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'ये शोर नहीं, सड़क की भाषा है': भारतीय हॉर्न कल्चर के बचाव में उतरी डच महिला, बोली- इसे पिछड़ेपन से जोड़ना गलत

भारत की सड़कों पर हॉर्न की आवाज आम है, लेकिन नीदरलैंड्स की एक महिला ने इसे अलग नजरिए से देखा. उनका कहना है कि यहां हॉर्न सिर्फ गुस्सा निकालने के लिए नहीं, बल्कि सड़क पर अपनी मौजूदगी बताने के लिए भी बजाया जाता है.

Written BySantosh Kumar Mishra
Published: Oct 05, 2026, 12:49 PM IST|Updated: Oct 05, 2026, 01:01 PM IST
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'ये शोर नहीं, सड़क की भाषा है': भारतीय हॉर्न कल्चर के बचाव में उतरी डच महिला, बोली- इसे पिछड़ेपन से जोड़ना गलत
Image Credit: @ivanaperkovicofficial | विदेशी महिला ने समझाया भारतीय हॉर्न कल्चर का असली खेल!

About the Author

Santosh Kumar Mishra

Santosh Kumar Mishra

संतोष मिश्रा जी न्यूज में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हैं. वह पिछले 4.5 वर्षों से डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं. ट्रैवल, फीचर, ऑफबीट, ट्रेंडिंग और वायरल खबरों के साथ-साथ टेक और साइंस से जुड़ी खबरों में भी उनकी विशेष विशेषज्ञता है. उनकी खबरें अपनी विश्वसनीयता और सटीक जानकारी के लिए जानी जाती हैं. आसान और सहज भाषा में लिखे गए उनके कंटेंट को पाठक काफी पसंद करते हैं. सोशल मीडिया की दुनिया (Instagram, X, Reddit, Threads और Facebook) पर उनकी अच्छी पकड़ है. वह ट्रेंडिंग विषयों पर लगातार नजर रखते हैं और फ्रेश व यूनिक खबरें पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं. संतोष मिश्रा इससे पहले News Nation और India Ahead जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में भी काम कर चुके हैं. उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन (PG) किया है.
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भारत की सड़क पर निकलते ही आपको तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती हैं. कहीं बाइक वाला हॉर्न बजा रहा होता है, कहीं ऑटो वाला सामने वाले को रास्ता देने का इशारा कर रहा होता है और कहीं कोई कार ड्राइवर ओवरटेक करने से पहले हॉर्न देता है.

इसी वजह से भारत की ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर विदेशों में भी कई तरह की बातें होती रहती हैं. कुछ लोग लगातार हॉर्न बजने को ट्रैफिक की अव्यवस्था और शोर से जोड़ते हैं, तो कई बार इसे भारत के पिछड़े होने का उदाहरण तक बता देते हैं. सोशल मीडिया पर इसको लेकर कई विदेशी लोगों की पोस्ट आपको मिल जाएंगी. अब भारत में रह रही डच महिला इवाना ने विदेशियों की इसी सोच पर सवाल उठाया है. उनका कहना है कि सड़क पर हॉर्न सुनकर सिर्फ यह तय कर लेना कि यहां के लोग गलत तरीके से गाड़ी चलाते हैं, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता.

'हॉर्न सिर्फ शोर नहीं, सड़क की भाषा है'

इवाना ने अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए एक वीडियो में इस मुद्दे पर अपनी बात रखी. उन्होंने बताया कि उनके एक वीडियो पर कुछ लोगों ने भारत में ट्रैफिक के दौरान बजने वाले हॉर्न का मजाक उड़ाया था. उनका कहना था कि कुछ लोग भारत की हॉर्निंग को देखकर इसे देश के पिछड़े होने से जोड़ रहे थे. लेकिन उनके अनुसार, ऐसा करने वाले लोग शायद इस बात को नहीं समझ रहे कि भारत में हॉर्न का इस्तेमाल कई अलग-अलग वजहों से होता है. उन्होंने भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों का उदाहरण देते हुए कहा कि यहां हॉर्न को सिर्फ आवाज या शोर के तौर पर नहीं देखा जाता. कई बार यह सड़क पर बातचीत करने जैसा काम करता है.

 

 
 
 
 
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यहां हॉर्न का मतलब हमेशा गुस्सा नहीं

पश्चिमी देशों में हॉर्न की आवाज का मतलब अक्सर नाराजगी या गुस्सा समझा जाता है. किसी ड्राइवर ने जोर से हॉर्न बजाया तो सामने वाला इसे शिकायत या झुंझलाहट के तौर पर ले सकता है. लेकिन इवाना के मुताबिक भारत में इसका इस्तेमाल कई बार बिल्कुल अलग मकसद से किया जाता है. कोई ड्राइवर सामने वाले को यह बताने के लिए हॉर्न बजाता है कि वह पीछे या बगल में मौजूद है. कोई ओवरटेक करने से पहले संकेत देता है. ब्लाइंड टर्न पर हॉर्न बजाकर सामने से आ रही गाड़ी को अपनी मौजूदगी का अंदाजा कराया जाता है. ऐसे में यहां कई मौकों पर हॉर्न का मकसद दूसरे ड्राइवर को डराना नहीं, बल्कि उसे पहले से सावधान करना होता है.

'मैं यहां हूं, ध्यान रखना'

इवाना ने इसे सड़क पर एक तरह का संकेत बताया. उनका कहना है कि भारत की सड़कों पर ट्रैफिक कई बार बहुत ज्यादा होता है. ऐसे में हर एक गाड़ी को हर वक्त सिर्फ शीशे देखकर अपनी मौजूदगी का अंदाजा लगाना आसान नहीं होता. इसको देखते हुए एक छोटा सा हॉर्न सामने वाले को बता सकता है कि पीछे से कोई वाहन आ रहा है या कोई ड्राइवर उसके पास से निकलने वाला है. यही वजह है कि भारत में कई लोग गाड़ी चलाना सीखते समय हॉर्न के इस्तेमाल को भी ड्राइविंग का हिस्सा मानते हैं. खासकर चौराहे, मोड़ और ओवरटेक करते समय हॉर्न बजाना कई ड्राइवरों के लिए सावधानी बरतने का तरीका है.

क्या हर चीज को पश्चिमी नजर से देखना सही है?

इवाना की बात यहीं नहीं रुकी. उन्होंने एक बड़ा सवाल भी उठाया. क्या दुनिया की हर संस्कृति और हर आदत को पश्चिमी देशों के तरीके से ही मापा जाना चाहिए? उनका कहना है कि अगर किसी देश में सड़क पर हॉर्न का इस्तेमाल दूसरे देश से अलग तरीके से होता है, तो जरूरी नहीं कि वह तरीका पिछड़ापन दिखाता हो. हो सकता है कि वह उस जगह के ट्रैफिक, सड़कों और लोगों के रोजमर्रा के अनुभव से विकसित हुआ हो. भारत की सड़कें कई बार काफी अलग होती हैं. एक ही सड़क पर कार, बाइक, स्कूटर, ऑटो, बस, पैदल लोग और अलग-अलग तरह के दूसरे वाहन एक साथ दिखाई दे सकते हैं. ऐसे माहौल में ड्राइविंग के तरीके भी उसी हिसाब से विकसित होते हैं.

भारतीयों ने बताया बिल्कुल सही

इवाना का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई भारतीय यूजर्स ने उनकी बात का समर्थन किया. लोगों ने कहा कि एक विदेशी महिला ने भारत की सड़क पर हॉर्न के इस्तेमाल के उस पहलू को समझने की कोशिश की है, जिसे बाहर से देखने पर अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. एक यूजर ने लिखा कि उन्होंने भारत की हॉर्निंग कल्चर को बिल्कुल सही तरीके से समझाया है. एक अन्य व्यक्ति ने अपने ड्राइविंग सीखने का अनुभव शेयर किया. उसने बताया कि जब वह पहली बार स्कूटी चला रहा था तो उसके पिता ने चौराहे के पास पहुंचते समय हमेशा हॉर्न देने की सलाह दी थी, जिससे दूसरे वाहन को उसके आने का पता चल सके. एक यूजर ने अमेरिका का अनुभव बताते हुए कहा कि वहां हॉर्न बजाना अक्सर बदतमीजी या परेशानी के संकेत के तौर पर देखा जाता है, जबकि भारत में इसे सड़क की सुरक्षा के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है.

किसी ने कहा- 'हॉर्न ने मेरी जान बचाई'

इस चर्चा में एक कमेंट ऐसा भी था जिसने लोगों का ध्यान खींचा. एक भारतीय यूजर ने लिखा कि हॉर्न ने उसकी जान कई बार बचाई है. उसके मुताबिक, अगर सड़क पर जरूरत के वक्त हॉर्न का इस्तेमाल नहीं होता तो शायद वह आज जिंदा नहीं होता. ऐसे कमेंट यह बताते हैं कि भारत में हॉर्न को लेकर लोगों के अनुभव एक जैसे नहीं हैं. किसी के लिए यह सिर्फ शोर है, तो किसी दूसरे के लिए यह सामने वाले को सावधान करने वाला जरूरी संकेत है. हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर जगह बिना वजह हॉर्न बजाना सही है. शहरों में ध्वनि प्रदूषण और लगातार बजते हॉर्न की परेशानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. असली सवाल शायद यह है कि जरूरत और आदत के बीच फर्क कैसे किया जाए.

हॉर्निंग पर बहस से बड़ी है समझ की बात

इवाना के वीडियो ने एक साधारण सी लगने वाली आदत को लेकर बड़ी चर्चा शुरू कर दी है. भारत में हॉर्न का इस्तेमाल सही है या गलत, इस पर लोगों की अपनी-अपनी राय हो सकती है. लेकिन उनकी बात का मुख्य मुद्दा इससे थोड़ा अलग है. वह कह रही हैं कि किसी दूसरे देश की आदत को सिर्फ इसलिए गलत या पिछड़ा नहीं कह देना चाहिए, क्योंकि वहां चीजें हमारे जाने-पहचाने तरीके से अलग हैं. सड़क पर हॉर्न बजाना भारत में हमेशा गुस्से का संकेत नहीं होता. कई बार यह सामने वाले को अपनी मौजूदगी बताने, ओवरटेक का संकेत देने या मोड़ पर सावधान करने का तरीका भी हो सकता है.

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