दशहरा बीतते ही बुंदेलखंड की गलियों में गूंजते पारंपरिक लोकगीत माहौल को पूरी तरह सांस्कृतिक रंग में रंग देते हैं. मौका होता है बुंदेलखंड की अनूठी लोक संस्कृति और सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत करने वाले 'टेसू-झिंझिया विवाह' का. जालौन के कोंच क्षेत्र में इस बार भी यह पारंपरिक उत्सव पूरे हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ संपन्न हुआ, जहां डीजे और ढोल-नगाड़ों की थाप पर टेसू की बारात निकली. इस बारात ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया. इस दौरान सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम किए गए थे.
यह परंपरा भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर शरद पूर्णिमा तक चलती है. यह किसी बड़े उत्सव से कम नहीं होती. कुंवारी कन्याएं चार अलग-अलग चरणों में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियां करती हैं. क्वार मास में गोबर से दीवारों पर सूर्य-चंद्रमा के चित्र बनाकर लोकगीत गाए जाते हैं. इसके बाद गौरा की पूजा, सुअटा के चित्र का पूजन और दशहरा से टेसू-झिंझिया तैयार करने की परंपरा निभाई जाती है.
घर-घर गूंजते बुंदेली गीत, दान की परंपरा
इस उत्सव के दौरान बच्चे और कन्याएं टोलियां बनाकर घर-घर जाते हैं. इस दौरान वे पारंपरिक बुंदेली गीत गाकर दान स्वरूप अनाज और रुपये मांगते हैं. शरद पूर्णिमा की रात में जब इन दोनों का विवाह संपन्न कराया जाता है, तो पूरा माहौल लोक-संस्कृति के रंगों में सराबोर हो जाता है.
इस अनूठी परंपरा का सबसे दिलचस्प और धार्मिक पहलू कन्याओं का 'सुअटा' यानी भौमासुर राक्षस के पैर पूजना है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने शरद पूर्णिमा के दिन ही भौमासुर का वध किया था. इसी मान्यता से जुड़ी यह परंपरा आज भी बुंदेलखंड सहित मथुरा-वृंदावन में लोकआस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक बनी हुई है, जो हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की कहानी बयां करती है.
(जालौन से जितेन्द्र सोनी की रिपोर्ट)