)
नीना जैन/सहारनपुर: दो कचौड़ी, एक समोसा...मर्दों का क्या भरोसा” इस तरह के नारे इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं. मशहूर देवबंदी उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसे नारे सुनकर उन्हें हैरत हुई. उनके मुताबिक, जब उन्होंने इस मामले के बारे में जांच की तो उन्हें बताया गया कि यह नारा कुछ लड़कियों की ओर से अपनी सुरक्षा से जुड़ी चिंता व्यक्त करने के लिए लगाया जा रहा है.
महिलाओं की सुरक्षा पर चिंता
उन्होंने कहा कि इस नारे की भाषा और अंदाज पर अलग-अलग राय हो सकती है और इसे लेकर बहस भी की जा सकती है, लेकिन अगर इसके पीछे सुरक्षा और सम्मान से जुड़ी कोई चिंता व्यक्त की जा रही है, तो उस चिंता को समझने की कोशिश करना भी जरूरी है. यहीं से बात सिर्फ एक नारे की नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और पारिवारिक तरबियत की भी हो जाती है. हमें अपने बच्चों, खास तौर पर बेटों को यह सिखाना चाहिए कि महिलाओं और लड़कियों के साथ सम्मान, शालीनता और ज़िम्मेदारी के साथ पेश आना कितना जरूरी है. उन्हें यह समझाना चाहिए कि किसी भी महिला के साथ ऐसा व्यवहार न हो जिससे उसे असहजता या असुरक्षा महसूस हो.
बच्चों को डिग्रियों के साथ जिम्मेदारियों को समझाएं
आगे उन्होंने कहा कि हमें यह भी याद रखना चाहिए कि खवातीन में हमारी अपनी बहनें, मांएं, नानियां और दादियां भी होती हैं, जिस सम्मान और सुरक्षा की हम अपने घर की महिलाओं के लिए उम्मीद करते हैं, वही सम्मान समाज की दूसरी महिलाओं के लिए भी हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए. हम अपने बच्चों को बड़ी-बड़ी डिग्रियां तो दिलाते हैं, लेकिन साथ ही उनकी तरबियत, अखलाक, संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी पर भी ध्यान देना उतना ही ज़रूरी है. तालीम इंसान को क़ाबिल बनाने में मदद करती है, लेकिन अच्छी तरबियत उसे अपने व्यवहार और ज़िम्मेदारियों को समझने वाला इंसान बनाने में अहम भूमिका निभाती है.
इंसानी रिश्तों की कद्र करना सिखाइये
इसलिए बहस सिर्फ इस बात तक सीमित न रहे कि- “यह नारा सही है या गलत?” बल्कि हमें यह भी सोचना चाहिए कि हम अपने घरों में अगली नस्ल को महिलाओं के सम्मान, तहजीब और इंसानी रिश्तों की कद्र करना कितना सिखा रहे हैं?. किसी भी समाज में बेहतर माहौल बनाने की शुरुआत केवल नारों या बहसों से नहीं, बल्कि घर से मिलने वाली सही तरबियत और हमारे अपने व्यवहार से भी होती है.