US में नौकरी, ग्रीन कार्ड और अपना स्टार्टअप... फिर क्यों भारत लौट आईं भारती रमेश? बताई अमेरिका छोड़ने की वजह
अमेरिका का ग्रीन कार्ड लाखों भारतीयों के लिए सपनों के सच होने जैसा है. इसके लिए लोग सालों तक नौकरी, वीजा और कागजी प्रक्रिया के बीच जूझते रहते हैं. लेकिन न्यूट्रिशनिस्ट और आंत्रप्रेन्योर भारती रमेश ने यही सपना पूरा होने के बाद उसे पीछे छोड़ने का फैसला किया. अमेरिका की भागदौड़, नौकरी का दबाव और खुद की जिंदगी में आए बड़े सदमे ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया. अंत में वो पति के साथ भारत लौटकर आ गईं.
अमेरिका का 'ग्रीन कार्ड एक ऐसा दस्तावेज है, जिसे हासिल करने के लिए भारतीय प्रोफेशनल्स अपनी पूरी जवानी, नींद और सुकून दांव पर लगा देते हैं. लेकिन इसी ग्रीन कार्ड को छोड़कर अगर कोई वापस अपने वतन लौट आए, तो यह उसके लिए सबसे मुश्किल फैसला होता है. भारती रमेश की कहानी भी इसलिए अलग है, क्योंकि उन्होंने अमेरिका छोड़ने का फैसला उस वक्त किया, जब वहां रहने का उनका सबसे बड़ा रास्ता साफ हो चुका था.
जिस ग्रीन कार्ड के लिए उन्होंने लंबी प्रक्रिया पूरी की, वही मिलने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि सिर्फ अमेरिका में रहना ही जिंदगी की कामयाबी नहीं है. सोशल मीडिया पर अपनी कहानी शेयर करते हुए भारती ने बताया कि वह साल 2020 में मास्टर्स की पढ़ाई के लिए अमेरिका गई थीं. पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्होंने वहीं अपने भविष्य को आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी. इसी दौरान उन्होंने ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया भी शुरू की.
EB-1A ग्रीन कार्ड तक पहुंचीं
भारती को आम ग्रीन कार्ड नहीं, बल्कि EB-1A कैटेगरी के तहत ग्रीन कार्ड मिला था. यह कैटेगरी असाधारण क्षमता वाले लोगों के लिए होती है. इसका मतलब जिस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने इतनी मेहनत की, उसे छोड़ने का फैसला उनके लिए बिल्कुल आसान नहीं रहा होगा. उनका मकसद अमेरिका में रहकर अपने काम और स्टार्टअप को आगे बढ़ाना था. लेकिन जिंदगी में कुछ ऐसी चीजें हुईं, जिनके बाद उनके लिए करियर की तस्वीर ही बदल गई.
एक अपने को खोने का सदमा
भारती की जिंदगी में सबसे बड़ा झटका तब आया, जब उन्होंने अपने माता-पिता में से एक को खो दिया. यह ऐसा वक्त था, जिसने उनके लिए बाकी सारी चीजों को अचानक छोटा कर दिया. बाहर से देखें तो उनकी जिंदगी ठीक चल रही थी. अमेरिका में पढ़ाई पूरी हो चुकी थी, काम था और ग्रीन कार्ड भी मिल गया था. लेकिन भारती के मुताबिक, अंदर से वह लगातार टूट रही थीं. वह बताती हैं कि एक तरफ उन्हें महंगे किराए और हेल्थ इंश्योरेंस जैसे खर्चों के लिए लगातार काम करना पड़ रहा था, वहीं दूसरी तरफ उनका मन अपने स्टार्टअप को समय देने का था. यही खींचतान धीरे-धीरे उनके लिए भारी पड़ती गई.
नौकरी चल रही थी, लेकिन जिंदगी रुक गई
अमेरिका की जिंदगी बाहर से जितनी चमकदार दिखाई देती है, उसके पीछे कई लोगों की रोज की भागदौड़ भी होती है. भारती के लिए भी कुछ ऐसा ही था. उन्हें लगता था कि वह अपना ज्यादातर समय उन चीजों में लगा रही हैं, जो जरूरी तो थीं, लेकिन जिनके लिए उन्होंने अमेरिका जाने का सपना नहीं देखा था. किराया, इंश्योरेंस, नौकरी और खुद को साबित करने की लगातार कोशिश के बीच उनका अपना सपना पीछे छूटता जा रहा था. आखिरकार वह मानसिक तौर पर बुरी तरह थक गईं.
आठ महीने खुद को संभालने में लगे
भारती ने अपनी कहानी में बताया कि वह एक ऐसे दौर से गुजरीं, जहां उन्हें खुद को दोबारा संभालने में करीब आठ महीने लग गए. यह समय उनके लिए सिर्फ करियर का ब्रेक नहीं था. उन्हें अपनी जिंदगी, प्राथमिकताओं और आगे के रास्ते के बारे में दोबारा सोचना पड़ा. यहीं से उनके मन में एक बड़ा सवाल आया कि अगर वह अपने ही सपने के लिए समय नहीं निकाल पा रही हैं तो आखिर वह किस जिंदगी के पीछे भाग रही हैं? इस सवाल ने धीरे-धीरे उनके फैसले की दिशा बदल दी.
पति के साथ लिया बड़ा फैसला
इसके बाद भारती और उनके पति ने अमेरिका की जिंदगी छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया. यह फैसला इसलिए भी बड़ा था, क्योंकि अमेरिका में उनका भविष्य सुरक्षित दिख रहा था. ग्रीन कार्ड उनके पास था और वहां रहने का रास्ता खुला हुआ था. फिर भी दोनों ने अपनी जिंदगी को एक बार फिर नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया. भारत लौटने के बाद भारती ने अपने काम को नए तरीके से आगे बढ़ाना शुरू किया और खुद को स्टार्टअप फाउंडर के तौर पर स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ाया.
अब अपने देश में बनाना चाहती हैं पहचान
भारत लौटने के बाद भारती के लिए सबसे बड़ा बदलाव यह रहा कि अब वह किसी तय नौकरी की दौड़ में नहीं, बल्कि अपने खुद के आइडिया पर काम कर रही हैं. अमेरिका में जिस स्टार्टअप को समय देने की चाहत उनके अंदर लगातार बनी रही, अब उसी सपने को भारत में आगे बढ़ाने का मौका उन्हें मिला है. उनका फैसला यह बताता है कि हर इंसान के लिए कामयाबी की परिभाषा एक जैसी नहीं होती. किसी के लिए अमेरिका में बसना सपना हो सकता है, तो किसी के लिए अपने देश लौटकर अपने दम पर कुछ खड़ा करना ज्यादा मायने रख सकता है.
सोशल मीडिया पर लोगों ने की तारीफ
भारती की कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उनके फैसले की तारीफ की. खास तौर पर लोगों को यह बात अलग लगी कि उन्होंने ग्रीन कार्ड मिलने के बाद अमेरिका छोड़ने का फैसला किया. कई यूजर्स ने उनके इस कदम को अपने सपने और मानसिक सुकून को प्राथमिकता देने से जोड़ा. लोगों का कहना है कि विदेश में अच्छी नौकरी और स्थायी रहने का मौका मिलना निश्चित तौर पर बड़ी उपलब्धि है, लेकिन अगर इंसान अंदर से खुश नहीं है तो सिर्फ इन चीजों से जिंदगी पूरी नहीं हो जाती.
असली सवाल ग्रीन कार्ड का नहीं, खुशी का है
भारती रमेश की कहानी को सिर्फ अमेरिका छोड़ने या ग्रीन कार्ड ठुकराने की कहानी के तौर पर देखना शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी. इसके पीछे एक ऐसी महिला की कहानी है, जिसने अपने करियर के साथ-साथ अपनी जिंदगी को भी दोबारा समझने की कोशिश की. जिस ग्रीन कार्ड को हासिल करने के लिए उन्होंने मेहनत की, उसे छोड़ना आसान फैसला नहीं रहा होगा. लेकिन अपने अनुभवों के बाद उन्होंने भारत लौटकर फिर से शुरुआत करने का रास्ता चुना. अब उनका लक्ष्य साफ है कि वह अपने देश में रहकर अपने सपने को आकार देंगी.
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