EXPLAINER: ताज की दीवारों से कूटनीति के मंच तक पहुंची आगरा की पच्चीकारी, आखिर कैसे बनती है ये नायाब कला?
आगरा की सदियों पुरानी पच्चीकारी अब ताजमहल की दीवारों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच तक पहुंच रही है. पीएम मोदी ने उज्बेकिस्तान के प्रधानमंत्री को पच्चीकारी वाली संगमरमर की प्लेट भेंट की, आइये आपको बताते हैं कैसे तैयार होती है यह नायाब कला.
ताजमहल का नाम आते ही आंखों के सामने सफेद संगमरमर की खूबसूरत इमारत की तस्वीर उभरती है. लेकिन ताज की खूबसूरती सिर्फ उसके गुंबद, मीनारों और सफेद संगमरमर तक सीमित नहीं है. इसकी दीवारों और सजावटी हिस्सों में रंग-बिरंगे पत्थरों से की गई बेहद बारीक जड़ाई भी इसकी खूबसूरती को खास बनाती है. यही है आगरा की मशहूर पच्चीकारी. आज यही पच्चीकारी एक बार फिर चर्चा में है. ताजनगरी के कारीगरों के हाथों से तैयार खास पच्चीकारी वाली संगमरमर की प्लेट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्बेकिस्तान के प्रधानमंत्री अब्दुल्ला अरिपोव को भेंट की है. यानी जिस कला ने सदियों से ताजमहल की खूबसूरती बढ़ाई, उसका एक नमूना अब अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच तक पहुंच गया है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर पच्चीकारी इतनी खास क्यों है? इसे तैयार करने में कारीगरों को क्या करना पड़ता है? और ताजमहल की पहचान से जुड़ी यह कला आज भी क्यों जिंदा है? आइए आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं.
आखिर क्या है आगरा की पच्चीकारी?
पच्चीकारी को आसान भाषा में समझें तो यह संगमरमर पर अलग-अलग रंगों के पत्थरों की बारीक जड़ाई की कला है. इसमें सफेद संगमरमर को आधार बनाया जाता है और उस पर फूल-पत्तियों या दूसरे खूबसूरत डिजाइन तैयार किए जाते हैं. खास बात यह है कि इसमें रंग केवल पेंट से नहीं आते. अलग-अलग रंग और चमक प्राकृतिक या सजावटी पत्थरों के छोटे-छोटे टुकड़ों से आती है. इन्हें डिजाइन के मुताबिक काटकर संगमरमर में जड़ा जाता है. दूर से देखने पर यह सिर्फ एक सुंदर डिजाइन लगता है, लेकिन करीब से देखने पर पता चलता है कि इसमें कितनी बारीकी से पत्थरों को फिट किया गया है. यही बारीकी आगरा की पच्चीकारी को खास पहचान देती है.
संगमरमर पर कैसे बनती है ये नायाब कला?
अब सबसे दिलचस्प सवाल- आखिर एक साधारण संगमरमर की प्लेट खूबसूरत पच्चीकारी वाली कृति कैसे बन जाती है? सबसे पहले संगमरमर की सतह पर डिजाइन तैयार किया जाता है. डिजाइन में फूल, पत्तियां और दूसरी आकृतियां शामिल हो सकती हैं. इसके बाद उस डिजाइन के हिसाब से अलग-अलग रंगों के पत्थरों का चयन किया जाता है. फिर शुरू होता है सबसे मेहनत वाला काम. पत्थरों को बेहद छोटे आकार में काटा जाता है. हर टुकड़े को इस तरह आकार देना पड़ता है कि वह संगमरमर पर बने डिजाइन के बिल्कुल सही हिस्से में फिट हो सके. यह काम जितना सुनने में आसान लगता है, असल में उतना ही मुश्किल है. एक छोटा सा टुकड़ा भी अगर सही आकार का नहीं हुआ तो पूरी डिजाइन की खूबसूरती बिगड़ सकती है. इसके बाद संगमरमर में डिजाइन के मुताबिक जगह बनाई जाती है और पत्थर के इन छोटे-छोटे टुकड़ों को उसमें जड़ा जाता है. कोशिश यही रहती है कि अलग-अलग टुकड़ों के बीच का जोड़ दिखाई न दे. यानी पच्चीकारी में सिर्फ पत्थर काटना नहीं होता. इसमें डिजाइन समझने, सही आकार देने, धैर्य रखने और बेहद बारीकी से हर टुकड़े को फिट करने की जरूरत होती है.
ताजमहल और पच्चीकारी का क्या रिश्ता है?
आगरा की पच्चीकारी का नाम ताजमहल के साथ जुड़ना कोई संयोग नहीं है. ताजमहल की खूबसूरती में संगमरमर पर की गई पत्थरों की जड़ाई का खास योगदान है. सफेद संगमरमर पर अलग-अलग रंगों के पत्थरों से बने फूल-पत्तियों के डिजाइन इमारत को एक अलग तरह की खूबसूरती देते हैं. जब रोशनी इन सतहों पर पड़ती है तो पत्थरों की चमक और रंग डिजाइन को और आकर्षक बना देते हैं. यही वजह है कि ताजमहल देखने आने वाले पर्यटक सिर्फ उसकी विशाल इमारत या गुंबद को ही नहीं देखते, बल्कि उसकी दीवारों और सजावटी हिस्सों में मौजूद इस बारीक कारीगरी को भी करीब से निहारते हैं. ताज की दीवारों पर दिखने वाली यही कला आज आगरा के कारीगरों की पहचान बन चुकी है.
कारीगर के हाथों का हुनर क्यों खास?
आज मशीनों का दौर है. बहुत से काम मशीनों की मदद से तेजी से किए जा सकते हैं. इसके बावजूद पच्चीकारी की असली खूबसूरती अभी भी कारीगर के हाथ और उसकी आंख की बारीकी पर टिकी है. हर पत्थर को डिजाइन के मुताबिक काटना और फिर उसे बिल्कुल सही जगह पर फिट करना एक धैर्य वाला काम है. यहां थोड़ी सी गलती भी पूरी कृति के लुक को प्रभावित कर सकती है. इसीलिए पच्चीकारी को सिर्फ एक सजावटी तकनीक मानना इसकी पूरी कहानी नहीं बताता. इसके पीछे कारीगर की मेहनत, अनुभव और महीनों-बरसों में सीखा गया हुनर भी शामिल होता है. सबसे खास बात यह है कि यह हुनर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचता रहा है. आगरा के कारीगर आज भी अपने हाथों से इस पारंपरिक कला को जिंदा रखे हुए हैं.
एक प्लेट बनी कूटनीति का खास तोहफा
अब बात उस खास पच्चीकारी वाली संगमरमर की प्लेट की, जिसने इस कला को फिर चर्चा में ला दिया है. ताजनगरी के कारीगरों ने इसे खास तौर पर तैयार किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे उज्बेकिस्तान के प्रधानमंत्री अब्दुल्ला अरिपोव को भेंट किया. देखने में यह भले ही एक संगमरमर की प्लेट हो, लेकिन इसके पीछे आगरा की सांस्कृतिक पहचान और कारीगरों का हुनर जुड़ा है. सफेद संगमरमर पर रंग-बिरंगे पत्थरों की बारीक जड़ाई इसे एक खास कृति बनाती है. इस तोहफे की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यह आगरा की उस कला का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी पहचान दुनिया के सबसे मशहूर स्मारकों में से एक ताजमहल से जुड़ी हुई है.
ताज से विदेश तक पहुंची आगरा की पहचान
किसी शहर की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों या पर्यटन स्थलों से नहीं बनती. वहां के लोगों का हुनर भी उस शहर की पहचान बनाता है. आगरा के लिए ताजमहल निश्चित रूप से सबसे बड़ी पहचान है. लेकिन ताज से जुड़ी पच्चीकारी ने इस पहचान को और विस्तार दिया है. दुनिया भर से लोग आगरा आते हैं. ताजमहल देखते हैं और संगमरमर पर पत्थरों की इस बारीक जड़ाई को भी करीब से देखते हैं. अब इसी कला का एक नमूना उज्बेकिस्तान के प्रधानमंत्री तक पहुंचा है. यानी ताजमहल की दीवारों से शुरू होने वाली यह कहानी अब एक अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुकी है.
कला से कूटनीति तक क्यों खास है ये तोहफा?
विदेशी मेहमानों को भारतीय कला और हस्तशिल्प से जुड़े तोहफे देना सिर्फ औपचारिकता नहीं होता. ऐसे उपहारों के जरिए भारत की संस्कृति, परंपरा और स्थानीय हुनर को भी दुनिया के सामने रखा जाता है. उज्बेकिस्तान के प्रधानमंत्री को दिया गया पच्चीकारी का यह नमूना भी इसी नजरिए से खास है. इसमें एक तरफ ताजमहल से जुड़ी आगरा की पहचान है तो दूसरी तरफ उन कारीगरों का हुनर है जो आज भी इस कला को अपने हाथों से जिंदा रखे हुए हैं. यानी एक छोटी सी संगमरमर की प्लेट अपने भीतर एक बड़ी कहानी समेटे हुए है- आगरा की, ताजमहल की और उस हुनर की, जिसे पीढ़ियों से कारीगर आगे बढ़ाते आ रहे हैं.
पच्चीकारी सिर्फ कला नहीं.. विरासत है
आज जब ज्यादातर चीजें मशीनों से तेजी से तैयार हो रही हैं ऐसे समय में पच्चीकारी जैसी कला की अहमियत और बढ़ जाती है. इसमें समय लगता है, मेहनत लगती है और सबसे ज्यादा जरूरत होती है धैर्य की. हर पत्थर को सही आकार देना और फिर उसे संगमरमर में इस तरह जड़ना कि पूरी डिजाइन एकसार नजर आए, आसान काम नहीं है. यही वजह है कि आगरा की पच्चीकारी को सिर्फ ताजमहल की सजावट से जोड़कर देखना कम होगा. यह शहर के कारीगरों के हुनर और भारत की पारंपरिक कला का हिस्सा है. ताजमहल आगरा की पहचान है, लेकिन पच्चीकारी उस पहचान की खूबसूरत बारीकी है. अब जब यही कला कूटनीति के मंच तक पहुंच रही है तो यह सिर्फ एक कृति का सफर नहीं बल्कि आगरा के हुनर के दुनिया तक पहुंचने की कहानी भी है.