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OPINION: आकाश.. बसपा से बाहर, फिर भी बहन जी के साथ!

आकाश आनंद ने अपनी बुआ मायावती को लिखे पत्र में साफ कर दिया कि बसपा छोड़ने का सवाल ही नहीं है. वे अपनी ‘बुआ मां’ से माफी मांगकर फिर उनके नेतृत्व में काम करना चाहते हैं.

Written By Gunateet Ojha
Published: Oct 02, 2026, 10:00 PM IST | Updated: Oct 03, 2026, 04:42 PM IST
Image Credit: ZEE Creative
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आकाश आनंद को पार्टी से निकाला गया. सियासत में ऐसी स्थिति आए तो आमतौर पर नेता अगला ठिकाना तलाशता है. लेकिन आकाश आनंद ने उलटी राह पकड़ ली. एक तरफ उनके लिए दूसरे दलों के दरवाजे खुलने की खबरें आती रहीं. दूसरी तरफ आकाश चुप रहे. न किसी ऑफर पर हामी भरी. न मायावती के खिलाफ एक शब्द कहा. अब जब उन्होंने चुप्पी तोड़ी है तो उनका संदेश भी साफ है. 'मैं किसी दूसरे राजनीतिक दल में नहीं जा रहा. न आज, न कभी. BSP मेरे लिए सिर्फ एक पार्टी नहीं, मेरा परिवार है.'

यही वह लाइन है जिसने आकाश आनंद की मौजूदा राजनीति को एक अलग बहस में ला खड़ा किया है. मायावती ने उन्हें बसपा से बाहर कर दिया है. इसके बावजूद आकाश ने उनके खिलाफ मोर्चा खोलने के बजाय उन्हें अपना राजनीतिक गुरु बताया. 'बुआ मां' कहा... अपनी चुप्पी के लिए माफी मांगी. और दोबारा बसपा में काम करने का मौका मांग लिया. यह बयान भावनात्मक जरूर है. लेकिन इसके भीतर एक सोची-समझी राजनीतिक स्थिति भी दिखाई देती है.

सियासत में सबसे आसान रास्ता क्या होता है? जिस दरवाजे से बाहर निकाले गए उसी के सामने खड़े होकर सवाल उठाना. अपने साथ हुए फैसले को गलत बताना. समर्थकों से कहना कि अब नई लड़ाई होगी. आकाश आनंद ने फिलहाल यह रास्ता नहीं चुना. उन्होंने यह भी नहीं कहा कि उन्हें दूसरे दलों से मिले प्रस्तावों पर विचार करना है. इसके उलट उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कह दिया कि उनकी राजनीति मायावती के नेतृत्व में ही है. 'बाबा साहेब का मिशन, मान्यवर साहेब का रास्ता और आपका नेतृत्व. यही मेरी राजनीति है.'

यहां आकाश आनंद की चुप्पी भी अपने आप में एक राजनीतिक संदेश बन गई. सितंबर में जब मायावती ने उन्हें बसपा से अलग किया तो सियासी बाजार में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं. संजय निषाद ने उन्हें निषाद पार्टी में आने का न्योता दिया. यहां तक कहा गया कि उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसी बड़ी जिम्मेदारी भी दी जा सकती है. अखिलेश यादव से आकाश को लेकर सवाल हुआ तो उन्होंने कहा कि 'आप लेकर आएंगे तो हम ले लेंगे.' चंद्रशेखर आजाद ने भी उन्हें अपनी पार्टी में आने का न्योता दिया. यानी आकाश के सामने विकल्पों की कमी नहीं थी.

लेकिन आकाश ने इन राजनीतिक संभावनाओं को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी नहीं की. यही चुप्पी आज उनके काम आई. उन्होंने जब बोलना चुना तो किसी दूसरे दल पर निशाना नहीं साधा. मायावती को ही संबोधित किया. अपनी गलती मानी. माफी मांगी... और यह साफ किया कि उनके लिए व्यक्तिगत रिश्तों से बड़ा पार्टी और आंदोलन का हित है. खास बात यह भी है कि उन्होंने अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से बाहर करने के मायावती के फैसले को उचित बताया. यानी जिस घटनाक्रम को लेकर उनकी अपनी राजनीतिक स्थिति प्रभावित हुई उसी फैसले पर भी उन्होंने मायावती के खिलाफ जाने से इनकार किया.

यहीं से आकाश आनंद की राजनीति का असली सवाल निकलता है. क्या राजनीति सिर्फ पद का नाम है? क्या पार्टी से बाहर होते ही नेता की राजनीति खत्म हो जाती है? या राजनीति उस समय भी जारी रहती है जब आपके पास पद नहीं हो? आकाश का मौजूदा रुख दूसरी तस्वीर दिखाता है. वह पद के बिना भी अपनी राजनीतिक पहचान को बसपा और मायावती से जोड़कर देख रहे हैं. उनका कहना है कि विश्वास शब्दों से नहीं बल्कि काम से बनेगा. यह लाइन आने वाले दिनों में उनके लिए सबसे अहम हो सकती है.

आकाश आनंद की कहानी में एक और दिलचस्प पहलू है. कुछ समय पहले तक वही आकाश आनंद बसपा के सबसे आक्रामक युवा चेहरों में गिने जाते थे. उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में खुलकर आक्रामक भाषण दिए. बाद में उन्हें मायावती ने राष्ट्रीय समन्वयक बनाया और राजनीतिक उत्तराधिकारी भी घोषित किया था. फिर उन्हें पद से हटाया गया. वापस लाया गया. दोबारा जिम्मेदारी मिली. फिर पार्टी से बाहर कर दिया गया. यानी पिछले ढाई-तीन साल में आकाश ने राजनीति का उतार-चढ़ाव बहुत करीब से देखा है.

इसीलिए आज की उनकी भाषा को केवल एक भतीजे की अपनी बुआ से माफी मान लेना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी. इसमें एक युवा नेता का राजनीतिक संदेश भी है. आकाश कह रहे हैं कि उन्होंने जो सीखा वह मायावती से सीखा. वह यह भी कह रहे हैं कि उनकी राजनीति किसी दूसरे दल में जाकर आगे बढ़ने की नहीं है. यह बात उस समय कही गई है जब उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव सामने है और बसपा के सामाजिक आधार को लेकर सभी प्रमुख दलों की नजर बनी हुई है. आकाश को लेकर विभिन्न दलों की ओर से सामने आए प्रस्तावों को भी इसी राजनीतिक संदर्भ में देखा गया है.

और यही जगह है जहां 'बुआ मां' वाला रिश्ता सिर्फ पारिवारिक संबोधन नहीं रह जाता. आकाश ने मायावती को अपना राजनीतिक गुरु कहा है. यानी उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान का मूल किसी नए मंच में नहीं बल्कि उसी राजनीतिक परंपरा में बताया है जिससे वह आए हैं. यह उनके लिए आसान रास्ता नहीं है. क्योंकि पार्टी से बाहर खड़े होकर उसी नेतृत्व के प्रति भरोसा जताना राजनीति में असामान्य जरूर नहीं है लेकिन आसान भी नहीं है.

हाथरस में मिशन 2027 के दौरान आकाश का अंदाज इससे अलग दिखा था. तब वह युवा वोटरों के बीच अपनी जगह बनाने की कोशिश करते दिखे थे. उनका अंदाज मायावती की पारंपरिक राजनीति से ज्यादा आक्रामक और युवा था. अखिलेश यादव को 'अंकल' कहने जैसी राजनीतिक भाषा ने भी खूब चर्चा बटोरी. उस समय यह साफ था कि आकाश अपनी अलग राजनीतिक शैली बनाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन आज की पोस्ट बताती है कि अलग शैली बनाने और अलग राजनीतिक रास्ता चुनने में वह फर्क समझते हैं.

यही फर्क आने वाले समय में आकाश आनंद के लिए सबसे अहम हो सकता है. युवा राजनीति सिर्फ तेज भाषण और सोशल मीडिया की भाषा नहीं होती. उसमें यह भी देखना पड़ता है कि कब बोलना है और कब चुप रहना है. आकाश ने निष्कासन के बाद लंबी चुप्पी रखी. इस दौरान दूसरे नेताओं के बयान आते रहे. उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अटकलें लगती रहीं. लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से किसी दूसरे दल की तरफ कदम बढ़ाने का संकेत नहीं दिया. आज जब उन्होंने बोलने का फैसला किया तो पूरा संदेश एक ही जगह केंद्रित रखा- मायावती और बसपा.

बेशक इसे आकाश आनंद की अंतिम राजनीतिक दिशा मान लेना अभी जल्दबाजी होगी. बसपा में उनकी वापसी होगी या नहीं इसका फैसला मायावती को करना है. आकाश ने खुद सिर्फ दोबारा सेवा का अवसर मांगा है. ऐसे में आज का बयान वापसी की घोषणा नहीं बल्कि वापसी की सार्वजनिक अपील है. लेकिन राजनीति में कुछ संदेश तत्काल असर से ज्यादा दूर तक जाते हैं. आकाश आनंद का आज का संदेश भी वैसा ही है. उन्होंने अपने सामने आए विकल्पों पर सार्वजनिक सौदेबाजी नहीं की. उन्होंने मायावती को चुनौती नहीं दी. उन्होंने पार्टी से बाहर रहकर भी बसपा से अपना रिश्ता तोड़ने से इनकार किया. उन्होंने माफी मांगी और फिर से काम करने की इच्छा जताई.

अब आगे गेंद मायावती के पाले में है. आकाश ने अपना पत्ता खोल दिया है. उन्होंने बता दिया है कि फिलहाल उनकी राजनीति का पता बदलने वाला नहीं है. बसपा उनका परिवार है. मायावती उनकी राजनीतिक गुरु हैं. और वह उसी छत के नीचे फिर खड़े होने का मौका मांग रहे हैं. सियासत में पद छिन सकता है. टिकट जा सकता है. पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है. लेकिन नेता की राजनीतिक दिशा का असली इम्तिहान तब होता है जब उसके सामने कई रास्ते खुले हों. आकाश आनंद ने आज कम से कम अपना रास्ता साफ कर दिया है. अब देखना यह है कि बहन जी उस रास्ते पर उनके लिए दरवाजा खोलती हैं या नहीं.

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About the Author

गुणातीत ओझा ज़ी न्यूज डिजिटल में एसोसिएट न्यूज एडिटर हैं. वर्तमान में ज़ी न्यूज डिजिटल के उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड डिजिटल को लीड कर रहे हैं. वह दिसंबर 2021 में ज़ी न्यूज से जुड़े. देश-दुनिया और राजनीतिक खबरों पर अच्छी पकड़ रखते हैं. 15 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रहे हैं. इससे पहले एनडीटीवी डिजिटल, लाइव हिन्दुस्तान डिजिटल, लोकमत डिजिटल, जागरण डॉट कॉम, राजस्थान पत्रिका डिजिटल, हिन्दुस्तान अखबार, दैनिक जागरण अखबार के साथ भी काम कर चुके हैं.
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