटर, जानिए क्या है नया गेमप्लान
AI क्रांति के बीच ऊर्जा संकट और कूलिंग की चुनौती से निपटने के लिए चीन ने समंदर में उतारा अंडरवाटर डेटा सेंटर. जानिए बीजिंग का नया हाई-टेक गेमप्लान.
चीन ने शंघाई के तट से दूर समुद्र के भीतर एक कमर्शियल डेटा सेंटर शुरू किया है. करीब 2,000 सर्वर समुद्र की तलहटी में लगाए गए हैं और इन्हें सीधे समुद्र में लगे विंड फार्म से बिजली मिल रही है. करीब 24 मेगावाट क्षमता वाला यह सेंटर समुद्र की सतह से 10 मीटर नीचे और तट से 10 किलोमीटर से ज्यादा दूर है. इसकी सबसे खास बात इसका कूलिंग सिस्टम है. सर्वरों को ठंडा रखने के लिए पारंपरिक चिलर या कूलिंग टावर की जगह आसपास के समुद्री पानी का इस्तेमाल किया जाता है.
इस प्रोजेक्ट पर करीब 1.6 अरब युआन यानी लगभग 2,100 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. इसे हाईक्लाउड टेक्नोलॉजी और सरकारी कंपनी चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन ने मिलकर तैयार किया है. फरवरी में इसका ट्रायल शुरू हुआ था और अक्टूबर 2025 में निर्माण पूरा हो गया था. मई 2026 से इसने कमर्शियल स्तर पर काम शुरू कर दिया.
माइक्रोसॉफ्ट ने की थी सबसे चर्चित शुरुआत
समुद्र के भीतर डेटा सेंटर लगाने का विचार नया नहीं है. इसकी सबसे चर्चित शुरुआत माइक्रोसॉफ्ट ने की थी. 2018 में माइक्रोसॉफ्ट ने स्कॉटलैंड के ऑर्कनी द्वीप समूह के पास उत्तरी सागर में एक स्टील का सिलेंडर समुद्र के अंदर उतारा था. यह करीब 117 फीट की गहराई में लगाया गया था और इसमें 855 सर्वर थे. इसमें 27.6 पेटाबाइट स्टोरेज मौजूद था. सिलेंडर के अंदर से हवा निकालकर उसकी जगह सूखी नाइट्रोजन गैस भरी गई थी. इसका मकसद अंदर मौजूद उपकरणों को नमी और ऑक्सीकरण से बचाना था. दो साल बाद माइक्रोसॉफ्ट ने इस मॉड्यूल को समुद्र से बाहर निकाला. कंपनी को इसके नतीजे उम्मीद से बेहतर मिले, लेकिन बाद में उसने इस तकनीक को आगे बढ़ाने का फैसला नहीं किया.
समुद्र के अंदर सर्वर ज्यादा टिके
Microsoft के प्रयोग में सबसे ज्यादा ध्यान सर्वरों की खराबी के आंकड़ों ने खींचा. समुद्र के अंदर लगाए गए 855 सर्वरों में सिर्फ 6 खराब हुए. वहीं जमीन पर रखे गए समान काम करने वाले 135 सर्वरों में 8 खराब हो गए. यानी समुद्र के अंदर खराबी की दर करीब 0.7 प्रतिशत रही, जबकि जमीन पर यह 5.9 प्रतिशत थी. इसके पीछे दो बड़े कारण माने गए. पहला, समुद्र का ठंडा पानी सर्वरों से निकलने वाली गर्मी को आसानी से सोख लेता है. दूसरा, सीलबंद मॉड्यूल के अंदर इंसानों की आवाजाही नहीं होती और नाइट्रोजन से भरा वातावरण उपकरणों को नमी और धीरे-धीरे होने वाले क्षरण से बचाता है. इस प्रयोग में Power Usage Effectiveness यानी PUE करीब 1.07 रही. खास बात यह थी कि इसके लिए किसी मैकेनिकल कूलिंग सिस्टम की जरूरत नहीं पड़ी.
चीन का सेंटर सीधे AI के काम आ रहा है
शंघाई के पास लगाया गया चीनी डेटा सेंटर सिर्फ प्रयोग के लिए नहीं है. यहां GPU क्लस्टर लगाए गए हैं, जिनका इस्तेमाल AI ट्रेनिंग, बड़े डेटा की प्रोसेसिंग और घरेलू लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स पर काम करने में किया जा रहा है. चाइना टेलिकॉम और स्थानीय सर्विस प्रोवाइडर इसकी कंप्यूटिंग क्षमता का इस्तेमाल कर रहे हैं. डेवलपर्स के मुताबिक, इस सेंटर का PUE करीब 1.15 है. उनका दावा है कि इससे बिजली की खपत में 22.8 प्रतिशत तक कमी आती है. इसके अलावा जमीन पर बनने वाले समान डेटा सेंटर की तुलना में करीब 90 प्रतिशत कम जमीन की जरूरत पड़ती है. चीन का कहना है कि इस प्रोजेक्ट को 95 प्रतिशत से ज्यादा ग्रीन बिजली पर चलाने की योजना है. हाईक्लाउड ने 2021 में हैनान के पास समुद्र में सर्वर लगाने का काम शुरू किया था. 2023 में वहां शुरुआती कमर्शियल मॉड्यूल लगाए गए. कंपनी अब इसी मॉडल को बढ़ाकर 500 मेगावाट तक ले जाने की संभावना पर भी काम कर रही है.
कूलिंग के लिए न पानी खर्च होगा, न जमीन ज्यादा लगेगी
AI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ डेटा सेंटर की बिजली और पानी की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है. जमीन पर बने डेटा सेंटर में बिजली का बड़ा हिस्सा सर्वरों को ठंडा रखने में खर्च होता है. जैसे-जैसे AI के लिए इस्तेमाल होने वाले GPU की संख्या और क्षमता बढ़ रही है, वैसे-वैसे कूलिंग की चुनौती भी बड़ी होती जा रही है. समुद्र के भीतर बना डेटा सेंटर इस समस्या का एक अलग रास्ता दिखाता है. समुद्र सर्वरों की गर्मी सोख लेता है और ऊपर लगे विंड टर्बाइन बिजली उपलब्ध कराते हैं. इसमें ताजे पानी की जरूरत भी नहीं पड़ती. संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय से जुड़े एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि 2030 तक डेटा सेंटर का पानी का इस्तेमाल 9.3 ट्रिलियन लीटर तक पहुंच सकता है.
समुद्री जीवन पर असर को लेकर निगरानी जरूरी
समुद्र के अंदर डेटा सेंटर लगाने का सवाल सिर्फ बिजली और कूलिंग तक सीमित नहीं है. इसका असर समुद्री पर्यावरण पर भी पड़ सकता है. समुद्री जीवों पर अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, मॉड्यूल के आसपास पानी का तापमान बढ़ सकता है और समुद्र की तलहटी में मौजूद तलछट भी प्रभावित हो सकती है. हालांकि शुरुआती आकलन में इन प्रभावों को सीमित बताया गया है, लेकिन लंबे समय तक निगरानी जरूरी होगी. Microsoft के पुराने प्रयोग से एक दिलचस्प बात भी सामने आई थी. जब उसका मॉड्यूल समुद्र से बाहर निकाला गया तो उस पर शैवाल, बार्नेकल्स और समुद्री एनीमोन जम चुके थे. यानी कुछ समय बाद वह मॉड्यूल समुद्री वातावरण का हिस्सा जैसा दिखने लगा था.
माइक्रोसॉफ्ट ने तकनीक क्यों छोड़ी
समुद्र के नीचे डेटा सेंटर के आंकड़े अच्छे होने के बावजूद माइक्रोसॉफ्ट ने इस दिशा में आगे नहीं बढ़ने का फैसला किया. कंपनी ने 2024 में पुष्टि की कि उसका समुद्र के नीचे डेटा सेंटर कार्यक्रम खत्म हो चुका है. कंपनी की क्लाउड ऑपरेशंस और इनोवेशन टीम की प्रमुख नोएल वॉल्श ने कहा था कि माइक्रोसॉफ्ट दुनिया में कहीं भी समुद्र के नीचे डेटा सेंटर बनाने की योजना नहीं बना रहा. इसका कारण तकनीक की नाकामी नहीं था. असली समस्या ऑपरेशन और रखरखाव की थी. अगर समुद्र के अंदर किसी सर्वर या बोर्ड में खराबी आती है तो वहां तकनीशियन भेजना जमीन पर मौजूद डेटा सेंटर की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल और महंगा होगा. समुद्री पानी से धातु के क्षरण का खतरा भी बना रहता है. दूसरी तरफ माइक्रोसॉफ्ट जमीन पर डेटा सेंटर का नेटवर्क तेजी से बढ़ा रहा था. ऐसे में कंपनी के लिए उसी मॉडल पर निवेश जारी रखना ज्यादा आसान था.
चीन ने प्रयोग को कमर्शियल मॉडल में बदला
माइक्रोसॉफ्ट ने समुद्र के अंदर डेटा सेंटर की तकनीक का शुरुआती प्रदर्शन किया. चीन अब उसी विचार को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है. चीन के पास एक तरफ AI के लिए लगातार बढ़ती कंप्यूटिंग जरूरत है, तो दूसरी तरफ समुद्री इंजीनियरिंग और सरकारी स्तर पर मजबूत समर्थन. यही वजह है कि जिस तकनीक को माइक्रोसॉफ्ट ने प्रयोग के बाद छोड़ दिया, चीन उसे कमर्शियल स्तर पर आगे बढ़ा रहा है. AI डेटा सेंटर की दुनिया में बिजली, कूलिंग और पानी की बढ़ती जरूरत के बीच समुद्र के अंदर बने ये सेंटर आने वाले वर्षों में एक अहम विकल्प बन सकते हैं. लेकिन इनकी असली कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि लंबे समय तक इनकी लागत, रखरखाव और समुद्री पर्यावरण पर असर कितना नियंत्रित रहता है.