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साइकिल छोड़ कमल संग बागी: यूपी चुनाव से पहले बीजेपी में 'अंदरूनी सिरदर्द', अवध से बुंदेलखंड तक उलझे चुनावी समीकरण

UP Assembly Election 2027: यूपी विधानसभा चुनाव से पहले सपा के तीन बागी विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया है. गौरीगंज के राकेश प्रताप सिंह, गोसाईगंज के अभय सिंह और कालपी के विनोद चतुर्वेदी को भगवा पटका पहनाने से पार्टी के स्थानीय समीकरण उलझ सकते हैं. तीनों सीटों पर भाजपा से टिकट पाने की अभिलाषा में वर्षों से पसीना बहा रहे कार्यकर्ताओं की डगर कठिन हो गई है.

Written ByPooja Singh
Published: Oct 15, 2026, 12:16 PM IST|Updated: Oct 15, 2026, 12:20 PM IST
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साइकिल छोड़ कमल संग बागी: यूपी चुनाव से पहले बीजेपी में 'अंदरूनी सिरदर्द', अवध से बुंदेलखंड तक उलझे चुनावी समीकरण

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Pooja Singh

Pooja Singh

पूजा सिंह डिजिटल पत्रकार हैं और ज़ी उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड (Zee UP-UK) की डिजिटल टीम में सब-एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. दिल्ली से ताल्लुक रखने वाली पूजा को मीडिया जगत में 5 वर्षों से ज्यादा का अनुभव है. वे उत्तर प्रदेश की हाइपर-लोकल खबरों, क्राइम, प्रशासनिक गतिविधियों, राजनीतिक उठापटक और खेल जगत के मुद्दों पर पैनी नजर रखते हैं. खबरों की गहराई, ग्राउंड रियलिटी और तथ्य-आधारित डिजिटल कवरेज के लिए वे जाने जाते हैं.पूजा के पास डेस्क एडिटिंग का व्यावहारिक अनुभव है.  स्थानीय प्रशासन, जनसमस्याओं और राजनीतिक हलचलों की बेहतर समझ उन्हें ज़मीनी वास्तविकताओं को सटीक रूप से प्रस्तुत करने में मदद करती है. ज़ी मीडिया से पहले उन्होंने भारत के लिडिंग हिंदी न्यूज़ चैनल टीवी 9 डिजिटल और न्यूज नेशन में काम करने का अनुभव है. पूजा ने भारतीय विद्या भवन से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की है.पूजा सिंह से आप pooja.singh@india.com पर सीधे ईमेल कर संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप पूजा से एक्स (ट्विटर) और लिंक्डइन पर कनेक्ट कर सकते हैं.
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UP Assembly Election 2027/ विशाल रघुवंशी: जहां एक तरफ यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सुगबुगाहट होने लगी है, वहीं दूसरी तरफ दलबदल का खेल भी परवान चढ़ने लगा है. समाजवादी पार्टी के तीन बागी विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया है. जो बागी बीजेपी में शामिल हुए हैं, उनमें गौरीगंज से राकेश प्रताप सिंह, गोसाईगंज से अभय सिंह और कालपी से विनोद चतुर्वेदी शामिल हैं.

ये तीनों अपने-अपने क्षेत्र के कद्दावर और जमीनी नेता माने जाती हैं. इनकी बगावत से अवध से लेकर बुंदेलखंड तक की कई सीटों का चुनावी गणित पूरी तरह हिल गया है.

कई विधानसभा सीटों के समीकरणों पर असर 
उधर, इन नेताओं के बीजेपी में आने से पार्टी के स्थानीय समीकरण उलझ सकते हैं. तीनों सीटों पर भाजपा से टिकट पाने की लालसा में सालों से पसीना बहा रहे कार्यकर्ताओं की राह मुश्किल हो गई है. वक्त की नजाकत भांपते हुए भाजपा के नाराज चेहरों पर सपा और कांग्रेस डोरे डाल सकती है. तीनों विधायकों के पाला बदलने से अंबेडकरनगर, अयोध्या, कानपुर, जालौन, उरई एवं अमेठी के आसपास कई विधानसभा सीटों के समीकरणों पर असर पड़ेगा.

अयोध्या में वर्चस्व की जंग 
अयोध्या की गोसाईगंज सीट से अभय सिंह ने 2022 में सपा के टिकट पर चुनाव लड़कर इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू की पत्नी आरती तिवारी को हराकर 2017 का बदला लिया था. 2017 के चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़कर खब्बू ने सपा के अभय सिंह को हराया था. अब अभय ने भाजपा का दामन थाम लिया है. दोनों के बीच लंबे समय से राजनीतिक ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अदावत भी रही है. ऐसे में दोनों को एक पाले में संभालना भाजपा के लिए कठिन होगा.

खब्बू तिवारी का दो जिलों की कई सीटों पर असर माना जाता है. वो सपा और बसपा के टिकट पर भी चुनाव लड़ चुके हैं. ऐसे में अन्य दल उनमें संभावनाएं तलाश सकते हैं.

क्या है गौरीगंज सीट का हाल?
गौरीगंज सीट से तीन बार सपा के टिकट पर विधायक चुने गए राकेश प्रताप सिंह ने 2022 में भाजपा के चंद्रप्रकाश मिश्र उर्फ मटियारी को हराया था. अब राकेश भी भाजपाई बन गए हैं. ऐसे में पार्टी के सामने दोनों के बीच संतुलन साधने की कड़ी परीक्षा है. यहां से मटियारी 2007 में बसपा के टिकट पर विधायक रह चुके हैं. विपक्ष नाराज चेहरों को टिकट का तोहफा देने की गुंजाइश तलाशेगी. यह सीट अमेठी संसदीय क्षेत्र में होने की वजह से विशेष राजनीतिक अहमियत रखती है.

चुनाव लड़ने की मंशा पाले कार्यकर्ताओं का मलाल
कालपी से सपा के टिकट पर विधायक बने विनोद चतुर्वेदी के भाजपाई बनने के बाद अब जालौन की कालपी और उरई विधानसभा क्षेत्रों के समीकरण बदलेंगे. यहां से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की मंशा पाले कार्यकर्ताओं का मलाल छलकने लगा है. चतुर्वेदी 2007 में कांग्रेस के टिकट पर उरई सदर सीट से विधायक रह चुके हैं. विपक्ष के लिए भी इन क्षेत्रों में नए सिरे से प्रत्याशी की तलाश के साथ संगठन को मजबूत रखने की भी चुनौती होगी.

फिलहाल बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन शामिल किए गए चेहरों को मौका देने पर नाराज होने वाले स्थानीय पुराने नेताओं को पार्टी में कैसे बरकरार रखा जा सकेगा.

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