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देवरिया सदर में BJP की राह कितनी आसान? जानिए 2027 से पहले सीट का सियासी इतिहास और बड़े मुद्दे

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पूर्वांचल का अपना एक अलग ही रुतबा है. जब भी पूर्वांचल की हॉट सीटों की चर्चा होती है, देवरिया सदर विधानसभा सीट का नाम सबसे ऊपर आता है.

Written By Gunateet Ojha
Published: Nov 04, 2026, 05:58 PM IST | Updated: Nov 04, 2026, 06:11 PM IST
Image Credit: ZEE Creatives
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उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल की राजनीति का एक अलग ही इतिहास है. यह हमेशा से देश भर में चर्चा का विषय रही है. जब बात आती है देवरिया सदर विधानसभा सीट की तो सियासी पारा अपने आप हाई हो जाता है. आज हम आपको रूबरू कराएंगे यूपी की इस हॉट सीट के चुनावी माहौल से. आजादी से पहले 1946 में गोरखपुर से अलग होकर बने इस जिले के कण-कण में इतिहास और धार्मिक पहचान की खुशबू बसी है. कभी इस सीट पर कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था. पिछले कुछ चुनावों से यहां कमल लगातार खिल रहा है. अब नजरें टिकी हैं आने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव पर. जहां हर दल अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में जुटा है. आखिर क्या चल रहा है देवरिया सदर की गलियों में, विकास के दावों के बीच जनता कितनी खुश है और किस पार्टी का पलड़ा भारी है.. आइये जानते हैं इस खास रिपोर्ट में.

कांग्रेस के राज को भाजपा ने कैसे मिटाया?

अगर हम देवरिया सदर के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि यहां की जनता का मिजाज समझना कभी भी आसान नहीं रहा है. साल 1969 से लेकर 2012 तक का दौर ऐसा था जब यहां की जनता शायद ही किसी विधायक को दोबारा मौका देती थी. लगभग हर चुनाव में विधायक बदल जाता था या तो नेता पार्टी बदलकर जीतते थे या पार्टियां अपने उम्मीदवार बदल देती थीं. 1969 से पहले इस सीट पर पूरी तरह से कांग्रेस का कब्जा था. लगातार चार बार जनता ने कांग्रेस पर भरोसा जताया था. वहीं, 2012 के बाद से यहां की पूरी तस्वीर बदल चुकी है. यह सीट बीजेपी का मजबूत गढ़ बन चुकी है. मौजूदा समय में बीजेपी के शलभ मणि त्रिपाठी यहां से विधायक हैं. लगातार चार बार जीत दर्ज करके बीजेपी ने इस सीट पर अपनी पकड़ बेहद मजबूत कर ली है. सवाल यह उठ रहा है कि क्या 2027 में बीजेपी लगातार पांचवीं बार जीत हासिल करके कोई नया रिकॉर्ड बना पाएगी?

भाजपा बनाम विपक्ष की तैयारियां

2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सभी पार्टियों ने अपनी कमर कस ली है. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी के कई इलाकों में भाजपा का ग्राफ गिरा था. लेकिन देवरिया लोकसभा में फिर भी कमल ही खिला था. बीजेपी का दावा है कि जनता को उनके विकास कार्यों पर पूरा भरोसा है और इस बार भी जीत पक्की है. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन भी पूरी ताकत झोंक रहा है. अखिलेश यादव लगातार पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) और अन्य समीकरणों के जरिये जनता के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रहे हैं. सपा का कहना है कि अब हालात बदल चुके हैं और इस बार साइकिल की रफ्तार इतनी तेज होगी कि वह रेस में सबसे आगे निकल जाएगी. कांग्रेस की सक्रियता भी माहौल को और अधिक दिलचस्प बना रही है.

विकास के दावे बनाम जमीनी हकीकत और जनता के मुद्दे

नेता चाहे किसी भी पार्टी के हों.. दावे और वादे करना उनका पुराना स्वभाव है. बीजेपी का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि इलाके में चौतरफा विकास हुआ है. देवरिया से कसिया मार्ग, हाता मार्ग और रुद्रपुर मार्ग जैसी सड़कों को चौड़ा और मजबूत किया जा रहा है. इसके अलावा मेडिकल कॉलेज बनने से स्वास्थ्य सेवाओं में भी सुधार आया है. रेलवे स्टेशन का आधुनिकीकरण भी तेजी से चल रहा है. दूसरी तरफ विपक्ष और स्थानीय लोग कुछ और ही कहानी बयां करते हैं. लोगों का मानना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभी भी बहुत काम बाकी है. जिला अस्पताल की बदहाली और डॉक्टरों की कमी आम जनता के लिए बड़ी परेशानी बनी हुई है. इसके अलावा रोडवेज की खस्ता हालत और पिछले 10 सालों से बदहाल पड़ी व्यवस्था पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.

सबसे बड़े चुनावी मुद्दे

देवरिया के लोगों की सबसे बड़ी कसक यहां की बंद पड़ी चीनी मिलों को लेकर है. कभी चीनी के कटोरे के रूप में पहचान रखने वाले इस जिले में कई बड़ी चीनी मिलें आज बंद हो चुकी हैं. इसका सीधा असर गन्ना किसानों की आय और क्षेत्र के रोजगार पर पड़ा है. किसानों में इस बात को लेकर नाराजगी साफ देखी जा सकती है. इसके अलावा शहर में ट्रैफिक जाम, जल निकासी की समस्या, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं का अभाव 2027 के चुनाव में बहुत बड़ा मुद्दा बनने वाला है.

देवरिया सदर के जातीय समीकरण और मतदाता का मूड

किसी भी चुनाव में जातिगत आंकड़े बहुत बड़ा रोल निभाते हैं. देवरिया सदर विधानसभा सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या करीब 3,51,651 है, जिसमें पुरुष मतदाता 1,86,487 और महिला मतदाता 1,65,148 हैं, जबकि कुछ थर्ड जेंडर वोटर भी शामिल हैं. अगर जातिगत समीकरणों की बात करें तो इस सीट पर सवर्ण जातियों का दबदबा साफ नजर आता है. यहां ब्राह्मण मतदाता लगभग 18 प्रतिशत और वैश्य वोटर करीब 14 प्रतिशत हैं. इसके अलावा मुस्लिम मतदाता 9.5 प्रतिशत, यादव वोटर 8.8 प्रतिशत, अनुसूचित जाति के वोटर 8.8 प्रतिशत और क्षत्रिय मतदाता करीब 6.2 प्रतिशत हैं. कुल मिलाकर ब्राह्मण और वैश्य मतदाताओं की आबादी करीब 32 प्रतिशत है. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं कि सत्ता की चाबी किसके हाथ जाएगी.

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About the Author

गुणातीत ओझा ज़ी न्यूज डिजिटल में एसोसिएट न्यूज एडिटर हैं. वर्तमान में ज़ी न्यूज डिजिटल के उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड डिजिटल को लीड कर रहे हैं. वह दिसंबर 2021 में ज़ी न्यूज से जुड़े. देश-दुनिया और राजनीतिक खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं. 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. इससे पहले एनडीटीवी डिजिटल, लाइव हिन्दुस्तान डिजिटल, लोकमत डिजिटल, जागरण डॉट कॉम, राजस्थान पत्रिका डिजिटल, हिन्दुस्तान अखबार, दैनिक जागरण अखबार के साथ भी काम कर चुके हैं.
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