App

सोशल मीडिया बैन का बच्चों ने निकाला तोड़, फर्जी मूंछें और भाई की आईडी लगाकर धड़ल्ले से चला रहे हैं ऐप्स

दुनिया भर में बच्चों के लिए सोशल मीडिया बैन का ट्रेंड चल रहा है लेकिन बच्चे इसे आसानी से बायपास कर रहे हैं. जानिए क्यों सिर्फ बैन लगाना सही सॉल्यूशन नहीं है और इससे सुरक्षा का खतरा कैसे बढ़ रहा है.

सोशल मीडिया बैन का बच्चों ने निकाला तोड़, फर्जी मूंछें और भाई की आईडी लगाकर धड़ल्ले से चला रहे हैं ऐप्स
Image Credit: बैन लगने के बावजूद 16 साल से छोटे 5 में से 4 बच्चे आसानी से इन प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच रहे हैं.

दुनिया भर की सरकारें आजकल एक ही धुन में लगी हैं कि किसी भी तरह 15 या 16 साल से छोटे बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखा जाए. फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देश ऐसे कड़े कानून बना रहे हैं. लेकिन असली ट्विस्ट यह है कि बच्चे इन सभी कानूनों और पाबंदियों से दो कदम आगे निकल चुके हैं. जैसे ही किसी ऐप पर एज-लिमिट लगती है, बच्चे अपने बड़े भाई-बहन का आईडी कार्ड इस्तेमाल करके या फिर चेहरे पर नकली मूंछें बनाकर अपना अकाउंट चालू कर लेते हैं. ऑस्ट्रेलिया में तो 80 परसेंट बच्चों ने बैन के बावजूद ऐप्स चलाकर दिखा दिया. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या बच्चों का यह जुगाड़ सच में एक समस्या है या फिर यह इशारा कर रहा है कि हमारे कानून बनाने का तरीका ही गलत है.

सोशल मीडिया पर पाबंदी की होड़
आजकल पूरी दुनिया में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर बैन लगाने की रेस चल रही है. कई देशों ने 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंस्टाग्राम, टिकटॉक और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स को पूरी तरह ब्लॉक करने का प्लान बनाया है. यूके भी 2027 की शुरुआत से 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर ऐसी ही पाबंदी लगाने जा रहा है. लेकिन अगर हम ऑस्ट्रेलिया की बात करें, जहां यह नियम 2024 में ही लागू हो गया था, तो वहां के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं.

बच्चों के आगे फेल हो गए सारे नियम
MIT Technology Review की एक रिसर्च में पता चला कि बैन लगने के बावजूद 16 साल से छोटे 5 में से 4 बच्चे आसानी से इन प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच रहे हैं. बच्चे पाबंदियों को चकमा देने के लिए नए-नए तरीके ढूंढ रहे हैं. कोई अपने बड़े भाई या बहन का चेहरा दिखाकर वेरिफिकेशन कर रहा है, तो कोई चेहरे पर पैन या स्केच पेन से मूंछें बनाकर ऐप को उल्लू बना रहा है. बच्चे अपनी जिज्ञासा और प्रॉब्लम-सॉल्विंग स्किल का इस्तेमाल करके पाबंदियों को तोड़ रहे हैं.

पाबंदी से बढ़ रहा है असली खतरा
कुछ लोगों का मानना है कि इन लूपहोल्स को बंद करने के लिए और ज्यादा कड़े नियम बनाए जाने चाहिए. लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि बच्चों को इस तरह पूरी तरह सोशल मीडिया से काटना खतरनाक हो सकता है. किशोरावस्था यानी टीनेज में बच्चों को अपनी पहचान बनाने, नए दोस्तों से जुड़ने और जानकारियां जुटाने के लिए इंटरनेट की जरूरत होती है. जब आप उनसे यह प्लेटफॉर्म छीन लेते हैं, तो वे इंटरनेट के ऐसे अनजाने और कम मॉडरेटेड कोनों में जाने लगते हैं जहां कोई सुरक्षा नहीं होती.

गूगल डॉक्स पर होने लगी है चैटिंग
जब मेनस्ट्रीम ऐप्स बंद हो जाते हैं, तो बच्चे बात करने के लिए अजीबोगरीब रास्ते तलाशते हैं. कई बच्चे अब गूगल डॉक्स के अंदर या फिर पॉडकास्ट के कमेंट सेक्शन में जाकर एक-दूसरे से बात कर रहे हैं. लेकिन सबसे डरावनी बात यह है कि कुछ बच्चे ऐसी अनजानी वेबसाइट्स और प्लेटफॉर्म्स पर चले जाते हैं जहां साइबर क्राइम और शोषण का खतरा सबसे ज्यादा होता है. जिस तरह सुनसान सड़कें ज्यादा खतरनाक होती हैं, ठीक उसी तरह इंटरनेट के अनजाने कोने भी बच्चों के लिए सबसे बड़े जाल बन जाते हैं.

पैरेंट्स भी दे रहे हैं बच्चों का साथ
कई लोगों को लगता है कि माता-पिता इन खतरों से अनजान हैं, लेकिन हकीकत कुछ और है. रिसर्च से पता चलता है कि बहुत से पैरेंट्स खुद अपने बच्चों को फेक डिटेल्स डालकर अकाउंट बनाने में मदद करते हैं. माता-पिता का मानना है कि आज की डिजिटल दुनिया में बच्चों को पूरी तरह अलग-थलग करने के बजाय उन्हें सुरक्षित तरीके से इंटरनेट चलाना सिखाना ज्यादा बेहतर है. पैरेंट्स मानते हैं कि सोशल मीडिया से सीखने और कनेक्ट होने के फायदे इसके खतरों से कहीं ज्यादा हैं.

उम्र साबित करने के चक्कर में लीक हो रहा है डेटा
उम्र चेक करने के लिए जब कंपनियां यूज़र्स से ड्राइविंग लाइसेंस या सरकारी आईडी मांगती हैं, तो इससे प्राइवेसी का बहुत बड़ा रिस्क पैदा हो जाता है. हाल ही में एक बड़ी सर्विस से डेटा लीक हुआ था जहां एज-वेरिफिकेशन के लिए जमा कराए गए 70 हजार से ज्यादा सरकारी आईडी कार्ड्स की तस्वीरें लीक हो गईं. अगर ये आईडी कार्ड हैकर्स के हाथ लग जाएं तो आइडेंटिटी थेफ्ट और ब्लैकमेलिंग का खतरा बढ़ जाता है. यानी बच्चों को बचाने के नाम पर सभी नागरिकों की प्राइवेसी को दांव पर लगाया जा रहा है.

केवल बैन लगाना सही हल नहीं है
सरकारों को यह समझने की जरूरत है कि बच्चों को ऐप्स से बाहर निकालने की जिद में हम पूरी इंटरनेट सेफ्टी को कमजोर कर रहे हैं. सिर्फ बैन लगा देने से पैरेंटिंग आसान नहीं हो जाती. असली हल यह है कि हम टेक कंपनियों पर नकेल कसें जो यूज़र्स को लगातार ऐप्स से चिपकाए रखने के लिए उनका डेटा ट्रैक करती हैं. कंपनियों को ऐसा कंटेंट और एड्स दिखाने से रोका जाना चाहिए जो बच्चों के मन पर बुरा असर डालते हैं.

Add Zee News as a Preferred Source

About the Author

Mohit Chaturvedi

Mohit Chaturvedi

मोहित चतुर्वेदी डिजिटल न्यूज मीडिया में 16 से अधिक वर्षों का एक्सपीरियंस रखने वाले एक वरिष्ठ टेक जर्नलिस्ट हैं, जो वर्तमान में Zee News में असिस्टेंट न्यूज एडिटर के रूप में टेक्नोलॉजी सेक्शन का नेतृत्व कर रहे हैं. स्मार्टफोन रिव्यू, गैजेट एनालिसिस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा में गहरी विशेषज्ञता रखने वाले मोहित ने Apple, Samsung, OnePlus, Vivo और Xiaomi जैसे टॉप ब्रांड्स के फ्लैगशिप डिवाइसों का गहन और निष्पक्ष इन-डेप्थ रिव्यू किया है. अंतरराष्ट्रीय टेक इवेंट्स की ऑन-ग्राउंड रिपोर्टिंग का लंबा अनुभव रखने वाले मोहित ने लंदन में 'Nothing Phone' और आयरलैंड के बेलफास्ट में 'Realme' के ग्लोबल लॉन्च इवेंट्स को कवर किया है, और इससे पहले वे NDTV, आजतक और दैनिक भास्कर जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में टेक जर्नलिज्म और डिजिटल कंटेंट स्ट्रेटेजी में अहम भूमिकाएं निभा चुके हैं. जटिल तकनीकी बारीकियों को बेहद आसान भाषा में डिकोड करने के लिए पहचाने जाने वाले मोहित से सीधे Mohit.chaturvedi@zeemedia.com पर ईमेल के जरिए या उनके एक्स और इंस्टाग्राम हैंडल्स पर कनेक्ट किया जा सकता है.
Read More