गले में चांदी का हार, सिर पर ताज: यहां पालकी में बैठाकर निकालते हैं कुत्ते का शाही जुलूस; कहानी सुन रह जाएंगे हैरान
दुनिया में कुत्तों को इंसान का वफादार साथी माना जाता है, लेकिन चीन के एक गांव में उन्हें खास मेहमान की तरह सम्मान दिया जाता है. यहां एक कुत्ते को नए कपड़े पहनाए जाते हैं, सिर पर बाघ के चेहरे जैसी टोपी सजाई जाती है और चांदी का गहना पहनाकर पालकी में बैठाया जाता है. इसके बाद पूरा गांव उसका जुलूस निकालता है. यह अनोखी परंपरा कुत्तों के प्रति आभार जताने और अच्छी फसल की कामना से जुड़ी है.
आमतौर पर किसी गांव में जुलूस निकलता है तो उसके पीछे कोई धार्मिक आयोजन, त्योहार या खास शख्सियत होती है. लेकिन चीन के एक गांव में हर साल ऐसा नजारा देखने को मिलता है, जहां जुलूस के केंद्र में कोई इंसान नहीं, बल्कि एक कुत्ता होता है. यह परंपरा चीन के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में बसे गुइझोऊ प्रांत के जियाओबांग गांव से जुड़ी है.
यहां रहने वाले मियाओ समुदाय के लोग कुत्ते को सिर्फ घर की रखवाली करने वाला जानवर नहीं मानते. उनकी पुरानी मान्यताओं में कुत्ते को ऐसा साथी माना गया है, जिसने मुश्किल समय में इंसानों की मदद की और उनकी जान बचाई. इसी सम्मान को जाहिर करने के लिए यहां 'डॉग कैरीइंग फेस्टिवल' मनाया जाता है. इस त्योहार में कुत्ते को सजाकर पालकी में बैठाया जाता है और फिर पूरे गांव में घुमाया जाता है.
कपड़े, चांदी का गहना और खास टोपी
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इस त्योहार की तैयारी भी काफी दिलचस्प होती है. गांव के लोग एक कुत्ते को चुनते हैं और उसे पारंपरिक मियाओ कपड़े पहनाते हैं. उसके सिर पर बाघ के चेहरे जैसी हाथ से बनी टोपी सजाई जाती है. गले में चांदी का छल्ला भी पहनाया जाता है. इसके बाद कुत्ते को बांस से बनी पालकी पर बैठाया जाता है. गांव के लोग इस पालकी को उठाकर जुलूस की शक्ल में आगे बढ़ते हैं. इस दौरान पारंपरिक रीति-रिवाज निभाए जाते हैं और ढोल की आवाज के बीच लोग नाचते-गाते हैं. इस पूरे आयोजन में कुत्ते को खास सम्मान दिया जाता है. देखने में यह किसी शाही जुलूस जैसा लगता है, लेकिन इसके पीछे समुदाय की पुरानी मान्यताएं और प्रकृति के प्रति आभार जताने की भावना जुड़ी है.
अच्छी बारिश और फसल के लिए भी होती है प्रार्थना
यह त्योहार केवल कुत्ते को सम्मान देने तक सीमित नहीं है. मियाओ समुदाय के लोगों के लिए इसका संबंध खेती और गांव की खुशहाली से भी है. जुलूस गांव से निकलकर आसपास के खेतों तक जाता है. वहां ढोल बजाए जाते हैं, लोग नाचते हैं और कुछ रस्मों के दौरान एक-दूसरे पर कीचड़ भी डालते हैं. इन परंपराओं को अच्छी बारिश, अपने अनुसार मौसम और खेतों में भरपूर फसल की कामना से जोड़ा जाता है. खेती पर निर्भर समुदायों के लिए बारिश का समय पर होना बेहद जरूरी रहा है. पुराने समय में मौसम का अनुमान लगाना आसान नहीं था. ऐसे में अच्छी फसल के लिए अलग-अलग तरह की परंपराएं बनी हुईं हैं. जियाओबांग गांव का यह त्योहार भी उन्हीं सांस्कृतिक मान्यताओं का हिस्सा माना जाता है.
कुत्ते को इतना खास क्यों मानते हैं?
इस त्योहार की शुरुआत को लेकर मियाओ समुदाय में दो पुरानी कहानियां सुनाई जाती हैं. पहली कहानी एक भयंकर सूखे से जुड़ी है. कहा जाता है कि एक बार गांव में बारिश नहीं हुई और फसल बर्बाद होने का खतरा पैदा हो गया. मान्यता के अनुसार, गांव के एक बुजुर्ग को सपने में देवता दिखाई दिए. उन्होंने कुत्ते के साथ प्रार्थना करने की बात कही. गांव वालों ने ऐसा ही किया और बाद में बारिश हुई. इसके बाद लोगों के मन में कुत्ते के प्रति सम्मान और बढ़ गया. यह कहानी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा है. इसे किसी ऐतिहासिक घटना के रूप में साबित करने वाले स्वतंत्र प्रमाण सामने नहीं हैं, लेकिन स्थानीय परंपरा में इसका खास महत्व बताया जाता है.
दूसरी कहानी में कुत्ते ने बचाई लोगों की जान
दूसरी कहानी गांव के पूर्वजों से जुड़ी है. इसके अनुसार, एक समय लोगों को पानी की तलाश में परेशानी हो रही थी. तभी एक कुत्ता उन्हें पानी के छिपे हुए स्रोत तक ले गया. इससे लोगों को पानी मिला और उनकी जान बच सकी. गुइझोऊ का इलाका चूना पत्थर की पहाड़ियों और गुफाओं के लिए जाना जाता है. ऐसे क्षेत्रों में पानी कई बार जमीन के नीचे बहता है, जिससे सतह पर उसका पता लगाना मुश्किल हो सकता है. ऐसे में कुत्ते से जुड़ी यह कहानी बताती है कि समुदाय के लोग उसे केवल पालतू जानवर नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाला साथी भी मानते हैं. इसी वजह से त्योहार में उसे सम्मान देने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है.
सालों पुरानी परंपरा को मिली सांस्कृतिक पहचान
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट में बताया गया है कि जियाओबांग गांव में इस त्योहार को स्थानीय भाषा में 'ताई गोउ जी' कहा जाता है. यह चंद्र कैलेंडर के सातवें महीने में मनाया जाता है. साल 2015 में इसे स्थानीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी गई थी. समय के साथ इस परंपरा में कुछ बदलाव भी आए हैं. पहले आमतौर पर सफेद रंग की मादा कुतिया को चुने जाने की बात कही जाती है. अब वयस्क नर कुत्तों और स्थानीय शियासी नस्ल के कुत्तों को भी यह सम्मान दिया जाता है. यह बदलाव दिखाता है कि त्योहार की पहचान किसी एक तरह के कुत्ते तक सीमित नहीं है. इसका मुख्य उद्देश्य उस जानवर के प्रति आभार जताना है, जिसे समुदाय अपनी संस्कृति और पुरानी कहानियों से जोड़कर देखता है.
जानवरों के लिए मियाओ समुदाय में खास जगह
मियाओ समुदाय की परंपराओं में सिर्फ कुत्तों ही नहीं, दूसरे जीवों का भी खास महत्व है. उनकी लोककथाओं में नेचर, पेड़-पौधों और जानवरों को इंसानी जीवन से गहराई से जुड़ा हुआ बताया गया है. समुदाय में 'बटरफ्लाई मदर' यानी तितली मां की भी मान्यता है. एक पुरानी कथा के अनुसार, उनका जन्म मेपल के पेड़ से हुआ था और उनके दिए अंडों से इंसानों तथा जानवरों की उत्पत्ति हुई. इस कहानी के जरिए जीव-जगत के आपसी संबंध को समझाया जाता है. इसी तरह गोल्डन फीजेंट यानी सुनहरे तीतर को भी सम्मान दिया जाता है. मान्यता है कि इस पक्षी ने पूर्वजों को बाजरे के बीज देकर भुखमरी से बचाने में मदद की थी. उसके प्रति आभार जताने के लिए ट्रेडिशनल डांस भी किया जाता है.
बच्चों को भी सिखाई जाती है परंपरा
इस त्योहार से जुड़ी कुछ रस्मों में बच्चों की खुशहाली की कामना भी की जाती है. बताया जाता है कि अविवाहित लड़कियां अपनी पीठ पर पिल्लों को लेकर गांव के घरों से चावल इकट्ठा करती हैं. बाद में समुदाय के एक सम्मानित बुजुर्ग इस भोजन को छोटे बच्चों में बांटते हैं. स्थानीय मान्यताओं में इसे बच्चों की अच्छी सेहत और विकास की कामना से जोड़ा जाता है. ऐसी रस्मों के जरिए नई पीढ़ी को समुदाय की पुरानी परंपराओं और जानवरों के महत्व के बारे में बताया जाता है.