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Ayodhya Ram Mandir Explainer: अयोध्या में राममंदिर निर्माण के बाद अब रामजन्मभूमि से जुड़ी लंबी यात्रा को एक जगह सहेजने की तैयारी है. सरयू तट पर बनाया जा रहा अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय सिर्फ भगवान राम, रामायण और रामकथा से जुड़े प्रसंगों तक सीमित नहीं होगा. यहां रामजन्मभूमि आंदोलन, उससे जुड़े दस्तावेज, लंबी न्यायिक प्रक्रिया और पुरातात्विक पहलुओं को भी अलग-अलग गैलरियों में दिखाया जाएगा.संग्रहालय की 20 गैलरियों का नामकरण हो चुका है और मौजूदा योजना के मुताबिक इसे 2027 में दर्शकों के लिए खोला जा सकता है.
लेकिन रामजन्मभूमि का यह सफर आखिर शुरू कहां से हुआ? कब मामला कोर्ट तक पहुंचा? आंदोलन ने कब व्यापक रूप लिया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राममंदिर निर्माण तक कहानी कैसे पहुंची? आइए पढ़ते हैं पूरी Timeline..
1885:अदालत में पहुंचा रामचबूतरे का मामला
रामजन्मभूमि से जुड़े शुरुआती प्रमुख मुकदमों में 1885 का मामला महत्वपूर्ण है. महंत रघुबर दास ने फैजाबाद की अदालत में विवादित परिसर के बाहर स्थित रामचबूतरे पर मंदिर निर्माण की अनुमति मांगी थी. कोर्ट ने उनकी मांग स्वीकार नहीं की. यह मामला बाद के लंबे कानूनी विवाद की शुरुआती महत्वपूर्ण कड़ियों में गिना जाता है.
1949: विवाद ने लिया नया मोड़
दिसंबर 1949 में विवादित ढांचे के अंदर रामलला की मूर्तियां प्रकट होने की घटना के बाद मामला और जटिल हो गया. इसके बाद प्रशासन ने परिसर को अपने नियंत्रण में लिया और पूजा तथा स्थल के अधिकार को लेकर अलग-अलग पक्षों की ओर से मुकदमे शुरू हुए. सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले में इस पूरे घटनाक्रम और उसके बाद की कानूनी कार्यवाही का विस्तार से उल्लेख है.
1950 से 1961: मुकदमों का विस्तार
1950 में पूजा के अधिकार को लेकर मुकदमे दायर किए गए. 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने अपने अधिकार का दावा करते हुए अदालत का रुख किया. फिर इसके बाद 1961 में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से भी मुकदमा दाखिल किया गया. इस तरह विवाद कई पक्षों के दावों और कानूनी प्रक्रियाओं से जुड़ता चला गया.
1980 का दशक: आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार
1980 के दशक में रामजन्मभूमि मुद्दे को लेकर संगठित आंदोलन तेज हुआ. 1984 के बाद आंदोलन को व्यापक रूप देने की कोशिशें हुईं. फरवरी 1986 में फैजाबाद के जिला जज के आदेश के बाद विवादित परिसर के ताले खोले गए और हिंदू पक्ष को पूजा की अनुमति मिली. इसके बाद आंदोलन और अधिक राष्ट्रीय चर्चा में आ गया.
1989: शिलान्यास
1989 में राममंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास हुआ. इसी दौर में रामजन्मभूमि आंदोलन का राजनीतिक प्रभाव भी तेजी से बढ़ा. इसके बाद अयोध्या का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख विषयों में शामिल हो गया.
1990: रथयात्रा और कारसेवा
25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा शुरू की. यात्रा के दौरान उन्हें बिहार में गिरफ्तार किया गया. इसी दौर में अयोध्या में कारसेवा की कोशिश हुई और पुलिस कार्रवाई भी हुई. रामजन्मभूमि आंदोलन का यह चरण देश की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव बना.
6 दिसंबर 1992: विवादित ढांचा गिराया गया
6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा गिरा दिया गया. इसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव और हिंसा की घटनाएं हुईं. इसके बाद केंद्र सरकार ने अयोध्या से जुड़े क्षेत्र का अधिग्रहण किया और मामले से जुड़े कई कानूनी विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे.
2003: पुरातात्विक जांच
रामजन्मभूमि विवाद की कानूनी प्रक्रिया में पुरातत्व भी अहम मुद्दा बना. इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर 2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI ने विवादित स्थल पर खुदाई की. इस खुदाई से मिले पुरावशेषों और रिपोर्ट को बाद की न्यायिक प्रक्रिया में भी देखा गया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में पुरातात्विक रिपोर्ट और उसके निष्कर्षों पर विस्तार से विचार किया, लेकिन संग्रहालय में भी इसे पुरातात्विक जांच और मिले अवशेषों के संदर्भ में प्रस्तुत करने की योजना है.
2010: इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला
30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाया. इस फैसले को बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सर्वोच्च अदालत ने 2011 में हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी और आगे की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हुई.
9 नवंबर 2019: सुप्रीम कोर्ट का फैसला
अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2019 को सर्वसम्मत फैसला सुनाया. कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ भूमि रामलला विराजमान के पक्ष में दी और केंद्र सरकार को मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया. इसके साथ ही सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को अयोध्या में पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि देने का आदेश दिया गया.
5 फरवरी 2020: ट्रस्ट का गठन
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार ने ‘श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के गठन की घोषणा की. मंदिर निर्माण से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी इसी ट्रस्ट को दी गई.
5 अगस्त 2020: भूमि पूजन
5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए भूमि पूजन किया. इसके बाद मंदिर निर्माण का काम औपचारिक रूप से आगे बढ़ा.
22 जनवरी 2024: रामलला की प्राण प्रतिष्ठा
निर्माणाधीन राममंदिर के गर्भगृह में 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समारोह में शामिल हुए. इसके साथ रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण की यात्रा का एक बड़ा चरण पूरा हुआ.
अब संग्रहालय बताएगा पूरी कहानी
राममंदिर के निर्माण के बाद अयोध्या में अब इस पूरी यात्रा को संग्रहालय के जरिए सामने लाने की तैयारी है. अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय में कुल 20 गैलरियां विकसित की जा रही हैं. इनमें भगवान राम के जीवन, रामायण, रामकथा, आस्था और रामजन्मभूमि से जुड़े अलग-अलग पहलुओं को जगह दी जाएगी.
इनमें ‘संघर्ष की अमरगाथा’ सबसे महत्वपूर्ण गैलरियों में होगी. इसमें रामजन्मभूमि आंदोलन के शुरुआती दौर, उसके जनआंदोलन में बदलने और लंबे अदालती संघर्ष से जुड़े अभिलेख और ऐतिहासिक सामग्री प्रदर्शित करने की तैयारी है. वहीं ‘रामजन्मभूमि : अमिट धरोहर’ नाम की गैलरी में 2003 की ASI जांच और मंदिर निर्माण से जुड़े पुरावशेषों को प्रदर्शित करने की योजना है.
संग्रहालय में ‘रामोत्सव’, ‘इक्ष्वाकु वंश : इतिवृत्त’, ‘रामानुभूति’, ‘आस्था के प्रपत्र’, ‘रामानुगमन’, ‘प्रभुचरण’, ‘दिव्य दर्शन’, ‘पुष्पक विमान’ और ‘सबके राम’ जैसी गैलरियां भी होंगी. पांच गैलरियों को डिजिटल तकनीक से विकसित किया जा रहा है, जबकि हनुमान जी से जुड़ी ‘संकटमोचन’ गैलरी को 7D तकनीक के जरिए प्रस्तुत करने की योजना है.
2027 में खुलेगा संग्रहालय?
सरयू किनारे तैयार हो रहे इस संग्रहालय का मकसद रामकथा को सिर्फ पढ़ने या देखने तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उसे आधुनिक तकनीक के जरिए अनुभव कराने का भी है. मौजूदा तैयारियों के मुताबिक इसे 2027 में आम लोगों के लिए खोले जाने की योजना है. यानी अयोध्या आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को राममंदिर के दर्शन के साथ रामकथा, रामजन्मभूमि से जुड़े इतिहास और लंबे आंदोलन की यात्रा को एक ही परिसर में देखने-समझने का अवसर मिल सकता है.
रामजन्मभूमि की कहानी केवल एक तारीख या एक फैसले की कहानी नहीं है. 1885 के शुरुआती मुकदमे से लेकर 1949 की घटना, 1980 के दशक के आंदोलन, 1992 की घटना, 2003 की पुरातात्विक जांच, 2010 के हाईकोर्ट फैसले और 2019 के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय तक यह मामला कई कानूनी और सामाजिक पड़ावों से गुजरा. अब सरयू किनारे बनने वाला रामकथा संग्रहालय इसी लंबी यात्रा के अलग-अलग पहलुओं को दस्तावेजों, पुरावशेषों और आधुनिक तकनीक के जरिए दर्शकों के सामने रखने की तैयारी कर रहा है.