हिमालय की 16,500 फीट ऊंची 'रहस्यमयी' झील, जहां बर्फ पिघलते ही तैरने लगते हैं सैकड़ों इंसानी कंकाल; जानें खौफनाक सच
Uttarakhand Skeletons Lake: उत्तराखंड का नाम सुनते ही सबसे पहले दिमाग में नैनीताल की शांत वादियां और झीलें आती हैं. 'झीलों का शहर' कहे जाने वाले नैनीताल में एक-दो नहीं बल्कि सात खूबसूरत झीलें हैं. चारों ओर ऊंचे पहाड़ों से घिरे इस शहर की खूबसूरती में ये झीलें चार चांद लगाती हैं, जिन्हें देखने हर साल लाखों पर्यटक खिंचे चले आते हैं, लेकिन देवभूमि सिर्फ इन हसीन नजारों तक सीमित नहीं है. इसी राज्य के सीने में एक ऐसी खौफनाक और रहस्यमयी झील भी दफन है, जहां जाने के नाम से भी लोगों की रूह कांप जाती है.
Uttarakhand Skeletons Lake: सन्नाटे को चीरती बर्फीली हवाएं, चारों तरफ बिछी सफेद चादर और समुद्र तल से 16,500 फीट की खौफनाक ऊंचाई... सुनने में यह भले ही किसी थ्रिलर फिल्म का मंजर लगे, लेकिन यह हकीकत है उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित 'रूपकुंड झील' की. नैनीताल की झीलों के पानी में जहां रंग-बिरंगी मछलियां तैरती नजर आती हैं, वहीं इस झील के बर्फीले पानी में मछलियां नहीं बल्कि इंसानी खोपड़ियां और कंकाल तैरते दिखाई देते हैं.
बर्फ पिघलते ही बाहर आता है सदियों पुराना राज
इस रहस्यमयी झील का खौफनाक सच दुनिया के सामने पहली बार साल 1942 में आया. जब एक ब्रिटिश फॉरेस्ट रेंजर गश्त करते हुए इस दुर्गम इलाके में पहुंचे, तो बर्फ पिघलने पर पानी में कंकालों का ढेर देखकर उनके होश उड़ गए. उस वक्त दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था. शुरुआती अंदेशा जताया गया कि ये शव जापानी सैनिकों का हो सकता है, जो भारत में घुसपैठ की कोशिश करते हुए ठंड से मर गए. हालांकि, जब ब्रिटिश सरकार ने वैज्ञानिकों की टीम भेजकर जांच कराई, तो पता चला कि ये हड्डियां जापानी सैनिकों की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी हैं.
देवी का श्राप या कोई भयानक आसमानी आपदा?
रूपकुंड के इस खौफनाक इतिहास को लेकर कई पौराणिक और स्थानीय लोकमान्यताओं के किस्से मशहूर हैं. सबसे लोकप्रिय कथा के मुताबिक, राजा जसधवल अपनी रानी और पूरे लाव-लश्कर के साथ पास स्थित नंदा देवी मंदिर के दर्शन के लिए निकले थे. पवित्र यात्रा के दौरान उनके आचरण से माता नंदा देवी क्रोधित हो गईं. माना जाता है कि देवी का गुस्सा आसमान से बिजली बनकर बरसा. जिससे पूरा का पूरा काफिला पल भर में मौत के मुंह में समा गया.
यह भी कहा जाता है कि कंकाल उन लोगों के हैं, जो किसी महामारी में एक साथ मारे गए. हालांकि, कुछ लोगों का मानना है कि ये सभी सेना के जवान रहे होंगे, जो बर्फ के तूफान में फंस गए और मारे गए. बर्फीले पानी ने उनके शरीर को सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रखा.
700 से ज्यादा कंकाल और अनसुलझा रहस्य
अब तक इस रहस्यमयी झील से 700 से 800 लोगों के अवशेष मिल चुके हैं. बर्फीले पानी और शून्य से नीचे के तापमान के कारण कई कंकालों पर आज भी बाल, मांस और चमड़ी संरक्षित मिलती है, जो देखने में बेहद खौफनाक लगती है. डीएनए टेस्ट और रिसर्च में यह साबित हुआ है कि ये कंकाल किसी एक घटना के नहीं हैं. इनमें भारत के साथ-साथ ग्रीस और साउथ ईस्ट एशिया के लोगों के भी हैं. जिनमें महिलाओं के कंकाल भी शामिल हैं. वैज्ञानिक मानते हैं कि अलग-अलग दौर में यहां से गुजरने वाले लोग बर्फीले तूफानों और आपदाओं की चपेट में आकर मौत के मुंह में समाते रहे.
कब करें रूपकुंड का सफर?
देवभूमि की यह खूबसूरत लेकिन रहस्यमयी झील आज भी अपने भीतर सदियों पुराने राज दफन किए हुए है. प्रकृति के इस अजूबे और इंसानी त्रासदियों के गवाह बने रूपकुंड को देखने हर साल कई ट्रेकर्स अपनी जान जोखिम में डालकर पहुंचते हैं. अगर आप भी ऐसे अनसुलझे रहस्यों और एडवेंचर के शौकीन हैं, तो मई का आखिरी सप्ताह और सितंबर से अक्टूबर के बीच का समय आपके लिए सबसे बेहतरीन है.