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Fairyland in Uttarakhand: जब बचपन में दादी-नानी परियों की कहानियां सुनाया करती थीं उड़ती हुई परियों, जादुई जंगलों और अलौकिक दुनिया के वो किस्से अक्सर हमें किसी सपनों के लोक में ले जाते थे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसी ही एक जादुई दुनिया सिर्फ कहानियों और किताबों तक सीमित नहीं है? आमतौर पर देवभूमि उत्तराखंड का जिक्र होते ही लोगों के जहन में नैनीताल की शांत वादियां, झीलें और मसूरी के खुशनुमा नजारे कौंधने लगते हैं. पर्यटक यहां सुकून की तलाश में खींचे चले आते हैं, लेकिन, नैनीताल की इस हसीन खूबसूरती से परे उत्तराखंड की वादियों में एक ऐसा रहस्यमयी ठिकाना भी है, जो किसी दादी-नानी के तिलिस्मी किस्से को सच कर दिखाता है.
हम बात कर रहे हैं टिहरी गढ़वाल में समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित 'खैट पर्वत' की, जिसे सदियों से 'परियों का देश' कहा जाता है. घने-भरे जंगलों, मखमली घास के मैदानों और चारों तरफ फैली धुंध के बीच यह जगह पहली ही नजर में किसी स्वर्ग जैसी महसूस होती है. स्थानीय लोग बताते हैं कि जिन परियों का जिक्र हम बचपन के किस्सों में सुना करते थे, वे आज भी इस पर्वत की हरियाली में अदृश्य रूप में रहती हैं.
9 आंछरियों का खौफनाक और सुंदर राज
गढ़वाली भाषा में परियों को 'आंछरी' कहा जाता है. स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, खैट पर्वत पर कुल 9 परियां रहती हैं. थात गांव के बुजुर्गों का मानना है कि ये परियां पिछले कई हजार सालों से उनके गांव की रक्षा कर रही हैं. कुछ ग्रामीणों का तो यहां तक दावा है कि उन्होंने इस पर्वत के निर्जन रास्तों पर परियों को इंसानी रूप में देखा भी है. एक लोककथा के मुताबिक, जीतू बगड़वाल नाम का एक बांसुरी वादक था. उसकी बांसुरी की मधुर धुन सुनकर परियां आकर्षित हुईं और वह रहस्यमय तरीके से गायब हो गया.
जन्नत जैसा नजारा, लेकिन कुदरत के अजीबो-गरीब नियम
खैट पर्वत पर चारों तरफ हरियाली की एक ऐसी चादर बिछी है जो किसी जन्नत से कम नहीं लगती. लेकिन यहां की सबसे अजीब बात यह है कि इस पर्वत पर अखरोट और लहसुन की खेती इंसानों को नहीं करनी पड़ती, वह अपने आप ही उग जाती है. चौंकाने वाली बात यह भी है कि अगर कोई इंसान खुद जाकर यहां पौधे लगाने की कोशिश करे, तो वह पौधा कुछ ही दिनों में सूखकर नष्ट हो जाता है. इतना ही नहीं, जहां आम तौर पर अनाज कूटने वाली ओखली समतल जमीन पर बनती है, वहीं खैट पर्वत पर ये ओखलियां सीधी चट्टानों और दीवारों पर उकेरी हुई मिलती हैं.
चटकीले कपड़ों और संगीत से नाराज हो जाती हैं परियां
थात गांव से महज 5 किलोमीटर की चढ़ाई पर 'खैटखाल मंदिर' है, जिसे परियों के मंदिर के रूप में पूजा जाता है. इस इलाके में जाने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए कुछ सख्त हिदायतें दी जाती हैं. मान्यता है कि यहां रहने वाली शक्तियों (परियों) को तेज संगीत, ढोल-नगाड़ों का शोर और लाल या चटकीले रंग के कपड़े बिल्कुल पसंद नहीं हैं. अगर कोई इन नियमों को तोड़ता है, तो उसके साथ अनहोनी की घटनाएं घटने लगती हैं.
जानिए खैट पर्वत से जुड़ी कहानी
सदियों पहले टिहरी गढ़वाल के चौदाण गांव में राजा आशा रावत का शासन था. संतान न होने से परेशान होकर उन्होंने थात गांव की 'देवा' से 7वां विवाह किया. शादी के बाद रानी देवा ने नौ बेटियों को जन्म दिया, जिनका नाम राजा ने कमला रौतेली, देवी रौतेली, आशा रौतेली, वासदेइ रौतेली, इगुला रौतेली, बिगुल रौतेली, सदेइ रौतेली, गरादुआ रौतेली और वरदेइ रौतेली रखा था. ये सभी बेहद सुंदर और अलौकिक प्रतिभा की धनी थीं.
जब सभी बहनें 12 साल की हुईं, तो एक रात उनके सपने में 'सेम नागराज' आए और उन्हें अपनी रानी बना लिया. अगली सुबह जब बहनें पानी भरने गईं, तो उन्होंने देखा कि उनके गांव में अंधेरा पसरा हुआ है. जबकि, सामने 'खैट पर्वत' पर धूप खिली हुई है. सूरज की धूप की तलाश में सभी बहनें खैट पर्वत की ओर बढ़ गईं और वहीं पहुंचकर हमेशा के लिए आंछरी (परियां) बन गईं.
स्थानीय मान्यता के अनुसार, ये आज भी खैट पर्वत पर परियां बनकर घूमती हैं. उत्तराखंड में कुल देवता की पूजा के दौरान गाए जाने वाले जागर और लोकगाथाओं में भी राजा आशा रावत की बेटियों के परी बनने की यह कहानी सुनाई जाती है.