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UP Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण कभी सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं रहे. कई बार किसी समाज की संख्या से ज्यादा उसकी मौजूदगी और अलग-अलग सीटों पर उसका असर चुनाव की दिशा बदलता है. ब्राह्मण समाज को लेकर भी यही सवाल लंबे समय से उठता रहा है. अभी विधान परिषद की 11 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं. भाजपा ने इन 11 सीटों में पांच ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं. खास बात यह है कि ये पांचों प्रत्याशी शिक्षक एमएलसी सीटों पर उतारे गए हैं. इसके साथ ही एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण वोट किस तरफ जाएगा. लेकिन असली कहानी सिर्फ पांच उम्मीदवारों की नहीं है. असली सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण समाज आज किस तरह वोट करता है. क्या अब भी किसी एक पार्टी के साथ बड़ी संख्या में खड़ा है? या फिर उम्मीदवार, इलाका, नेतृत्व और स्थानीय मुद्दे उसके फैसले को बदलते हैं?
इन्हीं सवालों को समझने के लिए वरिष्ठ पत्रकार और लेखक डॉ. संजीव मिश्र से बातचीत की गई. उनके लंबे पत्रकारिता अनुभव और यूपी की राजनीति की गहरी समझ के आधार पर इस एक्सप्लेनर में ब्राह्मण वोट के बदलते राजनीतिक समीकरण को समझने की कोशिश की गई है. इसमें 2007 से 2024 तक की राजनीति के साथ विधानसभा में ब्राह्मण विधायकों की संख्या, अलग-अलग चुनावों में दलों को मिला समर्थन और उन सीटों का चुनावी इतिहास भी देखा गया है जहां ब्राह्मण मतदाता बड़ी संख्या में हैं.
सबसे पहले सवाल आबादी का है. उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की संख्या को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं. कुछ अध्ययनों में इसे करीब 10 फीसदी के आसपास माना गया है. राजनीतिक दल और ब्राह्मण संगठन इससे ज्यादा यानी करीब 10 से 14 फीसदी तक का दावा करते रहे हैं. इसका कोई तय सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है. लेकिन इतना साफ है कि राज्य की कई विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता चुनावी मुकाबले में असर डाल सकते हैं. इसीलिए ब्राह्मण राजनीति को सिर्फ यह कहकर नहीं समझा जा सकता कि राज्य में उनकी आबादी कितनी है. यह भी देखना होगा कि वे किन इलाकों में ज्यादा हैं और किन सीटों पर उनकी संख्या चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकती है.

ब्राह्मण वोट का सबसे बड़ा सवाल
...सवाल यह है कि क्या पूरे यूपी का ब्राह्मण एक ही तरह से वोट करता है? पिछले चुनावों के नतीजों में इसका सीधा जवाब नहीं मिलता. माना जाता है कि 2007 में ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा बसपा के साथ गया. तब बसपा की ओर से हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है, जैसा नारा भी दिया गया था। 2012 में सपा के ब्राह्मण विधायकों की संख्या बढ़ी. 2017 में तस्वीर पूरी तरह बदल गई और भाजपा के साथ ब्राह्मण प्रतिनिधित्व काफी बढ़ा. 2022 में भी विधानसभा पहुंचे 52 ब्राह्मण विधायकों में 46 भाजपा गठबंधन से थे. पांच सपा गठबंधन से और एक कांग्रेस से. चुनाव दर चुनाव तस्वीर बदलती रही है. इसलिए ब्राह्मण समाज को हमेशा एक ही पार्टी का वोट बैंक मानना सही नहीं हो सकता.
1980 से 2022 तक ब्राह्मण विधायक
1980 में यूपी विधानसभा में 87 ब्राह्मण विधायक चुने गए थे. 2002 में यह संख्या घटकर 41 रह गई. 2007 में 56 ब्राह्मण विधायक विधानसभा पहुंचे. 2012 में 47, 2017 में 58 और 2022 में 52 ब्राह्मण विधायक चुने गए. इन आंकड़ों से यह तस्वीर साफ है कि ब्राह्मण प्रतिनिधित्व में उतार-चढ़ाव जरूर आया लेकिन विधानसभा में यह समाज लगातार मौजूद रहा.

अब आते हैं 2007 पर
2007 का चुनाव ब्राह्मण राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना जाता है. मायावती ने दलित-ब्राह्मण समीकरण को सामने रखा. बसपा ने बड़ी संख्या में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे और 41 ब्राह्मण विधायक बसपा के टिकट पर जीते. उस समय 'हाथी नहीं गणेश हैं.. ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं' जैसे नारों के जरिए दोनों सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश हुई. बसपा को इसका चुनावी फायदा भी मिला और पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल रही. लेकिन यह समीकरण आगे उसी रूप में नहीं चल सका. 2012 में ब्राह्मण विधायकों की संख्या 47 रही और इनमें सबसे ज्यादा 21 सपा से जीते. भाजपा के छह और बसपा के 10 ब्राह्मण विधायक चुने गए. यहां भी यह स्पष्ट हो ता है कि ब्राह्मण वोट किसी एक पार्टी की स्थायी संपत्ति कभी नहीं रहा.

मंडल और कमंडल के बीच बदली राजनीति
ब्राह्मण राजनीति को मंडल और कमंडल के दौर से अलग करके समझना मुश्किल है. मंडल राजनीति के बाद पिछड़े वर्गों की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ी. इसी दौर में राम मंदिर आंदोलन ने हिंदुत्व की राजनीति को भी नई ताकत दी. इस बदलाव ने भाजपा के सामाजिक आधार को बढ़ाया. ब्राह्मण समाज के एक बड़े हिस्से का भाजपा के साथ जुड़ाव भी इसी लंबे राजनीतिक बदलाव के संदर्भ में देखा जाता है. लेकिन यहां भी सिर्फ धर्म की बात करना पूरी तस्वीर नहीं है. नेतृत्व, उम्मीदवार, सरकार का कामकाज और स्थानीय मुद्दे भी चुनावी पसंद को प्रभावित करते हैं.
2014 के बाद क्या बदला?
2014 के लोकसभा चुनाव के बाद यूपी की राजनीति में भाजपा का सामाजिक आधार काफी व्यापक हुआ. 2017 के विधानसभा चुनाव में भी ब्राह्मण समर्थन भाजपा के साथ मजबूत दिखाई दिया. लोकनीति-सीएसडीएस के आंकड़ों के आधार पर 2017 में करीब 80 फीसदी ब्राह्मण वोट भाजपा को जाने का अनुमान दिया गया था. 2014 में यह आंकड़ा करीब 72 फीसदी और 2019 में करीब 82 फीसदी बताया गया. 2022 के लिए भी सीएसडीएस-लोकनीति के एक विश्लेषण में 89 फीसदी ब्राह्मणों के भाजपा गठबंधन के पक्ष में मतदान का अनुमान दिया गया था. उसी विश्लेषण में सपा गठबंधन को करीब छह फीसदी ब्राह्मण समर्थन बताया गया. लेकिन इन आंकड़ों को पूरे समाज की स्थायी पसंद मानना ठीक नहीं होगा. ये चुनावी सर्वे के अनुमान हैं. हर सीट और हर इलाके की स्थिति अलग हो सकती है.

योगी सरकार और ब्राह्मणों में असंतोष की चर्चा
योगी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान ब्राह्मणों के बीच असंतोष की चर्चा भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी. खासकर 2020-21 में इस मुद्दे पर काफी चर्चा हुई. विपक्षी दलों ने इसे मुद्दा बनाया. भाजपा ने भी ब्राह्मणों तक पहुंच बढ़ाने के लिए अलग कोशिशें कीं. लेकिन इसके साथ चुनावी नतीजे भी देखने होंगे... 2022 में 52 ब्राह्मण विधायक चुने गए. इनमें 46 भाजपा गठबंधन से थे. यह आंकड़ा बताता है कि असंतोष की चर्चाओं के बावजूद विधानसभा में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व का बड़ा हिस्सा भाजपा गठबंधन के साथ गया. यानी जमीन पर कहानी सिर्फ असंतोष की नहीं थी. चुनावी नतीजों में समर्थन और प्रतिनिधित्व दोनों दिखाई दिए.
परशुराम से लेकर ब्राह्मण सम्मेलन तक
ब्राह्मणों तक पहुंच बनाने की कोशिश सिर्फ भाजपा ने नहीं की. सपा और बसपा ने भी समय-समय पर ब्राह्मण समाज को जोड़ने की कोशिश की. भगवान परशुराम को इसके लिए सामाजिक और राजनीतिक प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया गया. तो ये सवाल जरूर उठेगा कि क्या परशुराम की राजनीति वोट में बदली? बता दें कि 2007 में बसपा का दलित-ब्राह्मण प्रयोग सफल रहा था. लेकिन बाद के चुनावों में वही समीकरण दोहराया नहीं जा सका. इससे यह कहा जा सकता है कि किसी समाज के प्रतीक को सामने लाना और उस समाज का लंबे समय तक राजनीतिक समर्थन हासिल करना दो अलग बातें हैं.
ब्राह्मण उम्मीदवार और ब्राह्मण वोट एक ही बात नहीं
2027 के चुनाव में एक अहम सवाल यह होगा कि राजनीतिक दल कितने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारते हैं. लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह होगा कि वे उम्मीदवार किन सीटों पर उतारे जाते हैं. किसी सीट पर ब्राह्मण उम्मीदवार होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां का ब्राह्मण वोट उसी उम्मीदवार को जाएगा. स्थानीय पहचान, व्यक्तिगत पकड़, पार्टी की स्थिति और दूसरे जातीय समूहों के साथ रिश्ते भी मायने रखते हैं. यही वजह है कि 2027 के लिए सीटवार अध्ययन ज्यादा उपयोगी होगा.

27 प्रमुख सीटों को कैसे देखें?
जातीय आकलन और चुनावी रिपोर्टों के आधार पर कुछ सीटों को ब्राह्मण प्रभाव वाली प्रमुख सीटों के उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है. इनमें कानपुर की किदवई नगर, गोविंद नगर, कल्याणपुर, महाराजपुर और भोगनीपुर जैसी सीटें शामिल हैं. लखनऊ की सरोजनीनगर, लखनऊ मध्य, लखनऊ उत्तर और लखनऊ कैंट भी इस चर्चा में आती हैं. सीतापुर की सेवता और मिश्रिख, उन्नाव की उन्नाव और भगवंतनगर, बाराबंकी की हैदरगढ़ और रामनगर, गोंडा की गोंडा और गौरा तथा गोंडा-कैसरगंज इलाके की कुछ सीटों में भी ब्राह्मण मतदाताओं की अच्छी मौजूदगी के अनुमान मिलते हैं. पूर्वांचल में जौनपुर की बदलापुर और मुंगरा बादशाहपुर, गोरखपुर की चिल्लूपार और देवरिया क्षेत्र की कुछ सीटें भी राजनीतिक चर्चा में रही हैं. उपलब्ध सीटवार जातीय अध्ययन में इन इलाकों की कई सीटों पर ब्राह्मण मतदाताओं की अच्छी हिस्सेदारी के अनुमान दिए गए हैं. यहां चिल्लूपार खास सीट है. गोरखपुर की इस सीट पर लंबे समय तक हरिशंकर तिवारी का प्रभाव रहा था. 2022 के चुनाव से पहले भी ब्राह्मण मतदाताओं को यहां निर्णायक माना गया था.
| विधानसभा सीट | ब्राह्मण मतदाताओं का अनुमान |
|---|---|
| किदवई नगर | 45% के आसपास |
| महाराजपुर | 30% के आसपास |
| कल्याणपुर | 28% के आसपास |
| सेवता | 29% के आसपास |
| गौरा | 28% के आसपास |
| लखनऊ मध्य | 28% के आसपास |
| बदलापुर | 27% के आसपास |
| लखनऊ उत्तर | 26% के आसपास |
| भगवंतनगर | 25% के आसपास |
| सरोजनीनगर | 25% के आसपास |
| गोंडा | 24% के आसपास |
| हैदरगढ़ | 24% के आसपास |
| लखनऊ कैंट | 22% के आसपास |
| रामनगर | 21% के आसपास |
| मुंगरा बादशाहपुर | 20% के आसपास |
लखनऊ कैंट की अलग कहानी
लखनऊ कैंट की कहानी भी अलग है. इसे लंबे समय से ब्राह्मण प्रभाव वाली सीट माना जाता रहा है. 2012 में कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी यहां से जीती थीं. 2017 में भाजपा के टिकट पर उन्होंने फिर जीत दर्ज की. कानपुर की किदवई नगर में भी उपलब्ध जातीय आकलन ब्राह्मण मतदाताओं की बड़ी मौजूदगी दिखाते हैं. 2022 के एक सीटवार अध्ययन में यहां ब्राह्मण आबादी का अनुमान करीब 45 फीसदी लगाया गया था. कल्याणपुर में यह अनुमान करीब 28 फीसदी और महाराजपुर में करीब 30 फीसदी था. इसी तरह सीतापुर की सेवता में ब्राह्मण मतदाताओं का अनुमान करीब 29 फीसदी, गोंडा में करीब 24 फीसदी, गौरा में करीब 28 फीसदी और बाराबंकी की रामनगर सीट में करीब 21 फीसदी लगाया गया था.
इन सीटों का पिछले तीन चुनावों में क्या हुआ?
अब इन सीटों की असली राजनीतिक कहानी सिर्फ जातीय आंकड़ों से नहीं समझी जा सकती. पिछले तीन विधानसभा चुनाव यानी 2012, 2017 और 2022 के नतीजे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. कानपुर की किदवई नगर में 2017 और 2022 में भाजपा का प्रभाव मजबूत रहा. लखनऊ कैंट में भी 2012 में कांग्रेस और 2017 के बाद भाजपा की स्थिति सामने आई. अयोध्या में 2012 में सपा जीती लेकिन 2017 और 2022 में भाजपा ने सीट अपने नाम की. 2017 में भाजपा की जीत का अंतर 50,440 वोट था जो 2022 में घटकर 19,990 रह गया. जौनपुर की बदलापुर सीट इससे अलग तस्वीर दिखाती है. 2012 में यहां सपा के ओम प्रकाश दुबे जीते. 2017 और 2022 में भाजपा के रमेश चंद्र मिश्र ने सीट जीती. 2022 में जीत का अंतर सिर्फ 1,326 वोट रहा. यानी ब्राह्मण प्रभाव वाली सीट पर भी चुनाव हर बार एकतरफा नहीं रहा.
रानीगंज की कहानी भी यही बताती है. 2012 में सपा के शिवाकांत ओझा जीते. 2017 में भाजपा के धीरज ओझा जीते. 2022 में सपा ने उम्मीदवार बदलकर ओबीसी चेहरे को मैदान में उतारा जबकि भाजपा ने ब्राह्मण विधायक धीरज ओझा पर भरोसा किया. यानी सीट का सामाजिक समीकरण महत्वपूर्ण है लेकिन उम्मीदवार भी तस्वीर बदल सकता है. 2012 में सपा ने 224 सीटें जीतकर सरकार बनाई. भाजपा 47 सीटों पर रही. 2017 में भाजपा ने 312 सीटें जीतकर बड़ी बहुमत की सरकार बनाई. 2022 में भाजपा 255 सीटों के साथ फिर सत्ता में लौटी जबकि सपा 111 सीटों पर रही. लेकिन 2012 में ब्राह्मण विधायकों की सबसे बड़ी संख्या सपा के पास थी. 2017 में भाजपा के पास 46 ब्राह्मण विधायक पहुंचे. 2022 में भाजपा गठबंधन के पास 46 ब्राह्मण विधायक रहे. यही बदलाव ब्राह्मण राजनीति की सबसे दिलचस्प कहानी बयां करता है.
युवा और पुरानी पीढ़ी का फर्क
एक और सवाल अब पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण है. क्या युवा ब्राह्मण उसी तरह वोट करते हैं जैसे पुरानी पीढ़ी करती रही है? रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएं, कारोबार और सोशल मीडिया जैसे मुद्दे युवा मतदाताओं के लिए अहम हो सकते हैं. दूसरी तरफ पुरानी पीढ़ी के राजनीतिक अनुभव और पारंपरिक जुड़ाव अलग हो सकते हैं. इसलिए 2027 में ब्राह्मण वोट को समझने के लिए सिर्फ जाति का आंकड़ा काफी नहीं होगा. उम्र, इलाका और मुद्दा भी देखना होगा.
सोशल मीडिया ने भी बदली कहानी
ब्राह्मण समाज को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार बहस होती है. कभी प्रतिनिधित्व का सवाल उठता है. कभी राजनीतिक हिस्सेदारी का... कभी किसी सरकार से नाराजगी की चर्चा होती है तो कभी किसी पार्टी के समर्थन की. लेकिन सोशल मीडिया पर चल रही चर्चा को पूरे समाज की राय नहीं माना जा सकता. असली तस्वीर चुनावी आंकड़ों और जमीन पर हुए मतदान से ही समझी जा सकती है.
राम मंदिर कितना बड़ा मुद्दा?
राम मंदिर आंदोलन और अयोध्या में मंदिर निर्माण भाजपा की राजनीति का बड़ा हिस्सा रहा है. ब्राह्मण समाज के संदर्भ में भी धार्मिक मुद्दों की भूमिका पर चर्चा होती है. लेकिन क्या सिर्फ राम मंदिर से ब्राह्मण वोट तय होता है? इसका जवाब पिछले चुनावों में पूरी तरह हां या ना में नहीं मिलता. धार्मिक मुद्दों के साथ नेतृत्व, सरकार का कामकाज, उम्मीदवार और स्थानीय सवाल भी मौजूद रहे हैं. यही वजह है कि 2027 में भी सिर्फ धार्मिक मुद्दे देखकर ब्राह्मण वोट का अनुमान लगाना मुश्किल होगा.
MLC चुनाव क्या संकेत दे रहा है?
अब वापस आते हैं विधान परिषद चुनाव पर. 11 सीटों के चुनाव में भाजपा ने पांच ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं. यह जरूर दर्शाता है कि पार्टी ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मान रही है. लेकिन विधान परिषद की इन सीटों का चुनाव विधानसभा से अलग मतदाता वर्ग के बीच होता है. इसलिए इसे 2027 के विधानसभा चुनाव का सीधा नमूना मानना सही नहीं होगा. फिर भी यह चुनाव एक राजनीतिक संकेत जरूर देता है. ब्राह्मण प्रतिनिधित्व और इस समाज तक पहुंच बनाने की कोशिश अभी भी यूपी की चुनावी राजनीति का हिस्सा है.

2027 में असली परीक्षा कहां होगी?
2027 के चुनाव में तीन चीजें सबसे ज्यादा देखने लायक होंगी. पहली.. राजनीतिक दल कितने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारते हैं. दूसरी.. वे उम्मीदवार किन सीटों पर उतारे जाते हैं. तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात जिन सीटों पर ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या ज्यादा है वहां पिछले तीन चुनावों के मुकाबले वोट किस दिशा में जाता है. क्योंकि एक बात पिछले चुनावों से साफ है. ब्राह्मण विधायक अलग-अलग दलों से जीतते रहे हैं. 2007 में बसपा के 41 ब्राह्मण विधायक चुने गए. 2012 में सपा के 21 ब्राह्मण विधायक रहे. 2017 में भाजपा के 46 ब्राह्मण विधायक जीते. 2022 में भी भाजपा गठबंधन के 46 ब्राह्मण विधायक विधानसभा पहुंचे.
तो क्या ब्राह्मण वोट अब भी वोट बैंक है?
एक तरफ पिछले तीन विधानसभा चुनावों और 2014 के बाद के चुनावों में भाजपा को ब्राह्मणों का मजबूत समर्थन दिखाई देता है. दूसरी तरफ 2007 और 2012 यह बताते हैं कि जरूरत पड़ने पर ब्राह्मण वोट का बड़ा हिस्सा दूसरी पार्टियों के साथ भी जा सकता है. इसलिए तस्वीर शायद इतनी सीधी नहीं है कि ब्राह्मण वोट हमेशा से एक ही पार्टी का रहा है. बल्कि पिछले दो दशक की राजनीति एक लंबा बदलाव दिखाती है. कांग्रेस से दूरी. मंडल के बाद नई राजनीति. राम मंदिर आंदोलन और 2007 का बसपा प्रयोग. 2014 के बाद भाजपा का बड़ा सामाजिक गठबंधन. 2017 की बड़ी भाजपा जीत. 2022 में भाजपा गठबंधन के साथ 46 ब्राह्मण विधायक. और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद नए सवाल. अब 2026 का विधान परिषद चुनाव इस कहानी का नया अध्याय है. 2027 में यह देखना ज्यादा दिलचस्प होगा कि ब्राह्मण समाज सिर्फ जातीय पहचान के आधार पर मतदान करता है या उम्मीदवार, नेतृत्व, स्थानीय मुद्दे और सरकार के कामकाज को भी उतनी ही अहमियत देता है.
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि यूपी में ब्राह्मण कितने हैं. असली सवाल यह है कि वे किन सीटों पर कितने असरदार हैं, किस उम्मीदवार के साथ जाते हैं और चुनाव दर चुनाव उनकी राजनीतिक पसंद कैसे बदलती है. यही 2027 के यूपी चुनाव में ब्राह्मण वोट की असली कहानी तय करेगा.

(बेस्टसेलिंग पुस्तक ‘बवाली कनपुरिया’ के लेखक डॉ. संजीव मिश्र पत्रकारिता से लेखन की दुनिया में आए अनुभवी लेखक हैं. उन्हें पत्रकारिता और लेखन का 30 से अधिक वर्षों का अनुभव है. उन्होंने स्वतंत्र भारत, आज, दैनिक जागरण, नेशनल दुनिया, हरिभूमि और राजस्थान पत्रिका जैसे प्रमुख समाचार समूहों में संवाददाता से संपादक तक काम किया है. वे देश के प्रमुख अखबारों और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित लेखन करते रहे हैं और उनकी कहानियां भी प्रकाशित हुई हैं. डॉ. मिश्र को कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की क्लाइमेट चेंज फेलोशिप समेत कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप मिल चुकी हैं. उन्होंने ‘टाटा स्टोरीज़’, ‘ऑफिस सीक्रेट्स’, ‘काम ज्यादा बातें कम’ और ‘जमशेदजी टाटा’ जैसी चर्चित पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद भी किया है. पत्रकारिता के लंबे अनुभव और साहित्यिक लेखन ने उन्हें हिंदी मीडिया और साहित्य जगत में अलग पहचान दिलाई है.)