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Chimpanzees Playing Cricket: इंसानों को तो क्रिकेट का कीड़ा लगा ही रहता है, लेकिन अब यह बुखार जंगल के जानवरों तक भी पहुंच गया है. वैज्ञानिकों ने एक ऐसी रिसर्च पेश की है, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है. वेस्ट अफ्रीका के जंगलों में चिम्पैंजी की एक ऐसी टोली मिली है जो पिछले 10 से भी ज्यादा सालों से एक खास पेड़ पर पत्थर फेंककर 'क्रिकेट बॉलिंग' की प्रैक्टिस कर रही है. यही नहीं, ये बंदर सिर्फ बॉलिंग ही नहीं करते बल्कि अपनी खुद की फैन आर्मी बनकर ढोल-नगाड़ों की तरह पेड़ को पीटकर जश्न भी मनाते हैं.
यह पूरी कहानी गिनी-बिसाऊ के बोए नेशनल पार्क की है. जहां वैज्ञानिकों की एक टीम रिसर्च कर रही थी. उन्होंने देखा कि चिम्पैंजी की एक टोली बार-बार एक ही जगह पर आ रही है. जब वैज्ञानिकों ने हिडन कैमरों की रिकॉर्डिंग चेक की तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं. नर चिम्पैंजी बड़े-बड़े पत्थरों को अपने हाथ में उठाकर एक खास पेड़ के तने की तरफ बिल्कुल किसी क्रिकेट बॉलर की तरह पूरी ताकत से फेंक रहे थे. ऐसा लग रहा था मानो वे किसी बैट्समैन को यॉर्कर या ऑफ-ब्रेक बॉल डालने की प्रैक्टिस कर रहे हों.
रिसर्च में यह बात सामने आई कि यह कोई एक दिन का इत्तेफाक नहीं था. ये बंदर पिछले 10 से ज्यादा सालों से लगातार इसी एक पेड़ को अपना टारगेट बनाकर पत्थरों से 'बॉलिंग' कर रहे थे. वैज्ञानिकों ने इस हरकत को 'एक्युमुलेटिव स्टोन थ्रोइंग' नाम दिया है. बंदरों का यह ग्रुप हर बार पत्थरों को जमा करता है और फिर एक-एक करके उन्हें पेड़ के तने पर निशाना साधकर मारता है. उनका बॉलिंग एक्शन देखकर ऐसा लगता है जैसे वे किसी इंटरनेशनल मैच की तैयारी में लगे हों.
इंग्लैंड की क्रिकेट टीम के फैन क्लब को 'बार्मी आर्मी' कहा जाता है, जो स्टेडियम में ढोल बजाकर टीम को सपोर्ट करती है. यह चिम्पैंजी भी किसी से कम नहीं हैं. रिसर्च के मुताबिक, जब ये बंदर पत्थर फेंकते हैं तो जोर-जोर से हूटिंग करते हैं और अपने हाथ-पैरों से पेड़ को बजाना शुरू कर देते हैं. वैज्ञानिक इसे 'बट्रेस ड्रमिंग' कहते हैं. यानी बॉलिंग करने के बाद ये बंदर खुद ही ड्रम बजाकर अपनी बॉलिंग का जश्न मनाते हैं और पूरा माहौल किसी स्टेडियम जैसा बना देते हैं.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और अन्य रिसर्चर्स का मानना है कि बंदरों की यह हरकत बहुत मामूली नहीं है. चिम्पैंजी इंसान के सबसे करीबी रिश्तेदार माने जाते हैं. जिस तरह से वे पत्थरों का इस्तेमाल कर रहे हैं और आपस में सिग्नल देकर बात कर रहे हैं, उससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि लाखों साल पहले इंसानों ने औजारों का इस्तेमाल और आपस में बात करना कैसे शुरू किया होगा. यह उनकी एक अपनी अलग संस्कृति या कल्चर बन चुका है जो सिर्फ इसी इलाके के बंदरों में देखा जा रहा है.
कहानी सिर्फ क्रिकेट बॉलिंग पर ही खत्म नहीं होती. हाल ही में आई एक और क्रांतिकारी रिसर्च ने साबित कर दिया है कि बंदर और इंसान एक-दूसरे से बहुत ज्यादा मिलते-जुलते हैं. ऑक्सफोर्ड के वैज्ञानिकों ने पाया कि 88 अलग-अलग प्रजातियों के बंदर इंसानों की तरह ही दूसरे जानवरों को अपने साथ रखते हैं और उन्हें 'पालतू जानवर' की तरह प्यार करते हैं. वे छिपकली, हिरण, चिड़िया, गिलहरी और कुत्तों के साथ खेलते हैं और उनकी देखभाल करते हैं.
रिसर्च में देखा गया कि चिम्पैंजी छोटी प्रजाति के बंदरों के बाल संवारते हैं. मकाक प्रजाति के बंदर मुर्गियों के साथ मस्ती करते नजर आते हैं. यहां तक कि कैपुचिन प्रजाति के बंदरों को तो एक अनाथ मार्मोसेट (छोटे बंदर) को गोद लेते और महीनों तक उसका पालन-पोषण करते हुए देखा गया. यह सब दिखाता है कि इंसानों की तरह बंदरों के दिल में भी प्यार, खेल और केयर करने की भावना होती है.
आज के टाइम में जब सोशल मीडिया पर हर दिन कुछ न कुछ नया वायरल होता है, तब चिम्पैंजी का यह 'क्रिकेट प्रेम' और 'पेट्स के प्रति लगाव' लोगों को खूब पसंद आ रहा है. स्पोर्ट्स लवर्स भी चिम्पैंजी के इस बॉलिंग एक्शन के दीवाने हो गए हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर चिम्पैंजी इसी तरह नई-नई चीजें सीखते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब हमें जंगल में बंदरों का पूरा क्रिकेट टूर्नामेंट देखने को मिल जाए.