)
Sara Ali Khan Fatwa Explained: अभिनेत्री सारा अली खान के केदारनाथ मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना करने के बाद धार्मिक विवाद खड़ा हो गया है. बरेली के मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने उनके इस कदम को शरीयत के खिलाफ बताते हुए फतवा जारी किया. आखिर फतवा होता क्या है? यूपी में इसे जारी करने का अधिकार किसे है? क्या कोई भी मौलाना या इमाम फतवा दे सकता है? क्या फतवा मानना कानूनी रूप से जरूरी है? पढ़िए...
बॉलीवुड एक्ट्रेस सारा अली खान एक बार फिर धार्मिक विवाद के केंद्र में हैं. वजह है उनका केदारनाथ धाम का दौरा. सारा अली खान 25 अक्टूबर को केदारनाथ पहुंचीं थी और वहां दर्शन किए और पूजा में शामिल हुईं. जैसे ही ये वीडियो वायरल हुआ बरेली के मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस पर ऐतराज जताते हुए इसे शरीयत के खिलाफ बताया. मौलाना ने एक धार्मिक टिप्पणी जारी की, जिसे फतवा कहा जा रहा है.
मौलाना रजवी ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. उनका कहना है कि कुछ मुस्लिम युवाओं ने उनसे सारा के मंदिर जाने को लेकर सवाल पूछा था, उसी के जवाब में उन्होंने यह राय दी और तौबा की नसीहत दी. इसके बाद से ही गूगल पर सबसे ज्यादा यही सर्च हो रहा है कि आखिर फतवा होता क्या है और क्या इसे मानना जरूरी है. आइए पढ़ते इसके बारे में कुछ जरूरी जानकारी..
आसान शब्दों में कहें तो फतवा कोई सरकारी फरमान या कोर्ट का आदेश नहीं है. जब कोई भी व्यक्ति इस्लाम से जुड़े किसी मामले जैसे निकाह, तलाक, इबादत या सामाजिक व्यवहार पर शरीयत की रोशनी में जवाब चाहता है, तो वह किसी आलिम से सवाल करता है. उस सवाल पर कुरान, हदीस और फिक्ह (इस्लामी विधिशास्त्र) का अध्ययन करके जो धार्मिक राय दी जाती है, उसी को फतवा कहते हैं. कह सकते हैं कि यह एक तरह की धार्मिक सलाह है.
फतवा हर कोई जारी नहीं कर सकता. इसके लिए मुफ्ती होना जरूरी है. अब मुफ्ती कौन होता ये सवाल उठेगा. तो बता दें कि मुफ्ती वह इस्लामी विद्वान होता है जिसने दीनियात की गहरी तालीम ली हो और जिसे फतवा देने की विशेष योग्यता हासिल हो. आपको बता दें कि हर इमाम या मदरसे में पढ़ाने वाला मौलाना मुफ्ती नहीं होता. मौलाना एक सामान्य सम्मानसूचक उपाधि है, जबकि मुफ्ती एक विशेष पद माना जाता है. भारत या यूपी में फतवा जारी करने के लिए सरकार से कोई लाइसेंस नहीं लेना पड़ता. लेकिन हर बड़ी संस्था का अपना दारुल इफ्ता (फतवा विभाग) होता है, जहां एक तय प्रक्रिया से फतवा दिया जाता है.
सारा अली खान की केदारनाथ यात्रा पर फतवे को लेकर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की राष्ट्रीय संयोजक डॉ. शालिनी अली ने प्रतिक्रिया दी है. डॉ. शालिनी अली ने कहा, "मौलाना शहाबुद्दीन रजवी का फतवा पूरी तरह अनावश्यक है। यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और साझी संस्कृति पर सीधा हमला है।"उन्होंने कहा, "आस्था हर व्यक्ति का निजी मामला है। कोई मौलाना यह तय नहीं कर सकता कि एक बालिग महिला कहां माथा टेकेगी। संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपनी अंतरात्मा के अनुसार पूजा-पाठ की आजादी देता है।"डॉ. अली ने आगे कहा, "सारा से तौबा की मांग करना एक महिला की स्वतंत्रता पर पहरा बैठाने जैसा है। इस तरह के फतवे ही मुस्लिम समाज की छवि खराब करते हैं और समाज में कट्टरता को बढ़ावा देते हैं। सारा ने किसी धर्म का अपमान नहीं किया, सिर्फ बाबा केदार के दर्शन किए हैं। भारत की असली पहचान सर्वधर्म समभाव है, फतवों की सियासत नहीं।"
अब जानते हैं फतवा जारी करने का तरीका क्या होता है? पहले कोई व्यक्ति अपना सवाल लिखित या मौखिक तौर पर दारुल इफ्ता के सामने रखता है. मुफ्ती उस सवाल की पृष्ठभूमि और तथ्यों को समझते हैं. फिर कुरान और हदीस की रोशनी में उस पर विचार किया जाता है. आखिर में मुफ्ती अपनी राय लिखित रूप में जारी करते हैं.
उत्तर प्रदेश में दो शहर इस मामले में सबसे अहम माने जाते हैं, वो हैं देवबंद और बरेली. सहारनपुर के देवबंद में स्थित दारुल उलूम देवबंद का दारुल इफ्ता देश का सबसे बड़ा फतवा केंद्र माना जाता है. यहां हर साल हजारों सवालों के जवाब दिए जाते हैं. इसी तरह बरेली भी बरेलवी मसलक का बड़ा मरकज है. यहां से भी बड़ी संख्या में धार्मिक सवालों पर राय दी जाती है. अभी का ताजा मामला भी बरेली से ही जुड़ा है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि सिर्फ इन्हीं दो जगहों से फतवा जारी हो सकता है, देश में कोई भी योग्य मुफ्ती फतवा दे सकता है. ये दो शहर फतवे जारी करने के मामले में अहम हैं.
इस पर देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट अपना रुख साफ कर चुकी है. 7 जुलाई 2014 को विश्व लोचन मदन बनाम भारत संघ केस में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. कोर्ट ने कहा था कि फतवा की कोई कानूनी वैधता नहीं है. यह सिर्फ एक धार्मिक राय है, कोई कोर्ट का आदेश नहीं. इसे मानना या न मानना पूरी तरह से व्यक्ति की अपनी मर्जी है. किसी पर भी इसे जबरन थोपा नहीं जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर कोई व्यक्ति फतवे के नाम पर किसी को धमकाता है, डराता है या उसकी निजी स्वतंत्रता में दखल देता है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई हो सकती है. फतवा किसी की नौकरी, संपत्ति या नागरिक अधिकार नहीं छीन सकता.
सारा के मामले में दो बातें टकरा रही हैं-एक तरफ व्यक्तिगत आस्था और घूमने-फिरने की स्वतंत्रता है, तो दूसरी तरफ एक धार्मिक विद्वान की शरीयत पर आधारित राय. चूंकि सारा एक पब्लिक फिगर हैं, इसलिए यह मामला धार्मिक राय बनाम निजी स्वतंत्रता की बहस बन गया है.
भारत में कोई भी योग्य मुफ्ती धार्मिक सवाल पर अपनी राय दे सकता है, लेकिन वह राय संविधान और कानून से ऊपर नहीं है. फतवा मानना कानूनी बाध्यता नहीं है.