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कौशांबी की 247 पुरानी रामलीला: राम और रावण में 2 दिनों तक चलता है मुकाबला, प्लास्टिक की कुप्पी से होता है युद्ध

कौशांबी की सदियों पुरानी रामलीला को देखने के लिए दूर दराज से लोग पहुंचे हैं. यहां तीर, धनुष और बाण से नहीं बल्कि प्लास्टिक की कुप्पियों से लड़ाई होती है.

Written By Amitesh Pandey
Published: Oct 20, 2026, 11:44 PM IST | Updated: Oct 20, 2026, 11:50 PM IST
Image Credit: Z Creative (AI Image)
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कौशांबी के दारानगर में 247 वर्षों से चली आ रही ऐतिहासिक रामलीला में परंपरा और रोमांच का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है. यहां रामदल और रावण दल के सेनानियों के बीच कुप्पी युद्ध का आयोजन हुआ, जिसे देखने के लिए दूर-दराज के जनपदों और बड़े शहरों से दर्शक पहुंच रहे हैं. युद्ध के रोमांचक दृश्यों के बीच मेले में भारी भीड़ उमड़ रही है. वहीं, सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस और प्रशासन भी मुस्तैद है.

247 साल पुरानी परंपरा

कौशांबी के दारानगर की ऐतिहासिक रामलीला, जहां 247 वर्षों से चली आ रही परंपरा आज भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. रामलीला के दौरान आयोजित कुप्पी युद्ध में रामदल और रावण दल के सेनानी आमने-सामने नजर आए. दोनों ओर के 25 से 30 सेनानियों ने युद्धक्षेत्र में अपने युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया.

चार चरणों में संपन्न हुआ कुप्पी युद्ध

कुप्पी युद्ध के रोमांचक दृश्य देखने के लिए आसपास के जनपदों के साथ बड़े महानगरों से भी दर्शक पहुंचे. मेले में लोगों की भारी भीड़ जुटी. आज का कुप्पी युद्ध चार चरणों में संपन्न हुआ, जबकि अगले दिन तीन चरणों में युद्ध का आयोजन किया जाएगा.

मेले में भारी पुलिस फोर्स तैनात रही

ऐतिहासिक आयोजन के दौरान शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रशासन सतर्क है. एसडीएम सिराथू प्रमेश श्रीवास्तव और सीओ सत्येंद्र तिवारी मौके पर मौजूद रहे. मेले में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है, ताकि श्रद्धालु और दर्शक शांतिपूर्ण माहौल में इस ऐतिहासिक परंपरा का आनंद ले सकें.

सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए परंपरा

कुल मिलाकर, दारानगर की 247 साल पुरानी रामलीला आज भी आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए है. कुप्पी युद्ध का रोमांच हो या रामायण के प्रसंगों का सजीव मंचन, हर दृश्य लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है.

पत्थर के रावण की अनोखी रामलीला

वहीं, कौशांबी के शहजादपुर में रामलीला की परंपरा कुछ अलग है. यहां कागज का रावण नहीं जलाया जाता, बल्कि पत्थर के विशालकाय रावण का प्रतीकात्मक वध होता है. पत्थर से बना रावण अपने पूरे परिवार के साथ आज भी यहां की ऐतिहासिक परंपरा की गवाही दे रहा है.

रावण की मूर्ति का वध किया जाता है

यहां रावण के साथ मेघनाद, मंदोदरी और परिवार के दूसरे सदस्यों की पत्थर की मूर्तियां भी स्थापित हैं. रामलीला का स्वरूप देश की दूसरी रामलीलाओं से अलग है. यहां दशहरे पर कागज के रावण का पुतला जलाने के बजाय, राम और रावण के युद्ध के दौरान विशालकाय पत्थर की मूर्ति का प्रतीकात्मक वध किया जाता है. शहजादपुर की यह अनूठी परंपरा रामलीला की ऐतिहासिक विरासत और स्थानीय संस्कृति की एक खास पहचान है. 
 

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About the Author

अमितेश कुमार पांडेय डिजिटल पत्रकार हैं और ज़ी उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड (Zee UP-UK) की डिजिटल टीम में सीनियर सब-एडिटर के पद पर काम कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से ताल्लुक रखने वाले अमितेश को मीडिया जगत में 8 वर्षों से ज्यादा का अनुभव है. वे उत्तर प्रदेश की हाइपर-लोकल खबरों, क्राइम, प्रशासनिक गतिविधियों, राजनीतिक उठापटक और खेल जगत के मुद्दों पर पैनी नजर रखते हैं. खबरों की गहराई, ग्राउंड रियलिटी और तथ्य-आधारित डिजिटल कवरेज के लिए वे जाने जाते हैं.अमितेश के पास डेस्क एडिटिंग के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों से ग्राउंड रिपोर्टिंग का भी व्यावहारिक अनुभव है. अमितेश ने उत्तर प्रदेश के तीन प्रमुख शहरों- लखनऊ, प्रयागराज और गाज़ियाबाद में जमीनी स्तर पर रिपोर्टिंग की है. स्थानीय प्रशासन, जनसमस्याओं और राजनीतिक हलचलों की बेहतर समझ उन्हें ज़मीनी वास्तविकताओं को सटीक रूप से प्रस्तुत करने में मदद करती है. ज़ी मीडिया से पहले उन्होंने भारत के लिडिंग हिंदी न्यूज़ पेपर अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान में काम करने का अनुभव है. अमितेश ने पत्रकारिता की पढ़ाई प्रयागराज से की है.अमितेश पांडेय से आप amitesh.pandey@india.com पर सीधे ईमेल कर संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा आप अमितेश से एक्स (ट्विटर) और लिंक्डइन पर कनेक्ट कर सकते हैं.
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