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यूरोप के 4 मुल्कों की एक ही हुंकार, भारत को दो वीटो का अधिकार; 'चौकड़ी' के समर्थन से हिले चीन-पाक

UNSC के लिए भारत का दावा और मजबूत हुआ है. यूरोप के 4 देशों ने परमानेंट सीट के लिए भारत का समर्थन किया है. लेकिन भारत को परमानेंट सीट मिलने के मायने क्या हैं, पी5 की दिक्कतें क्या हैं, चलिए समझते हैं.

Written By Rachit Kumar
Published: Sep 22, 2026, 08:21 AM IST | Updated: Sep 22, 2026, 08:35 AM IST
Image Credit: यूरोप के 4 देशों का समर्थन भारत के लिए बेहद अहम है.
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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी यूएनएससी में परमानेंट सीट की दावेदारी के लिए भारत की कोशिशों को और ज्यादा पुश मिला है. भारत की दावेदारी को मध्य यूरोप के चार देशों का सामूहिक समर्थन मिला है. इससे UN में सुधार की दशकों पुरानी मांग को नई राजनीतिक ताकत मिली है.

न्यूयॉर्क में 81वीं UN महासभा के दौरान हुई पहली V4-भारत बैठक में विसेग्राड समूह (Visegrad Group) के चार सदस्यों - हंगरी, पोलैंड, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य - ने भारत के लिए अपना समर्थन दिया है. यकीनन चीन और पाकिस्तान के लिए यह बड़ा झटका है.

विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के बाद स्लोवाकिया के विदेश मंत्री जुराज ब्लानार ने कहा, 'V4 देशों के तौर पर हम सभी इस बात से सहमत हैं कि 'ग्लोबल साउथ' का हिस्सा और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उभरती महाशक्ति होने के नाते, भारत को UN सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर वहां शामिल होना चाहिए.'

UNSC में स्थायी सीट क्यों चाहता है भारत?

भारत के अभियान के पीछे का तर्क सीधा है कि सुरक्षा परिषद के गठन के बाद से दुनिया बदल गई है, लेकिन इसकी स्थायी सदस्यता में कोई बदलाव नहीं हुआ है. 1945 में, एशिया और अफ्रीका का बड़ा हिस्सा औपनिवेशिक शासन के अधीन था. कई देश जिनकी आबादी, अर्थव्यवस्था और राजनयिक प्रभाव आज काफी ज्यादा है, वे या तो स्वतंत्र नहीं थे या संप्रभु देशों के रूप में उनका अस्तित्व ही नहीं था.

भारत आठ बार सुरक्षा परिषद का निर्वाचित सदस्य रह चुका है, जिसमें हाल ही में 2021 और 2022 का कार्यकाल शामिल है.

इस दावे के पीछे कई कारण हैं जैसे भारत की आबादी, आर्थिक ताकत, UN शांति अभियानों में योगदान और बढ़ता राजनयिक प्रभाव. भारत ने आतंकवाद के खिलाफ उपायों, विकास, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय शांति पर चर्चाओं में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है.

81वीं UN महासभा के लिए भारत के प्राथमिकता पत्र में तर्क दिया गया है कि संघर्षों पर प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया देने में UN की नाकाबिलियत ने इसकी 'प्रभावशीलता, विश्वसनीयता और वैधता' पर सवाल खड़े किए हैं. इसलिए, सुरक्षा परिषद में सुधार का मतलब सिर्फ भारत को स्थायी सदस्यता दिलाना नहीं है.

इसका मकसद दुनिया की सबसे ताकतवर मल्टीलेटरल सिक्योरिटी ऑर्गनाइजेशन के ढांचे में बदलाव करना है ताकि वह आज की दुनिया की बेहतर तस्वीर पेश कर सके.

कोशिशों में अकेला नहीं भारत

भारत के अभियान को खुद UN सुरक्षा परिषद के कई सदस्यों का समर्थन मिला है.
फ्रांस ने लगातार भारत के दावे का समर्थन किया है. यूनाइटेड किंगडम भी विस्तारित सुरक्षा परिषद में भारत को शामिल करने का समर्थन कर चुका है. अमेरिका ने सैद्धांतिक रूप से भारत की स्थायी सदस्यता का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया है, जबकि रूस ने भी भारत की दावेदारी का समर्थन किया है. भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ G4 ग्रुप का भी हिस्सा है.

ये चारों देश स्थायी सदस्यता के लिए एक-दूसरे की दावेदारी का समर्थन करते हैं और बातचीत के दौरान अपने रुख में तालमेल बिठाते हैं. G4 ने सुरक्षा परिषद के सदस्यों की मौजूदा संख्या 15 से बढ़ाकर 25 या 26 करने का प्रस्ताव दिया है.

इसके प्रस्तावित मॉडल के तहत, छह नई स्थायी सीटें बनाई जाएंगी. दो अफ्रीका के लिए, दो एशिया-पैसिफिक क्षेत्र के लिए, एक लैटिन अमेरिका और कैरिबियन के लिए और एक पश्चिमी यूरोप और अन्य देशों के लिए. इस प्रस्ताव में चार या पांच एक्स्ट्रा अस्थायी सीटें भी शामिल हैं.

तो आखिर P5 की समस्या क्या है?

UNSC के 5 स्थायी सदस्य यानी अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन परिषद के विस्तार के लिए किसी एक मॉडल पर सहमत नहीं हुए हैं. इस बात पर मतभेद हैं कि कितने देशों को शामिल किया जाना चाहिए, किन क्षेत्रों को सीटें मिलनी चाहिए, क्या नए स्थायी सदस्यों के पास वीटो पावर होनी चाहिए और विस्तार के बाद परिषद कैसे काम करेगी.

चीन, UN सुरक्षा परिषद का एकमात्र ऐसा स्थायी सदस्य है जो स्थायी सीट के लिए भारत की दावेदारी का खुलकर समर्थन नहीं कर रहा है. बीजिंग कूटनीतिक धुंधलेपन का इस्तेमाल करता है. वह कहता है कि वह भारत की ख्वाहिशों को समझता है और उनका सम्मान करता है, लेकिन साथ ही व्यापक सहमति की मांग करके इस दावेदारी को संरचनात्मक रूप से रोकता भी है.

यही वजह है कि भारत की स्थायी सदस्यता के लिए कूटनीतिक समर्थन का मतलब अपने आप सुरक्षा परिषद में सुधार के हर पहलू पर सहमति नहीं होता है. सबसे बड़ी रुकावट स्ट्रक्चर को लेकर ही है. सुधार के लिए UN चार्टर में संशोधन की जरूरत होगी, जिसका मतलब है कि इस प्रक्रिया के लिए बड़े स्तर पर समर्थन और साथ ही मौजूदा स्थायी सदस्यों के हितों का भी ध्यान रखना होगा.

फिर वीटो का मुद्दा भी है

सबसे बड़ा सवाल यह हो सकता है कि वीटो का क्या होगा. अभी, पांच स्थायी सदस्य सुरक्षा परिषद के अहम फैसलों को रोक सकते हैं. चुने हुए सदस्यों के पास यह अधिकार नहीं है. अफ्रीकी संघ का तर्क है कि आखिरकार वीटो खत्म हो जाना चाहिए. लेकिन जब तक यह मौजूद है, वह चाहता है कि नए स्थायी सदस्यों को भी मौजूदा P5 के समान अधिकार मिलें.

भारत ने भी अपनाया है यही रुख

अप्रैल 2026 के एक बयान में, भारत ने कहा कि स्थायी सदस्यों की कोई अलग कैटेगरी नहीं हो सकती, जिसमें कुछ देशों के पास वीटो अधिकार हों और दूसरों के पास न हों. भारत ने 'सब या कोई नहीं' वाले नजरिये का समर्थन किया है, जिसके तहत मौजूदा और नए स्थायी सदस्यों के पास समान विशेषाधिकार और जिम्मेदारियां होंगी.

भारत के लिए नया डिप्लोमैटिक मोर्चा

V4 की बैठक ने मिडिल यूरोप के चार देशों के साथ भारत के संबंधों में एक नए चैप्टर का आगाज किया. जयशंकर ने इसे एक 'नया ऐतिहासिक मौका' बताया. जयशंकर ने कहा, 'हमारी पहली विसेग्राद फोर और भारत की बैठक हुई. एक तरह से, यह एक नया ऐतिहासिक मौका था.मैं आज हमें एक साथ लाने के लिए मंत्री जुराज (स्लोवाकिया के विदेश मंत्री) का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं. यह बहुत ही फायदेमंद मीटिंग थी.

यह मीटिंग सिर्फ सुरक्षा परिषद के बारे में नहीं थी. भारत और V4 देश एक बड़े संस्थागत रिश्ते को आगे बढ़ाने पर सहमत हुए, जिसमें सालाना बिजनेस फोरम और विदेश मंत्रियों के बीच नियमित बैठकें शामिल हैं.

जयशंकर ने कहा,'हमने इस बात पर सहमति जताई कि चूंकि यूरोपीय संघ के साथ भारत के रिश्ते गहरे हो रहे हैं, इसलिए V4 के साथ हम एक सालाना बिजनेस फोरम बनाने के लिए कुछ खास पहल करेंगे. विदेश मंत्रियों के तौर पर हम हर साल मिलेंगे. यही आम सहमति थी.' इसके अलावा रक्षा, अंतरिक्ष, कनेक्टिविटी और लोगों के बीच आपसी संबंधों के साथ-साथ टेक्नोलॉजी और इनोवेशन पर भी चर्चा हुई. मंत्रियों ने यूक्रेन संकट और खाड़ी क्षेत्र में हो रहे घटनाक्रमों सहित बड़े वैश्विक संकटों पर भी अपने विचार साझा किए.

V4 के समर्थन का क्या मतलब है?

V4 का समर्थन अपने आप में सुरक्षा परिषद में सुधार की गारंटी नहीं है. यह प्रक्रिया कई देशों और सबसे अहम बात, मौजूदा स्थायी सदस्यों के साथ बातचीत से जुड़ी हुई है. लेकिन इससे भारत को देशों का एक और सामूहिक गुट मिल गया, जो उसकी स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन करता है. जयशंकर से यह भी पूछा गया कि क्या भारत के लिए V4 की बढ़ती अहमियत का कोई राजनीतिक पहलू है. इस पर उन्होंने कहा, 'V4 देशों के साथ हमारे बहुत अच्छे रिश्ते हैं, और हम जानते हैं कि ये देश बहुत मजबूत और खास क्षमताओं वाले हैं. ये औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएं हैं, जिनमें इनोवेशन और टेक्नोलॉजी का जबरदस्त टैलेंट है. और मुझे लगता है कि V4 कैसे एक साथ आते हैं, यह उन्हें तय करना है. लेकिन हम साथ काम करने के मौके का स्वागत करते हैं.'
 

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रचित कुमार जी न्यूज डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर हैं. देश, दुनिया और डिफेंस की खबरों को आसान भाषा में बताने में महारत हासिल है. जी न्यूज से मई 2022 में जुड़े और शिफ्ट देखने का 12 साल से ज्यादा का अनुभव है. जी न्यूज में Best Performer अवॉर्ड भी मिल चुका है. जी न्यूज, आजतक और एबीपी न्यूज में शिफ्ट देखते हुए महामहिम, बिहार के बाहुबली सीरीज शुरू की और कई एक्सप्लेनर खबरों पर काम किया.  इंडिया न्यूज और जनसत्ता में शिफ्ट देखने के साथ-साथ ट्रैफिक लाने वाली खबरों को तवज्जो दी. नवभारत टाइम्स से करियर की शुरुआत हुई और वहां तकरीबन ढाई साल तक फ्रंट पेज 2 और देश-विदेश के पन्नों की जिम्मेदारी संभाली. जर्नलिज्म में पोस्टग्रेजुएट और IIMC से डिप्लोमा करने  वाले रचित कुमार 13 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. आप Rachit.kumar@India.com पर सीधे ईमेल कर इनसे जुड़ सकते हैं. 
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