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'UP पुलिस को भंग कर देना चाहिए...': मौके पर आरोपी पकड़ा फिर भी FIR में लिखा 'अज्ञात', सुप्रीम कोर्ट की पुलिस को कड़ी फटकार

Supreme Court On UP Police: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी पुलिस की FIR और जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब आरोपी मौके पर पकड़ा गया था, तो FIR में उसे ‘अज्ञात’ क्यों बताया गया. कोर्ट ने ऐसी कार्रवाई को पुलिस की विश्वसनीयता के लिए गंभीर चिंता बताया और तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि जांच का यही तरीका जारी रहा तो मामलों की जांच CBI को सौंपने पर विचार करना पड़ेगा.

Edited By Preeti Chauhan
Published: Sep 30, 2026, 01:28 PM IST | Updated: Sep 30, 2026, 01:39 PM IST
Image Credit: Supreme Court On UP Police
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नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश पुलिस की जांच और एफआईआर (FIR) दर्ज करने की कार्यशैली पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कड़ी नाराजगी जताई है. एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए और तंज कसते हुए टिप्पणी की कि यदि पुलिस का यही रवैया रहा, तो मामलों की जांच सीबीआई (CBI) को सौंप दी जानी चाहिए या फिर यूपी पुलिस को ही भंग कर देना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई नाराजगी?
कोर्ट एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रहा था जिसमें घर में घुसने (House-Trespass), मारपीट, महिला पर आपराधिक बल/हमले, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं. मौके से पकड़ने के बाद भी 'अज्ञात': सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि पुलिस ने आरोपी को वारदात के वक्त मौके पर ही पकड़ लिया था, लेकिन इसके बावजूद दर्ज की गई FIR में उसका नाम लिखने के बजाय उसे 'अज्ञात' दर्शाया गया.

भ्रष्टाचार और हेरफेर की आशंका
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब आरोपी रंगे हाथ मौके पर पकड़ा गया, तो एफआईआर में नाम क्यों छिपाया गया? ऐसी लापरवाही से बाद में मुख्य आरोपी का नाम बदलने या किसी निर्दोष का नाम जोड़ने की गुंजाइश और आशंका बनी रहती है. कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए पूछा कि यदि पुलिस इस तरह से जांच और एफआईआर दर्ज करेगी, तो आम जनता का पुलिस व्यवस्था पर भरोसा कैसे बना रहेगा?

FIR में आरोपी का नाम ही नहीं था, बाद में जोड़ा गया

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई कि FIR दर्ज करते समय आरोपी का नाम उसमें दर्ज नहीं किया गया था और बाद में उसका नाम जोड़ा गया. कोर्ट ने इस प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए पुलिस की जांच की विश्वसनीयता पर चिंता जताई.

 FIR किसी भी आपराधिक मामले की जांच की शुरुआती और अहम कड़ी होती है. ऐसे में उसमें बाद में किसी महत्वपूर्ण तथ्य या आरोपी का नाम जोड़े जाने पर उसकी प्रक्रिया और वजह स्पष्ट होना जरूरी है. अदालत की टिप्पणी का केंद्र यही था कि अगर शुरुआत में FIR में आरोपी की पहचान दर्ज नहीं थी और बाद में उसका नाम जोड़ा गया, तो यह बदलाव किस आधार पर और किन परिस्थितियों में किया गया, इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए.

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About the Author

प्रीति चौहान जीन्यूज में पत्रकार हैं, उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड डिजीटल टीम में  ब्रेकिंग, हाइपरलोकल, क्राइम, और अन्य मुद्दों को लेकर खबरें लिखती हैं. 
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