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चुनाव में किसी उम्मीदवार की जीत के पीछे उसके काम, वादों और लोगों के बीच उसकी छवि की अहम भूमिका होती है. लेकिन पेरू के एक स्थानीय चुनाव में एक उम्मीदवार का नाम ही चर्चा का सबसे बड़ा कारण बन गया. उनका पूरा नाम हिटलर मुसोलिनी सिमोन फ्लोरेस है.
नाम में हिटलर और मुसोलिनी जैसे दो तानाशाहों का जिक्र होने की वजह से लोग उन्हें लेकर हैरान हैं. हालांकि, नाम को लेकर होने वाली चर्चा का असर उनके चुनावी नतीजे पर पड़ता नहीं दिखा. फ्लोरेस ने पेरू के क्वेरोपाल्का में हुए स्थानीय चुनाव में 34 प्रतिशत वोट हासिल किए और मेयर की कुर्सी तक पहुंच गए.
डेली स्टार की रिपोर्ट के अनुसार, फ्लोरेस को भी पता है कि उनका नाम सुनते ही लोगों के मन में जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर की तस्वीर बन जाती है. हिटलर नाजी शासन का प्रमुख था और उसके शासन में यहूदियों के नरसंहार समेत कई भयानक अपराध हुए थे. इटली के तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी का नाम भी इतिहास में फासीवादी शासन और दमन के लिए जाना जाता है. ऐसे में चुनाव प्रचार के दौरान फ्लोरेस ने मतदाताओं को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि उनके नाम को उनके विचारों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने खुद को 'अच्छा हिटलर' बताया. स्थानीय मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि शायद उनका नाम हिटलर होना महज एक संयोग है. उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें इस नाम से कोई आपत्ति नहीं है और उनके लिए यह जुआन, लुकास या सेबेस्टियन जैसे किसी दूसरे नाम की तरह ही है.
45 वर्षीय फ्लोरेस ने पेरू की वामपंथी पार्टी 'आहोरा नासियोन' यानी 'नाउ नेशन' के टिकट पर चुनाव लड़ा. रविवार को हुए चुनाव में उन्हें 34 प्रतिशत वोट मिले. इसके साथ ही वह क्वेरोपाल्का के नए मेयर बन गए. उनकी जीत इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि आमतौर पर ऐसे नाम को लेकर सवाल उठ सकते हैं जो इतिहास के सबसे बदनाम तानाशाहों से जुड़ा हो. लेकिन लोकल चुनाव में मतदाताओं ने उन्हें वोट दिया और वह जीत हासिल करने में कामयाब रहे. हालांकि, सिर्फ चुनाव जीतने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मतदाताओं ने उनके नाम को लेकर क्या सोचा. क्योंकि चुनाव में लोगों ने किन मुद्दों को प्राथमिकता दी, इसका पूरा जवाब केवल नाम या वोट प्रतिशत से नहीं मिलता.
फ्लोरेस का राजनीतिक सफर भी दिलचस्प रहा है. वह पहले पेरू की दक्षिणपंथी पार्टी 'पॉपुलर फोर्स' के सदस्य थे. साल 2025 में उन्होंने इस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद उन्होंने आहोरा नासियोन के साथ चुनाव लड़ा. पॉपुलर फोर्स का नेतृत्व केइको फुजीमोरी करती हैं. वह पेरू के पूर्व राष्ट्रपति अल्बर्टो फुजीमोरी की बेटी हैं. अल्बर्टो फुजीमोरी साल 1990 से 2000 तक देश के राष्ट्रपति रहे थे. इस तरह फ्लोरेस की राजनीतिक पहचान सिर्फ उनके असामान्य नाम तक सीमित नहीं है. वह अलग-अलग राजनीतिक दलों से भी जुड़े रहे हैं और अब स्थानीय चुनाव जीतकर एक नई जिम्मेदारी संभालने जा रहे हैं.
पेरू में यह पहला मौका नहीं है जब हिटलर नाम वाले किसी व्यक्ति ने चुनाव जीतकर स्थानीय प्रशासन में जगह बनाई हो. इससे पहले हिटलर अल्बा नाम के एक नेता युंगार नगर पालिका के मेयर रह चुके हैं. उन्होंने 2011 से 2014 तक इस पद पर काम किया था. अल्बा 'वी आर पेरू' नाम की मध्य-दक्षिणपंथी पार्टी से जुड़े थे. चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने 'हिटलर इज बैक' और 'हिटलर विद द पीपल' जैसे नारे भी इस्तेमाल किए थे. उन्होंने भी खुद को 'अच्छा हिटलर' कहा था. यह उदाहरण दिखाता है कि कुछ देशों में किसी नाम का ऐतिहासिक अर्थ और स्थानीय राजनीति में उसका इस्तेमाल अलग-अलग तरह से सामने आ सकता है.
हिटलर नाम को लेकर चर्चा सिर्फ पेरू तक सीमित नहीं है. अफ्रीकी देश नामीबिया में भी एडोल्फ हिटलर उनोना नाम के एक नेता पहले से चर्चा में रहे हैं. वह स्वापो पार्टी से जुड़े हैं और ओशाना क्षेत्रीय परिषद में प्रतिनिधित्व करते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, उनोना लगातार पांचवीं बार चुनाव जीत चुके हैं. उनका कहना रहा है कि बचपन में उन्हें अपने नाम के ऐतिहासिक अर्थ का अंदाजा नहीं था और वह इसे सामान्य नाम समझते थे. उन्होंने यह भी साफ किया है कि उनके नाम का मतलब यह नहीं है कि वह दुनिया पर राज करना चाहते हैं या अपने इलाके पर कब्जा करना चाहते हैं. पहले वह अपना नाम बदलने की इच्छा भी जता चुके हैं, जिससे उन्हें बार-बार इतिहास के तानाशाह से जोड़कर न देखा जाए.