यूपी 2027 की चुनावी जंग से पहले बीजेपी प्रदेश में अपनी सियासी जमीन का हिसाब-किताब करने में जुटी है. सवाल सिर्फ सीटों का नहीं, उन बूथों का भी है, जहां पिछले दो चुनावों के बीच वोटिंग का मिजाज बदल गया. 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत मिली, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में कई इलाकों में तस्वीर बदल गई. अब इसी बदलाव की वजह तलाशने पर पार्टी जुटी है.
बीजेपी के आंतरिक आकलन में करीब 18,900 ऐसे बूथों का जिक्र है, जहां 2022 में पार्टी आगे थी, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन बदल गया. इनमें बड़ी संख्या ग्रामीण इलाकों की बताई गई है. यानी 2027 से पहले बीजेपी के सामने सबसे बड़ा सवाल, वोटों का समीकरण बदला, संगठन कमजोर पड़ा या स्थानीय नाराजगी भारी पड़ी?
2022 में बीजेपी ने यूपी विधानसभा की 255 सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी 80 में से सिर्फ 33 सीटें जीत सकी. समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं. इन नतीजों ने बीजेपी के सामने एक अहम चुनौती रखी, आखिर उन इलाकों में चुनावी प्रदर्शन क्यों बदला? जहां पहले पार्टी की पकड़ मजबूत मानी जाती थी?.

इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए बूथ स्तर के आंकड़ों पर फोकस किए जाने की खबरें सामने आई हैं. रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 18,900 बूथ ऐसे बताए गए हैं, जहां 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी जीती थी या आगे रही थी, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उस बूथ का रुझान बदल गया.

यह सिर्फ आंकड़ों की समीक्षा नहीं, बल्कि उन इलाकों को समझने की कवायद है, जहां पार्टी को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है. किस बूथ पर वोटों का अंतर बदला? कहां संगठन की सक्रियता कम रही? और कहां स्थानीय मुद्दों ने मतदाताओं की पसंद को प्रभावित किया? 2027 की तैयारी में ये सवाल अहम हो सकते हैं.
इस रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू ग्रामीण इलाकों से जुड़ा है. प्रकाशित आकलन के मुताबिक, चिह्नित बूथों में करीब 80 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में हैं. अवध और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों का भी खास जिक्र सामने आया है. अब इन इलाकों में बीजेपी के सामने चुनौती होगी कि वह स्थानीय मुद्दों, मतदाताओं की अपेक्षाओं और बूथ स्तर पर संगठन की स्थिति को कितनी गंभीरता से समझती है. हालांकि, सिर्फ बूथ के चुनावी रुझान से यह तय नहीं किया जा सकता कि वोट क्यों बदले? इसके लिए स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवारों, जातीय-सामाजिक समीकरणों और क्षेत्रवार वोटों के आंकड़ों की अलग-अलग पड़ताल जरूरी होगी.
बीजेपी की चुनावी ताकत लंबे समय से उसका बूथ स्तर का नेटवर्क माना जाता रहा है, लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद सामने आए इन आकलनों ने बूथ प्रबंधन और जमीनी संपर्क की अहमियत को फिर चर्चा में ला दिया है. अब चुनौती सिर्फ कार्यकर्ताओं की बैठक करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि स्थानीय समस्याएं समय पर नेतृत्व तक पहुंचें, बूथ समितियां सक्रिय रहें और सरकार तथा संगठन के बीच तालमेल बना रहे.2027 की लड़ाई में बड़े चेहरों और बड़ी रैलियों के साथ-साथ यह भी मायने रखेगा कि पार्टी मतदाताओं के बीच अपनी बात कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचा पाती है.
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सामने भी चुनौती कम नहीं है. 2024 में मिले प्रदर्शन को विधानसभा चुनाव तक बनाए रखना, स्थानीय स्तर पर संगठन मजबूत करना और अलग-अलग क्षेत्रों में समर्थन को वोटों में बदलना विपक्ष की परीक्षा होगी. लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे, उम्मीदवार और मतदान का पैटर्न अलग हो सकते हैं. इसलिए 2024 के नतीजों को 2027 का सीधा संकेत मानना सही नहीं होगा. लेकिन इतना साफ है कि यूपी की अगली चुनावी लड़ाई में बूथ स्तर का गणित और स्थानीय मुद्दे बेहद अहम भूमिका निभा सकते हैं.
(लखनऊ से नंदन श्रीवास्तव की रिपोर्ट)